केजीएमयू के आउटसोर्सिंग कर्मचारियों का सब्र टूटा
वादे और हकीकत के बीच फंसा हज़ारों परिवारों का भविष्य

लखनऊ। राजधानी के प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) के गलियारों में इन दिनों सेवा भाव के साथ-साथ आक्रोश की गूंज भी सुनाई दे रही है। यह आक्रोश उन हज़ारों आउटसोर्सिंग संविदा कर्मचारियों का है, जो अस्पताल की व्यवस्था को अपनी मेहनत से सींचते हैं, लेकिन बदले में उन्हें केवल ‘आश्वासन’ और ‘शोषण’ मिल रहा है। हाल ही में केजीएमयू कैंपस सभागार में हुई विशाल आम सभा इस बात का प्रमाण है कि अब इन कर्मचारियों का धैर्य जवाब दे रहा है।
कर्मचारियों की सबसे बड़ी पीड़ा का कारण निगम के गठन में हो रही देरी है। मुख्यमंत्री द्वारा एक वर्ष पूर्व की गई घोषणा के बावजूद, अब तक निगम धरातल पर नहीं उतर सका है। कर्मचारियों का कहना है कि प्रशासन निगम बनने का हवाला देकर उनकी वार्षिक वेतन वृद्धि को भी रोक चुका है। यह स्थिति एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा जैसी हो गई है न नया ढांचा मिला, न पुराने अधिकार बचे।
बैठक में ‘संयुक्त स्वास्थ्य आउटसोर्सिंग संविदा कर्मचारी संघ’ के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि प्रशासन की नीतियां अक्सर कर्मचारियों के हित में नहीं दिखतीं। महामंत्री मनोज के अनुसार, विश्वविद्यालय प्रशासन और आउटसोर्सिंग एजेंसियों के बीच के तालमेल की कमी का खामियाजा सीधा कर्मचारी भुगत रहा है। वेतन कटौती और समय पर भुगतान न होना अब एक आम समस्या बन चुकी है, जिस पर एजेंसी संचालक जानबूझकर चुप्पी साधे रहते हैं।
संघ के प्रदेश अध्यक्ष रितेश मल्ल ने सीधे शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि एक महीने के भीतर समस्याओं का ठोस समाधान नहीं निकाला गया, तो केजीएमयू के कर्मचारी सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे। उनकी प्रमुख मांगें स्पष्ट हैं।
केजीएमयू जैसे संस्थान की साख वहां के डॉक्टरों के साथ-साथ इन छोटे कर्मचारियों के कंधों पर भी टिकी होती है। यदि इन ‘कोरोना वॉरियर्स’ और स्वास्थ्य रक्षकों को अपने हक के लिए काम छोड़कर सड़कों पर आना पड़ा, तो इसका सीधा असर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ेगा। अब गेंद शासन और प्रशासन के पाले में है।



