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डिजिटल युग का नया व्यापार, वीडियो बनाओ, चेक छीनो और बन जाओ इंसाफ के मसीहा!

बिना जांच के अदालत और टीआरपी की भूख, जब इंस्टाग्राम चैनल ही बन बैठे स्वयंभू जज!

लखनऊ। वाह री सोशल मीडिया की दुनिया! पहले के जमाने में जब किसी को किसी से कोई रंजिश या हिसाब चुकता करना होता था, तो लोग सबूत जुटाते थे, गवाह लाते थे और कानून का दरवाजा खटखटाते थे। लेकिन डिजिटल इंडिया के इस स्वर्णिम काल में इतनी मेहनत करने की भला क्या जरूरत? आजकल का सबसे सस्ता और टिकाऊ फॉर्मूला है। एक अदद स्मार्टफोन उठाइए, बिना किसी जांच-पड़ताल या दूसरे पक्ष की बात सुने सनसनीखेज वीडियो बनाइए, उसे एन एम टी, टी०वी० या यू पी 32 हेड लाईन जैसे खोजी चैनलों पर वायरल करवाइए और रातों-रात खुद को पीड़ित और सामने वाले को भगोड़ा घोषित कर दीजिए!

लखनऊ के तालिब खान जी का मामला भी कुछ इसी आधुनिक न्याय व्यवस्था की भेंट चढ़ता दिख रहा है। तालिब साहब का गुनाह सिर्फ इतना है कि वे एक कंसलटेंसी फर्म चलाते हैं और कॉन्ट्रैक्ट बेस पर युवाओं को रोजगार दिलवाते हैं। अब रोजगार की दुनिया का नियम है कि भाई, सिक्योरिटी अमाउंट तो जमा करना ही पड़ता है, जो जॉइनिंग के बाद वापस मिल जाता है। लेकिन कुछ अति-उत्साही समाजसेवियों, जैसे अरमान अली, आशिया बेगम और उनके 10-12 परम मित्रों को यह सीधा-साधा कानूनी तरीका शायद रास नहीं आया।

कहावत है कि नेकी कर और दरिया में डाल, लेकिन यहाँ तो मामला कमीशन लो और स्कूटी पर निकल लो वाला निकला! आरोप है कि अरमान अली हर जॉइनिंग पर बकायदा कमीशन डकारते रहे और तो और, कमीशन के रूप में एक स्कूटी भी फाइनेंस करवा ली, जिसकी डाउन पेमेंट और किश्तें भी तालिब खान के यूपीआई UPI से ही कटती रहीं। इसे कहते हैं असली रॉयल लाइफस्टाइल—सवारी अपनी, तेल अपना और किश्तें भरे कोई और!

कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब इन समाजसेवियों का पेट इतने से भी नहीं भरता। फिर एक दिन चाय पर चर्चा के बहाने तालिब साहब और उनके बड़े बुजुर्ग को घर बुलाया जाता है। वहाँ पहले से ही 10-12 बाहुबली स्वागत के लिए मुस्तैद मिलते हैं। फिर क्या? फिल्मी अंदाज में धमकी दी जाती है। या तो सारा पैसा वापस करो, नहीं तो यहाँ से जिंदा जाने नहीं देंगे। अब जान बची तो लाखों पाए, डरे-सहमे तालिब खान ने आनन-फानन में ₹50,000 अरमान अली की साली साहिबा मरियम अहमद के खाते में ट्रांसफर कर दिए। वाह! जीजा जी की धौंस और साली साहिबा का खाता, पारिवारिक बिजनेस हो तो ऐसा!

बात यहीं खत्म नहीं होती। डिजिटल युग के इन स्वयंभू जजों ने न सिर्फ जबरन वीडियो बनवाई, बल्कि जेब में रखा किसी और का ₹2,00,000 का चेक भी ऐसे झपट लिया जैसे कोई बच्चा दूसरे की टॉफ़ी छीनता है। नतीजा? प्रार्थी का काम भी ठप, आर्थिक नुकसान भी और ऊपर से सोशल मीडिया पर विलेन की छवि मुफ्त में उपहार में मिल गई।

सबसे मजेदार भूमिका तो हमारे उन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी मार्का न्यूज चैनलों की है, जिन्होंने बिना किसी पुष्टि के, बिना सच जाने, तालिब खान को लखनऊ का सबसे बड़ा भगोड़ा घोषित करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। टीआरपी की भूख में पत्रकारिता के सिद्धांतों को तो कब का कंट्रोल+डिलीट किया जा चुका है।

फिलहाल, तालिब खान ने माननीय मुख्यमंत्री योगी जी और बाजार खाला थाने की पुलिस से न्याय की गुहार लगाई है। देखना दिलचस्प होगा कि उत्तर प्रदेश की पुलिस इन वीडियो-जीवी ब्लैकमेलरों और बिना लाइसेंस की अदालत चलाने वाले स्कूटी-प्रेमी गिरोह पर आईटी एक्ट और मानहानि का हंटर कब चलाती है। तब तक के लिए, आप भी सावधान रहिए, क्या पता कब कोई आपके नाम की वीडियो बनाकर आपको भी वायरल कर दे!

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