बार कौंसिल चुनाव में वकीलों की आवाज़ बने रजनीकांत दुबे!

लखनऊ। वकीलों के हक की लड़ाई लड़ने वाले, बार कौंसिल की राजनीति के दाँव-पेंच को चुनौती देने वाले रजनीकांत दुबे मैदान में हैं। जब भी उत्तर प्रदेश बार कौंसिल के चुनावों में प्रत्याशियों के जीतने के बाद सरकारी वकील बन जाने और जमीनी मुद्दों को छोड़ देने की निराशाजनक कहानी दोहराई जाती है, तब यह चेहरा इन सभी परिपाटियों को तोड़ने का संकल्प लेकर आया है।
उत्तर प्रदेश बार कौंसिल के रण में प्रत्याशियों की दौड़ तो जारी है, लेकिन हर बार की तरह बड़े-बड़े वादों की बौछार के बाद वकीलों को सिर्फ निराशा ही हाथ लगती है।
यही वह दर्द है जिसे रजनीकांत दुबे ने अपना मुद्दा बनाया है। उन्होंने सीधे तौर पर उस विसंगति पर प्रहार किया है जहाँ वकील चुनाव जीतकर आते हैं, पर अपने सदस्यों के मुद्दे छोड़कर सरकारी वकील बनकर सत्ता की ओर रुख कर लेते हैं। पिछली बार राजधानी से आए सातों विजेता वकीलों का सरकारी वकील बन जाना इस कड़वी हकीकत का प्रमाण है, जिसके चलते वकीलों के मुद्दे वहीं के वहीं दबे रह गए।
33% महिला आरक्षण, महिला वकीलों को समुचित प्रतिनिधित्व दिलाने की निर्णायक माँग। कनिष्ठ वकीलों को आर्थिक संबल, सरकार से सहायता उपलब्ध कराना ताकि नए वकीलों को वकालत करने में राहत मिल सके। मुख्यमंत्री द्वारा मदद का वादा पूरा न होने का भी उठाया मुद्दा। वकीलों की आर्थिक स्थिति में सुधार।
इस चुनावी माहौल में रजनीकांत दुबे ने बड़ा और साहसिक ऐलान किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वकीलों के चाहे मुद्दे छोटे हों, चाहे बड़े… सारे मुद्दे मेरे अपने मुद्दे हैं। दुबे ने दृढ़ संकल्प लिया है कि वे 33% आरक्षण और वकीलों की आर्थिक स्थिति जैसे सभी ज्वलंत मुद्दों पर एक पैर से खड़े रहेंगे। उन्होंने अपने घोषणा पत्र के सभी वादे चुनाव जीतने के बाद पूरी ईमानदारी से निभाने का वादा किया है, ताकि अब वकील सिर्फ मायूस न हों।
इस संकल्प की गंभीरता को दर्शाते हुए, दुबे के जूनियर श्रेय श्रीवास्तव ने महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की माँग को लेकर हाई कोर्ट में एक रिट याचिका भी दाखिल कर दी है। यह दर्शाता है कि उनकी लड़ाई सिर्फ चुनावी मंच तक सीमित नहीं, बल्कि क़ानूनी मोर्चे पर भी शुरू हो चुकी है।


