मध्यकालीन भारतीय समाज और संत कबीर
कबीर साहेब के 628 वें प्रकटोत्सव दिवस पर विशेष

प्रोफेसर हंसराज सुमन
हिन्दी साहित्य का मध्यकाल राजनीतिक दृष्टि से उथल-पुथल भरा रहा है। तत्कालीन भारतीय समाज की स्थिति भी अधिक दयनीय थी। राज्य विस्तार और एकाधिकार के लिए निरंतर युद्ध चल रहे थे। प्रशासन राजस्व वसूली में लगा हुआ था। जनता की समस्याओं पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जा रहा था। त्राहिमाम करती जनता ईश्वर की शरण में सुकून तलाश करने की कोशिश कर रही थी। धार्मिक दृष्टि से दो विचारधाराएँ हतोत्साहित जनता को सांत्वना देने की कोशिश कर रही थीं। एक निर्गुण दूसरी सगुण, ये दोनों धाराएँ व्याकुल जनता की शरणस्थली बन गई थीं। भक्ति आंदोलन अपनी प्रवृत्ति के अनुसार जनता को ईश्वर की अराधना से प्रशासन के खिलाफ़ विद्रोह की ओर मोड़ रहा था। विद्रोह का यह स्वर दार्शनिक मतावलंबियों से लेकर सगुण – निर्गुण संतों तक में व्याप्त था।
निर्गुण विचारधारा में कबीर साहेब के यहाँ विद्रोह आंदोलन का रूप ले चुका था। प्रशासन से लेकर विकृत्त समाज व्यवस्था तक पर कबीर साहेब कटाक्ष कर रहे थे। कबीर साहेब के लिए मानवता सर्वोपरि थी। उनकी वाणियों का दूरगामी प्रभाव था। गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित उनकी वाणी से मानवता का विशाल रूप दिखाई देता है। कबीर साहेब स्पष्टवादी थे। आडंबर, ढोंग-ढकोसला, दिखावा, धार्मिक प्रहसन इत्यादि का उन्होंने घोर विरोध किया। उनका मानना था कि मनुष्य के सुखमय जीवन के लिए आपसी सहयोग और वास्तविकता से परिचित होना जरूरी है। मायावी प्रहसन, चमत्कार दिखाना, भ्रमित करना मनुष्य को कष्ट में डालना है।
15 वीं शताब्दी में कबीर साहेब भारत के सबसे प्रभावशाली संतों और कवियों में से एक थे, उनकी रचनाएँ केवल आध्यात्मिक उपदेश तक ही सीमित नहीं थीं बल्कि उन्होंने अपने समय की सामाजिक बुराइयों और असमानताओं पर भी गहरा प्रहार किया। उनकी सामाजिक चेतना उनके काव्य का अभिन्न अंग थी जिसने तत्कालीन समाज में व्याप्त आडंबर, पाखंड, जातिगत भेदभाव, धार्मिक कट्टरता और शोषण के खिलाफ एक सशक्त आवाज उठाई। भारतीय भक्ति आंदोलन के अग्रणी संतों में से एक कबीर साहेब का जीवन और उनकी वाणी सामाजिक क्रांति का पर्याय रही है। वे ऐसे समय में पैदा हुए जब भारतीय समाज धार्मिक वैमनस्य, जातिगत उत्पीड़न और सामाजिक रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था। कबीर साहेब ने अपनी सीधी-सादी लेकिन मार्मिक वाणी से इन सभी बुराइयों पर करारा प्रहार किया। उनकी सामाजिक चेतना केवल उपदेशों तक सीमित नहीं थी बल्कि उन्होंने अपने जीवन और आचरण से भी समानता, प्रेम और सद्भाव का संदेश दिया। वे किसी एक धर्म या संप्रदाय से बंधे नहीं थे बल्कि उन्होंने मानवता को सर्वोच्च धर्म माना।
कबीर साहेब का आविर्भाव 15 वीं शताब्दी के अंत और 16वीं शताब्दी की शुरुआत में हुआ था जो भारत के इतिहास का महत्वपूर्ण संक्रमण काल था। यह वह समय था जब दिल्ली सल्तनत का पतन हो रहा था और मुगल साम्राज्य की नींव पड़ रही थी। राजनीतिक अस्थिरता के साथ-साथ समाज में धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिक तनाव भी चरम पर था। हिंदू और मुसलमान दोनों अपने-अपने धर्मों के नाम पर आडंबर और पाखंड में लिप्त थे। जाति-प्रथा अपने विकराल रूप में मौजूद थी, जहाँ शूद्रों और अछूतों का जीवन नारकीय बना दिया गया था। महिलाओं की स्थिति भी दयनीय थी और उन्हें समाज में कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं थे। अंधविश्वास और रूढ़िवादिता ने समाज को पूरी तरह से जकड़ रखा था। ऐसे जटिल सामाजिक परिवेश में कबीर ने अपनी क्रांतिकारी वाणी से भारतीय समाज को एक नई दिशा प्रदान की ।
गुरु की महत्ता — कबीर साहेब ने अपनी साखी, शबद और रमैनियों में गुरु को सर्वाधिक महत्व दिया है। उनके प्रेरणा का प्रमुख स्रोत उनके गुरु ही थे जिनकी अनुकंपा से उन्होंने समस्त संकीर्ण बंधनों को तोड़ा और स्वतंत्र चिंतक बने। उन्होंने अनेक ज्ञानवर्धक सच्चाइयों को सामान्य जन तक पहुँचाया। आत्मज्ञान प्राप्त करना, मूल सत्य से परिचित होना, इन समस्त कार्यों की प्रेरणा प्रदान करने वाले उनके गुरु ही थे। मार्गदर्शन प्रदान करने वाले भी उनके गुरु ही थे। कबीर के अनुसार, गुरु के बिना जीवन अधूरा है। गुरु ही अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक होते हैं। उनका मानना था कि गुरु की कृपा के बिना मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं है। कबीर ने अपने दोहों में गुरु की महिमा का खूब गुणगान किया है। उनके अनुसार, गुरु ही ईश्वर का साक्षात् रूप हैं। गुरु की सेवा और उनके वचनों का पालन करना ही सच्ची भक्ति है। कबीर ने अपने दोहों में गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि गुरु के बिना जीवन व्यर्थ है। जैसे सूर्य के बिना दिन अधूरा है, वैसे ही गुरु के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं है। गुरु ही हमें सही मार्ग दिखाते हैं और जीवन के उद्देश्य को समझने में मदद करते हैं। कबीर के अनुसार, गुरु की महिमा अपरंपार है। वे हमें संसार के मोह-माया से मुक्त कराकर मोक्ष के मार्ग पर ले जाते हैं। गुरु की कृपा से ही हम अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं —
सतगुर की महिमा अनंत, अनंत किया उपगार,
लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावण हार।।
कबीर ने गुरु के महत्व को परमात्मा से भी बड़ा दर्जा दिया है तथा वह कहते हैं कि गुरु की भक्ति के द्वारा हमें परमात्मा मिलते हैं। वह कहते हैं —
गुरु गोबिन्द दोउ खड़े, काकै लागू पाय।
बलिहारी गुरू आपने, गोबिन्द दियो मिलाय।।
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सतगुरु हमसे रीझकर, एक कहा परसंग।
बरसा बादल प्रेम का, भीज गया सब अंग।।
धार्मिक आडंबर और पाखंड का विरोध — कबीर की सामाजिक चेतना का प्रमुख पहलू धार्मिक आडंबरों और पाखंडों का तीव्र विरोध था। उन्होंने मंदिर और मस्जिद दोनों में व्याप्त दिखावे और कर्मकांडों की कड़ी निंदा की। उन्होंने मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा, व्रत-उपवास, माला जपना, टीका लगाना आदि बाहरी दिखावों को व्यर्थ बताया है। वे कहते है —
कस्तूरी कुंडलि बसै मृग ढूंढ़े बन माहि।
ऐसे घटी घटी राम हैं दुनिया देखै नाहि॥
मूर्तिपूजा का खंडन — कबीर ने स्पष्ट शब्दों में मूर्तिपूजा का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि अगर पत्थर पूजने से भगवान मिलते हैं, तो मैं पहाड़ पूजूँगा। उन्होंने ईश्वर को सर्वव्यापी और निराकार बताया है जो किसी मंदिर या मूर्ति में सीमित नहीं हो सकता। वे कहते हैं —
पाथर पूजै हरि मिलै, तो मैं पूजूं पहार।
ताते तो चाकी भली, पीस खाय संसार।।
तीर्थयात्रा और बाह्याडंबर का विरोध — कबीर ने तीर्थयात्रा और बाहरी शुद्धता के दिखावे को भी निरर्थक माना है। उनका मानना था कि मन की शुद्धि ही वास्तविक शुद्धि है, न कि गंगा में स्नान करने से। वे कर्मकांड और धार्मिक ढकोसलेबाजी का भी विरोध करते हैं। कबीर ने बलि प्रथा, उपवास, हवन आदि निरर्थक कर्मकांडों का भी विरोध किया। उन्होंने कहा कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार के बाहरी प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं है, बल्कि सच्ची भक्ति और प्रेम ही पर्याप्त है। वे कहतेहैं —
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।।
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काँकर पाथर जोरि के, मसजिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय ॥
जातिगत भेदभाव और छुआछूत का खंडन — कबीर की सामाजिक चेतना का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम जातिगत भेदभाव और छुआछूत का प्रबल विरोध था। वे स्वयं एक जुलाहा परिवार से थे, जो उस समय निम्न जाति मानी जाती थी। उन्होंने अपनी वाणी से जाति-प्रथा के खोखलेपन को उजागर किया और समानता का संदेश दिया ।
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान।।
सामाजिक समानता पर बल — कबीर ने जोर देकर कहा कि सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं और जन्म से कोई नीचा या ऊँचा नहीं होता। सभी एक ही ईश्वर की उत्पत्ति हैं। वह निराकार सभी में विद्यमान है सभी उसी के अंश हैं फिर भेदभाव क्यों। धर्म और मतवाद को लेकर कर आपसी वैमनस्य मानवता के लिए खतरा हैं। ऐसी स्थिति में मानव का सुख-चैन खत्म हो जाता है। परस्पर प्रतिस्पर्धा और हिंसा कोई धर्म नहीं सिखाता। धार्मिक रूढ़ियों पर कटाक्ष करते हुए वे कहते हैं —
जो तू बाभन बाभनी जाया।
तो आन बाट से क्यों नहिं आया।।
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जो तू तुरक तुरकनी का जाया।
तो भीतर खतना क्यों न कराया।।
श्रम की महत्ता — झीनी झीनी बीनी चदरिया, काहे का ताना काहे का बाना, कौन तार से बीनी चदरिया , कबीर की श्रम साधना से अध्यात्म की ओर जाने की प्रेरणा है। जीविका श्रम से ही संभव है, वैराग्य सामाजिक जीवन के संघर्षों से पलायन का सूचक है। कबीर साहेब स्वयं सामाजिक जीवन में रहते हुए निर्गुण ब्रह्म की उपासना करते थे। उनका स्पष्ट संदेश था कि श्रम ही साधना का उत्तम श्रोत है। इसलिए साधक को पाखण्ड और ढोंग ढकोसला से दूर रहते हुए सामाजिक जीवन को सार्थक बनाना चाहिए। कबीर साहेब जुलाहा थे, घर पर बुनकर का काम होता था । उन्होंने बताया कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि कर्म की पवित्रता ही महत्वपूर्ण है। वे कहते हैं —
कबीर उद्यम अवगुण को नहीं, जो करि जाने कोय।
उद्यम में आनन्द है, सांई सेती होय ।।
साम्प्रदायिक सद्भाव और समन्वय का संदेश — कबीर ने अपनी वाणी साखी, सबद व रमैनी में हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के अनुयायियों को खूब फटकार लगाई और उन्हें धार्मिक कट्टरता छोड़कर प्रेम और सद्भाव से रहने का संदेश दिया है। उन्होंने दोनों धर्मों के मूलभूत सिद्धांतों में समानता देखी और बताया कि ईश्वर एक ही है, जिसे लोग अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। राम और रहीम एक ही ईश्वर के दो नाम हैं। सभी धर्मों में अध्यात्म का लक्ष्य एक ही है बस रास्ते अलग अलग हैं। धर्म और ईश्वर को लेकर व्यर्थ का विवाद पतन का कारण है।
हिंदू कहे मोहि राम पियारा, तुरुक कहे रहमाना।
आपस में दोऊ लड़ि मुए, मर्म न कोई जाना।।
स्त्री-पुरुष समानता के पक्षधर — कबीर नारी विरोधी नहीं थे, न ही वे स्त्री-पुरुष में किसी तरह का भेदभाव रखते थे। उनके यहाँ स्त्री माया, मोह, लिप्सा और मादकता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत की गई है। यदि वे – माया महा ठगिनी हम जानी , कहते हैं तो यह पुरुष की व्यक्तिगत कमज़ोरियों की ओर संकेत है। माया मनुष्य की प्राप्ति में मनुष्य दिशाहीन हो जाता है वह गलत कार्य में संलग्न हो जाता है। इससे मानवता का क्षरण होता है। हिंसा बढ़ती है। जीवन के मूल उद्देश्य में भटकाव आता है। मध्यकाल में स्त्रियों की दयनीय दशा का कारण भी मनुष्य की एकाधिकारवादी मानसिकता और लालच रहा है। इससे बचने के लिए कबीर ने स्त्री को लेकर जो कटाक्ष किया वह प्रतीकात्मक था —
नारी की झांई परत, अंधा होत भुजंग।
कबीरा तिन की कौन गति, जो नित नारी के संग।।
गृहस्थ जीवन में स्त्री के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कबीर ने उसे परिवार का आधार स्तंभ कहा है। गृहस्थी को हर स्थिति में सम्हालना, परिवार को बिखरने से बचाना, परिवार की जिम्मेदारी निभाना इन सभी को कबीर जैसे गृहस्थ संत अच्छी तरह समझते थे, अत: उनके लिए स्त्री उपभोग की वस्तु नहीं थी , सम्मान की है , बहुत आदर के साथ उन्होंने कहा है –
पतिव्रता मैली भली, काली कुचित कुरूप।
वाकै एकै रूप पर, वारूं कोटि स्वरूप ।।
शोषण और अन्याय के खिलाफ आवाज — कबीर साहेब अपने साहित्य में समाज में व्याप्त शोषण और अन्याय के खिलाफ भी आवाज उठाते हैं। उन्होंने राजाओं, धनी वर्ग और धार्मिक नेताओं द्वारा किए जा रहे शोषण की निंदा की। उन्होंने गरीबों और वंचितों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की और उन्हें आत्मबल प्रदान किया। जीवन में जो मिला उसी में संतुष्ट रहने को उन्होंने परम सुख कहा। वे कहते हैं —
गोधन, गज धन, बाजि धन और रतन धन खान।
जब आवै संतोष धन, सब धन धूरी समान।।
नैतिक मूल्यों पर बल — कबीर की सामाजिक चेतना केवल नकारात्मक पहलुओं (बुराइयों का विरोध) तक ही सीमित नहीं थी बल्कि उन्होंने सकारात्मक, नैतिक मूल्यों की स्थापना पर भी जोर दिया। उन्होंने सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, संतोष, परोपकार जैसे गुणों को जीवन में अपनाने का उपदेश दिया। उनका मानना था कि मनुष्य की जिम्मेदारी एक स्वच्छ समाज की स्थापना में है। इसके लिए नैतिकता जरूरी है जो निराकार ईश्वर के प्रति प्रेम से ही फलीभूत हो सकती है। अध्यात्मिक लगाव मानवीय संवेदनाओं को प्रकट करता है। मनुष्य दूसरे के दुख में सहभागी होता है। आपसी सहयोग की भावना भक्ति का आधार बन जाती है। यही उपासना की स्वस्थ पद्धति है।
शून्यवाद से निराकार ब्रह्म का ज्ञान — कबीर ब्रह्म का व्यवहारिक रूप समाजिक जीवन की गतिविधियों में रमता जोगी की तरह बताते हैं। सत्य अर्थात् ब्रह्म का ज्ञान – के अन्वेषण में वे एकांत और वैराग्य को उचित नहीं मानते। सत्य की खोज समाज में रहते हुए ही की जा सकती है। समाज से बाहर न ही अध्यात्म की कोई संभावना है न ही सत्य के अन्वेषण की कोई स्थिति बनती है। जीव, जगत और ब्रह्म का ज्ञान ही ज्ञान योग है। इनके प्रति जिज्ञासा का समन ही ब्रह्म की खोज है। ज्ञान योग साधना की अवस्था से ज्ञान मार्ग अध्यात्म की ओर साधक का गमन ही उसे ब्रह्म तक पहुंचाता है। फिर ब्रह्म क्या है? कबीर ने इस जिज्ञासा का भी शमन किया है।
जल में कुंभ, कुंभ में जल है बाहर भीतर पानी।
फूटा कुंभ जल जल ही समाना यह तथ कह्यो गियानी।।
यही निराकार ईश्वर की जिज्ञासा का समन है। मनुष्य ईश्वर का अंश है, ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है, मनुष्य का अंत होने पर वह ईश्वर में ही समाहित हो जाता है। यही ज्ञान मार्ग है। कबीर ने सहज साधना और आत्म-अनुभव पर जोर दिया। उनका मानना था कि ईश्वर को कहीं बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि वह तो प्रत्येक मनुष्य के हृदय में निवास करता है। आत्म-ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है और आत्म-अनुभव ही वास्तविक भक्ति है। यह उनकी सामाजिक चेतना का एक महत्वपूर्ण पक्ष था, क्योंकि इसने व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनाया और उन्हें बाहरी गुरुओं या धार्मिक संस्थाओं पर निर्भरता से मुक्ति दिलाई।
किसी भी तरह की हिंसा का विरोध — कबीर मनुष्य को दयालु और क्षमाशील बनने का संदेश देते हैं। मनुष्य को विनम्र होना चाहिए, अहंकार का त्याग करना, समरसता का भाव रखना ही सच्ची मनुष्यता है। कबीर साहेब जीव हिंसा का विरोध करते हैं। जीव हत्या करना पाप ही नहीं मनुष्य को हिंसक भी बनाता है। वे कहते हैं –
बकरी पाती खात है, ताकी खींची खाल।
जो नर बकरी खात है, ताको कौन हवाल।।
सम्पूर्ण संसार एक परिवार —
शीलवन्त सबसे बड़ा, सवाल रत्न की खानि
तीन लोक की समंदर, रही सील में आनि ।।
संत कबीर वसुधैव कुटुम्बकम की धारणा में विश्वास करते थे। समस्त विश्व को एक परिवार मानते थे। वे विश्व में सुधार हेतु सदैव विनम्रता, दया और ज्ञान का संदेश देते थे। जीवन में दया और विनम्रता से श्रेष्ठ कोई गुण नहीं है। यदि आपके पास संपूर्ण विश्व का धन होने पर भी विनम्रता का गुण न हो, तो आपको सम्मान प्राप्त नहीं हो सकता। कबीर को ‘वाणी के अधिष्ठाता’ की संज्ञा दी जाती है क्योंकि वे अपने दोहों और वाणी द्वारा संसार में विनम्रता का संदेश प्रसारित करते थे। जीवन में दया और वाणी के माध्यम से वे संसार को विनम्रता का पाठ पढ़ाते थे और समाज को एक नई दिशा प्रदान करते थे। इस प्रकार मानव अपने स्वार्थ, अहंकार, भेदभाव, सांसारिक मोह-माया जैसे मानवीय दोषों का त्याग कर एक पवित्र आत्मा बन सकता है। कबीर ने इसी पर बल दिया है। हमें छिद्रान्वेषी लोगों से मित्रता नहीं करनी चाहिए। कपटी व्यक्तियों से स्वयं को दूर रखना आवश्यक है।
कबीर की प्रासंगिकता — आज भी कबीर साहेब की सामाजिक चेतना अत्यंत प्रासंगिक है। इक्कीसवीं सदी में भी समाज धार्मिक कट्टरता, जातिगत भेदभाव, सांप्रदायिक तनाव और आर्थिक असमानता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। कबीर के विचार हमें इन समस्याओं का सामना करने और एक समतामूलक और सौहार्दपूर्ण समाज के निर्माण के लिए प्रेरित करते हैं। उनका संदेश सार्वभौमिक और कालातीत है, जो मानवता को सर्वोच्च धर्म मानने और प्रेम तथा भाईचारे के साथ रहने का उपदेश देता है।
कबीर समाज को एक संशोधित रूप में देखना चाहते थे। उनका मानना था कि ईश्वर एक है और सभी मनुष्य समान हैं। वे सामाजिक समरसता और धार्मिक सहिष्णुता के पक्षधर थे। कबीर की वाणी आज भी प्रासंगिक है और हमें जीवन जीने की सही राह दिखाती है। उनके दोहे और पद हमें नैतिक मूल्यों का महत्व समझाते हैं और एक आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। कबीर के अनुसार, सच्चा धर्म आडंबरों और दिखावे से दूर, हृदय की पवित्रता और मानवता की सेवा में निहित है। वे बाह्याडंबरों का विरोध करते थे और आंतरिक शुद्धि पर जोर देते थे। कबीर की शिक्षाएँ हमें सामाजिक कुरीतियों से मुक्त होकर एक बेहतर समाज के निर्माण की ओर प्रेरित करती हैं। डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी अपनी पुस्तक कबीर में लिखते हैं – ” कबीरदास ऐसे ही मिलन बिन्दु पर खडे थे, जहाँ एक और हिन्दुत्व निकल जाता था और दूसरी और अशिवा, जहां एक और हिन्दुत्व निकल जाता था दूसरी और मुसलमान, जहां एक और ज्ञान भक्ति मार्ग निकल जाता है, दूसरी और योग मार्ग, जहां एक और निर्गुण भावना निकल जाती है, दूसरी और सगुण साधना। उसी प्रशस्त चैराहे पर वे खड़े थे। वे दोनो को देख सकते थे और परस्पर विरुद्ध दिशा में गए और मार्गों के गुण दोष उन्हे स्पष्ट दिखाई दे जाते थे। ”
संक्षेप में, कबीर साहेब की सामाजिक चेतना उनके व्यक्तित्व और काव्य का मूल आधार थी। उन्होंने अपने समय की सामाजिक बुराइयों को पहचाना, उनका निडरता से खंडन किया और एक वैकल्पिक, अधिक समतावादी और मानवीय समाज का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने धार्मिक आडंबरों, जातिगत भेदभाव, सांप्रदायिक वैमनस्य और शोषण के खिलाफ एक सशक्त आवाज उठाई। उनकी वाणी में नैतिकता, प्रेम, समानता और मानवीय मूल्यों का गहरा समन्वय था। कबीर केवल एक संत नहीं थे, बल्कि वे एक समाज सुधारक और क्रांतिकारी भी थे, जिनके विचारों ने सदियों तक भारतीय समाज को प्रभावित किया है और आज भी हमें प्रेरणा प्रदान करते हैं। उनकी सबद और साखी केवल कविताएँ नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक परिवर्तन और आध्यात्मिक जागृति के शक्तिशाली उपकरण हैं, जो मानव मात्र को सच्चा मार्ग दिखाते हैं। कबीर की सामाजिक चेतना वास्तव में एक ऐसे समाज की कल्पना थी, जहाँ मनुष्य मनुष्य से प्रेम करे, जहाँ कोई भेदभाव न हो और जहाँ सत्य तथा प्रेम का ही बोलबाला हो ।
भाषा और शैली का प्रभाव — कबीर की सामाजिक चेतना को उनकी सरल और सीधी-सादी सधुक्कड़ी भाषा ने और भी प्रभावी बनाया। उन्होंने लोकभाषा का प्रयोग किया जिससे उनकी वाणी जन-जन तक पहुँची। उनकी उलटबांसियाँ और रूपक समाज की रूढ़ियों पर तीखा व्यंग्य करते थे। उनकी शैली में व्यंग्य, उपदेश और गहरी मार्मिकता का अद्भुत मेल था, जिसने उनके संदेश को अधिक ग्राह्य बनाया।
( लेखक अरबिंदो कॉलेज में प्रोफेसर व मीडिया विश्लेषक हैं )



