गरीबों का मसीहा, मजलूमों का सहारा, लखनऊ के सोनू सूद बने नेता नदीम सिद्दीकी
मसीहा बदला है, पर मकसद आज भी वही है, गरीबों की थाली में रोटी और सर पर स्वाभिमान की छत

लखनऊ की तहजीब में जहाँ बड़े-बड़े नवाबों और हुक्मरानों के किस्से मशहूर हैं, वहीं एक कहानी उन गलियों की भी है जहाँ पसीने की खुशबू और ईमानदारी की रोटी पलती है। इस कहानी के दो सबसे बड़े नायक हैं, एक जिन्होंने नींव रखी, अब्दुल रफीक खान, और दूसरे जिन्होंने इस नींव पर उम्मीदों का महल खड़ा किया, नेता नदीम सिद्दीकी।
एक वक्त था जब लखनऊ के साप्ताहिक बाजारों पर संकट के बादल मँडराते थे। गरीब पटरी दुकानदारों को उजाड़ने की कोशिशें होती थीं। तब मरहूम अब्दुल रफीक खान एक ढाल बनकर खड़े हुए। उन्होंने अपना पूरा जीवन इन बेजुबानों की आवाज बनने में लगा दिया। उनके इंतकाल के बाद लगा कि शायद अब गरीबों का कोई पुरसाहाल न होगा, लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था।
जब अंधेरा गहराने लगा, तब अध्यक्ष नदीम सिद्दीकी का उदय हुआ। आज लखनऊ के गलियारों में एक ही नाम गूँजता है, अध्यक्ष नदीम सिद्दीकी, लोग उन्हें सिर्फ एक नेता या अध्यक्ष नहीं मानते, बल्कि उन्हें लखनऊ का सोनू सूद और गरीबों का मसीहा कहते हैं। और यह खिताब उन्हें खैरात में नहीं, बल्कि उनके बेमिसाल जज्बे और खून-पसीने की मेहनत से मिला है।
आलमबाग बारा-बिरवा में लगने वाली मंगलवार बाजार जब उजड़ी गई, तो हजारों चूल्हे बुझने वाले थे। अगर उस वक्त नेता नदीम सिद्दीकी व उनकी टीम न होते, तो शायद आज हजारों परिवार फाकाकशी व भुखमरी के शिकार हो जाते। प्रशासन का दबाव और जगह की किल्लत, चुनौतियां पहाड़ जैसी थीं, लेकिन नेता नदीम का हौसला आसमान से ऊँचा था।
उन्होंने अपनी रातों की नींद हराम कर दी ताकि कोई दुकानदार भूखा न सोए। तब साप्ताहिक बाजार दुकानदार कल्याण समिति के अधिकारी एवं सदस्य और नेता नदीम सिद्दीकी ने पीडब्ल्यूडी कॉलोनी, बंगला बाजार आशियाना में जिस खूबसूरती और हक के साथ उन्होंने एक-एक दुकानदार को जमीन पर जगह दिलाई, वह किसी करिश्मे से कम नहीं है। आज वहां बाजार सिर्फ लग नहीं रही, बल्कि चहक रही है। हर दुकानदार की आंखों में जो चमक है, उसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ अध्यक्ष नदीम सिद्दीकी की नेकदिली को जाता है।
अध्यक्ष नदीम साहब की सबसे बड़ी खूबी उनकी सादगी और सुलभता है। जहाँ बड़े पदों पर बैठे लोग गरीबों को पहचानते तक नहीं, वहीं नेता नदीम सिद्दीकी हर छोटे दुकानदार के दुख-दर्द में उसके कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं।
चाहे किसी की बेटी की शादी हो, चाहे किसी बीमार का इलाज या फिर पुलिस-प्रशासन का कोई झमेला, वे एक फोन कॉल पर हाजिर हो जाते हैं। लोग कहते हैं कि अगर आज यह संगठन जिंदा है और बाजार लग रहे हैं, तो यह नेता नदीम सिद्दीकी की मसीहाई का ही असर है, वरना भूखे मरते इन गरीबों का कोई पुरसाहाल न होता।
अब्दुल रफीक खान साहब ने जो बीज बोया था, उसे अध्यक्ष नदीम सिद्दीकी ने अपनी ममता और मेहनत से एक विशाल वटवृक्ष बना दिया है। आज लखनऊ के साप्ताहिक बाजार के हजारों दुकानदार हाथ उठाकर उनके लिए दुआएं करते हैं, नदीम सिद्दीकी सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों की आखिरी उम्मीद हैं, जिनके घर का दीया इन बाजारों की बदौलत जलता है। सच ही है, फरिश्ते आसमान से नहीं उतरते, वे नदीम सिद्दीकी जैसे इंसानों के रूप में हमारे बीच ही रहते हैं।
*बॉक्स में,*
*चिराग बुझते हैं मगर रोशनी नहीं मरती, विरासत वही है जो गरीबों के काम आती है।*
कैसे बारा-बिरवा से हटी बाजार को नेता नदीम सिद्दीकी ने अपनी ईमानदारी से दोबारा आबाद किया?
क्या एक संगठन का अध्यक्ष केवल नेता होता है या परिवारों का रक्षक भी?
अब्दुल रफीक खान के उसूलों को नदीम सिद्दीकी ने कैसे बनाया एक विशाल वटवृक्ष?
कौन था वो शख्स जिसने अपनी पूरी जिंदगी गरीबों की पटरी बचाने में लगा दी?
अब्दुल रफीक खान के बाद किसने संभाली इन हजारों बुझते हुए चूल्हों की जिम्मेदारी?
क्यों आज साप्ताहिक बाजार के दुकानदार नदीम सिद्दीकी को अपना सोनू सूद और मसीहा मानते हैं?



