अवध की राजधानी लखनऊ के आलम बाग में वाजिद अली शाह की ऐतिहासिक इमारत
आलमआरा बेगम की कोठी (कोठी_आलमबाग)

आलेख : के सरन एडवोकेट
यह कोठी नवाबी जमाने में लखनऊ मे बनी इमारतों की श्रृंखला में बनी आखिरी कोठी है । इसे नवाब वाजिद अली शाह ने अपनी बेगम आलमआरा की फरमाइश पर बनवाया था।इसी के नाम पर इस इलाके का नाम आलमबाग पड़ा।कोठी बनने के थोड़े दिन बाद ही अंग्रेज वाजिद अली शाह को गिरफ्तार कर कलकत्ता ले गये तब अवध की वीरांगना,वाजिद अली शाह की बेगम, बेगम हजरत-महल ने अंग्रेजों खिलाफ बगावत कर दी और अपने नाबालिग बेटे बिल्कीस कद्र के सिर ताज पहना कर उसे नवाब घोषित कर दिया। इसके जवाब में अंग्रेज सेना ने लखनऊ पर चारों तरफ से हमला कर दिया।बेगम ने लखनऊ पर अंग्रेजी सेना को कब्जा करने से रोकने के लिए हर तरफ मोर्चा संभाला। 1857 के संग्राम मे 30 जून को चिनहट की ओर से घुसती अंग्रेज सेना को रोकने पर महायुद्ध हुआ।इसके बाद जुलाई अगस्त और सितम्बर इन तीन महिने मे लखनऊ में लखनऊ के बचाने वाले हिन्दू मुस्लिम जांबाज नौजवानों जो बेगम की सेना के साथ थे, ने जगह- जगह भयंकर युद्ध किया।

अक्टूबर में हैवलक के नेतृत्व में कानपुर की ओर से लखनऊ में घुसने का प्रयास करती अंग्रेजी सेना को लखनऊ के क्रांतिकारियों ने आलमबाग में रोक लिया तब भयंकर युद्ध हुआ और, कोठी के चारो तरफ बने बाग की बाउंड्रीवाल गिरा दी गई।
हैवलक के 400 सिपाही घायल हो गए । इनके लिए तथा इसी कोठी के उत्तर की ओर मृत अंग्रेज सिपाहियों को दफन करने के लिए अंग्रेजों द्वारा कब्रिस्तान बनाया गया था जिसमें जनरल आउटरम की भी कब्र है जो आज भी मौजूद है।
लखनऊ के आलमबाग चौराहे के थोड़ा पहले स्थित बांये हाथ पर शाही जमाने की यादगार, नवाबी फाटक है जिसे आज चन्दर नगर गेट के नाम से जाना जाता है।उसके पीछे अन्दर जाने पर एक सीधी पक्की सड़क है जो कोठी तक जाती है। अंग्रेजी शैली की बनी यह दुमंजिली कोठी अवध के आखिरी बादशाह (नवाब) वाजिद अली शाह ने 1755 के आसपास बनवाई थी। अब इस सड़क के दोनो और सब्जी मार्केट है।कोठी के खंडहर अभी भी इसकी बुलंदियों की गवाही देते हैं। आजादी के संग्राम के पूर्व इसकी आकृति मूलरूप में जैसी थी उसका चित्र मैंने दिया है ल

जीर्णोद्धार के बाद गेट ठीक हालत में दिखता है। गेट के पूर्वी ओर से अन्दर के भाग को देखा जा सकता है। गेट का पश्चिमी भाग आलमबाग रोड की तरफ से दिखता है पर इधर से अतिक्रमण के कारण अन्दर जाना सम्भव नहीं है।यही गेट 1857 की गदर में लखनऊ के क्रांतिवीरों को, युद्ध के दौरान गिरफतार करने के बाद अंग्रेजी सेना द्वारा फांसी के फंदे पर लटकाने के लिए इस्तेमाल किया गया था। जनरल आउटरम ने सबसे ज्यादा लोगो को इसी चन्दर नगर गेट से लटका कर फांसी चढ़ाया था।
आज यह कोठी खंडहर की शक्ल में है ।
कोठी के अन्दर जगह जगह टूटी- फूटी फर्श पर जंगली पौधे दिखते हैं।अन्दर जाने पर सांय- सांय की आवाज होती है। इसके लान वाले भाग में गेट के अन्दर सब्जी वाले ठेले खड़े करते हैं। कोई देख भाल या रख-रखाव नहीं है।यही दशा रही तो आगे चलकर इसका अस्तित्व ही मिट जायेगा।



