मोदी जी का कमिटमेंट देश के मजदूरों, किसानों से, महिलाओं, युवाओं, बेरोजगारों, गरीबों से नहीं, कमिटमेंट अडानी और अमरीका से : सुप्रिया श्रीनेत

नई दिल्ली : कांग्रेस की जानी मानी नेता सुप्रिया श्रीनेत ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि एक पिक्चर का डायलॉग है – ‘एक बार मैंने कमिटमेंट कर दी तो मैं खुद की भी नहीं सुनता’। ये डायलॉग मोदी जी बोलते हैं और चरितार्थ भी करते हैं। एक बार उन्होंने कमिटमेंट कर दी तो वो खुद की भी नहीं सुनते हैं, लेकिन कमिटमेंट देश के मजदूरों से, देश के किसानों से, महिलाओं से, युवाओं से, बेरोजगारों से, गरीबों से नहीं, कमिटमेंट अडानी और अमरीका से।
जब मोदी जी देश के प्रधानमंत्री नहीं थे तो मोदी जी कहते थे, हिमाचल उनका दूसरा घर है और सेब पर… वॉशिंगटन एप्पल जो अमरीका से हम इम्पोर्ट करते हैं, आयात करते हैं… उस सेब पर वो 100 प्रतिशत इम्पोर्ट ड्यूटी लगा देंगे, तब वो प्रधानमंत्री नहीं थे, ऐसी बातें कहते थे, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद रिपोर्टस के अनुसार जी20 के वक्त पर हमारी केन्द्र सरकार ने ये निर्णय लिया है कि वॉशिंगटन एप्पल पर, जो सेब हम अमरीका से आयात करेंगे उस पर सिर्फ और सिर्फ 15 प्रतिशत इम्पोर्ट ड्यूटी लगेगी, इम्पोर्ट ड्यूटी को 70 प्रतिशत से काटकर 15 प्रतिशत पर ले जाया जाएगा।

ये कमिटमेंट मोदी जी ने अमरीका से की, ये कमिटमेंट करते वक्त मोदी जी एक बात भूल गए। जब जून में जा रहे थे अमरीका तो 70 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत करने की बात कही थी, तभी स्टेट डिनर भी मिला था, एक डिफेंस डील भी की थी, मैक्रों को भी बुलाया था और अब जब अमरीका यहां आया तो उनको तोहफ़ा दिया। मेजबान हो तो नरेन्द्र मोदी जी जैसा।
अमरीका के राष्ट्रपति हिन्दुस्तान आते हैं, वॉशिंगटन एप्पल पर इम्पोर्ट ड्यूटी मात्र 15 प्रतिशत आ जाती है, घट जाती है और अपने किसानों के लिए वो बड़ा तोहफ़ा लेकर वापस चले जाते हैं। हमारे किसानों पर मोदी जी चाबुक चलाएंगे और अमरीका के किसानों को बड़ा तोहफ़ा देंगे, ये काम मोदी जी ही कर सकते हैं, वो ही हैं तो मुमकिन है और असलियत ये भी है कि अमरीका में सेब उगाने वाले बड़े कॉर्पोरेशन्स होते हैं, उनको सरकार बड़ी सब्सिडी देती है, उसको बीज पर सब्सिडी मिलती है, खाद पर मिलती है, कीटनाशक पर मिलती है और हमारे यहां जो सेब उगाने का काम है वो मूलत: 3 राज्यों में होता है, जिनके ऊपर चाबुक चला रहे हैं मोदी जी, क्योंकि अमरीका को खुश रखना है, जो बाइडेन से गलबैया करनी हैं, विश्व गुरु बनना है।
अपने किसानों पर, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और थोड़ा-बहुत उत्तराखंड में… करीब 60 प्रतिशत सेब सारा जम्मू-कश्मीर में होता है, करीब 25-30 प्रतिशत होता है हिमाचल में और थोड़ा-बहुत उत्तराखंड में।
आप ये सोचिए कि हिमाचल जो एक दैवीय आपदा से जूझ रहा है, जहां पर 10,000 करोड़ का अनुमानित नुकसान अभी तक हो चुका है, जहां पर सरकार और लोगों को जरूरत है सहायता की, जरूरत है सहृदयता की, वहां पर 5 लाख से ज्यादा वो लोग जो सेब उगाते हैं, उनके साथ नाइंसाफी करने का काम मोदी जी ने किया है। हिमाचल की जीडीपी का करीब 14 प्रतिशत हिस्सा सेब से आता है, सेब के बागानों से, सेब उगाने वालों से और एक ये भी बात सच है कि हिमाचल में करीब 3 करोड़ 60 लाख डिब्बे सेब के हर साल पैक होते थे, वो इस आपदा की वजह से, बारिश की वजह से, बेमौसम जितनी आपदा ये हो रही है, जितनी त्रासदी हो रही है वो ऑलरेडी घटकर करीब-करीब 1 करोड़ 90 लाख पर आ गया है, आधे से थोड़ा सा ज्यादा रह गया है, लेकिन सरकार को कोई चिंता नहीं है, कोई फर्क नहीं पडता मोदी जी को कि हिमाचल जूझ रहा है दैवीय आपदा से तो उनके ऊपर ये चाबुक न चलाया जाए, उनके सेब के बागानों पर ये प्रहार न किया जाए, वॉशिंगटन एप्पल पर इम्पोर्ट ड्यूटी न घटाई जाए।
यही हाल कश्मीर का है। 2019 से लॉकडाउन, लॉकडाउन, लॉकडाउन कश्मीर की इकोनॉमी पूरी तरह से तबाह थी, थोड़ी-बहुत संभलनी शुरू हुई तो वॉशिंगटन एप्पल पर इम्पोर्ट ड्यूटी घटा दी गई, कश्मीर के सेब के जो बागान वाले हैं, कश्मीर के सेब के जो किसान हैं, जो उगाते हैं सेब, उन पर चाबुक चल रहा है। इम्पोर्ट ड्यूटी बादाम पर घटाई गई, अखरोट पर घटाई गई, ये भी दोनों चीजें जम्मू-कश्मीर में पैदा होती हैं। तो किस बात का बदला मोदी जी ले रहे हैं, ऐसा वो क्यों कर रहे हैं? क्या वो नहीं जानते कि हिमाचल में दैवीय आपदा है, वहां पर समर्थन चाहिए, वहां पर सहायता चाहिए, उसको तो नेशनल डिज़ास्टर घोषित करके सरकार को अभी तक सहायता दे देनी चाहिए थी, क्यों ऐसा कर रहे हैं मोदी जी?
पहले उन्होंने अडानी के हाथों में सेब के बागान दे दिए हिमाचल के और एक ये भी सच है कि अडानी ने 88 रुपए प्रतिकिलो से शुरुआत की थी, वो घटकर 72 रुपए प्रतिकिलो हो गई और लोग सड़कों पर उतर आए, प्रदर्शन करने लगे, धरना करने लगे। तो मोदी जी ने कहा मेरे मित्र के खिलाफ अगर आवाज उठाई तो तुम्हें मैं सबक सिखाऊँगा। तो जो कमिटमेंट उन्होंने अडानी से की थी, उसको पूरा करने के लिए, जो कमिटमेंट उन्होंने अमरीका से की थी उसको पूरा करने के लिए अपने किसानों पर हल्ला बोल दिया है, अपने किसानों पर प्रहार कर दिया, अपने किसानों पर चाबुक चलाने का काम कर दिया है।
मुझे इसके अलावा और कोई कारण नजर नहीं आता कि क्यों हम वॉशिंगटन एप्पल पर इम्पोर्ट ड्यूटी घटाकर महज 15 प्रतिशत कर देंगे, जिसको 100 प्रतिशत करने की बात मोदी जी करते थे। गुजरात का मुख्यमंत्री और देश का प्रधानमंत्री… इतना विरोधाभास है उनकी बातों में किसी भी मुद्दे को उठाकर देख लीजिए, वो क्या कहते थे और वो क्या कर रहे हैं मानो 2 बिल्कुल अलग-अलग लोग हों और यही काम सेब के बागानों के साथ भी हुआ है।
तो इस मंच से हमारी डिमांड है कि चाहे वो जम्मू-कश्मीर हो, चाहे वो हिमाचल हो, हिमाचल की दैवीय आपदा, जम्मू-कश्मीर के जो लॉकडाउन के बाद, जो क्लैम्पडाउन के बाद थोड़ी-बहुत चीजें सुधरनी शुरू हुई थी, ये काम मत कीजिए, ये किसान विरोधी है, ये सेब के बागानों के विरोध में है, ये उन लोगों के विरोध में है जो बड़ी मुश्किल से अपनी गुजर-बसर कर रहे हैं, ये उन लोगों के विरोध में है जिनका प्रोडक्शन ऑलरेडी बुरी तरह से गिर चुका है।
तो सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए, रिथिंक करना चाहिए और अपनी इम्पोर्ट रेजीम को ऐसा बनाना चाहिए कि देश के किसानों को फायदा हो, आपने बड़ा तोहफ़ा अमरीका के किसानों को दे दिया। अरे कभी अपने किसानों के बारे में भी सोचते, अपने किसानों को बड़े-बड़़े पर्दों के पीछे छुपा दिया जाता है कि गरीब हैं, कहीं नजर न आ जाएं। तो अपने किसानों के बारे में सोचिए, इस मुद्दे पर, इस विषय पर पुनर्विचार करिए और सुनिश्चित करिए कि आपकी कोई भी नीति पहले अपने लोगों का भला करे, बाकियों का भला बाद में कीजिएगा और मैं इस बात को इसलिए थोडा पुरजोर तरीके से कह रही हूं, क्योंकि मोदी जी की जो बातें हैं, प्रधानमंत्री बनने के बाद वो भी विरोधाभास में हैं, ‘वोकल फॉर लोकल’ और लोकल का ही गला घोंट रहे हैं।
ये लोकल सेब के किसानों का गला घोंटने का काम कर रहे हैं मोदी जी। 5 लाख से ज्यादा लोग हिमाचल में सेब उगाने का काम करते हैं और उससे ज्यादा लोग, उससे संबंधित हैं उस सेब के कारोबार से। तो वोकल फॉर लोकल का भी गला घोंट रहे हैं, किसानों का भी घोंट रहे हैं, तोहफ़ा भी अमरीकी किसानों को दे रहे हैं, अपनों पर चाबुक चला रहे हैं। ऐसा आप क्यों कर रहे हैं, ये मोदी जी ही बता सकते हैं, लेकिन इस पर तुरंत पुनर्विचार करने की जरूरत है, क्योंकि जिन 2 जगहों पर इस देश में सेब उगाया जाता है, वो बहुत गंभीर परिस्थितियों से जूझ रही हैं।
एक प्रश्न पर कि जिस तरह से आयात शुल्क में कटौती की है, उससे जम्मू-कश्मीर के लोगों की आर्थिक समस्याएं और बढ़ेंगी? श्रीमती सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि बिल्कुल और यही हम भी कह रहे हैं। आर्थिक समस्याएं बढ़ेंगी नहीं, आर्थिक समस्याएं भयावह रूप ले लेंगी। जिस स्टेट का 15 प्रतिशत जीडीपी सेब से आता है, जहाँ पर एक दैवीय आपदा आई हुई है, जहाँ पर बारिश थमने का नाम नहीं ले रही हैं। बड़े-बड़े पुल, बड़े-बड़े ब्रिज, बड़े-बड़े घर, होटल रेत की तरह बह गए हैं, जहाँ पर सरकार को नेशनल डिजास्टर घोषित करके वहाँ पर राहत का पैकेज देना चाहिए, वहाँ पर सरकार किसानों पर प्रहार कर रही है। जम्मू-कश्मीर की इकॉनोमी का बहुत बड़ा एक हिस्सा प्रभावित हुआ था, जब 2019 से लॉकडाउन टाइप की सिचुएशन वहाँ पर बनी हुई थी और उसका क्या हुआ? आपने किसानों को राहत देने की बजाए, जम्मू के किसानों को, कश्मीर के किसानों पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाने का काम किया है। तो बेलआउट पैकेज देने की बजाए और किसानों का दम घोटने का काम कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं, क्योंकि आपको अमेरिका के कमिटमेंट पर सोचना है, आपको अडानी के बारे में सोचना है। तो कहीं पर सरकार को ये भी सोचना पड़ेगा ना कि आपकी प्राथमिकता क्या है, आपकी प्रायोरिटी क्या है, आप किसके सगे हैं। आप किसान के सगे हैं या आप अमेरिकी किसान से अपने संबंध निभा रहे हैं? मेरा तो ये मानना है कि जहाँ पर बड़े-बड़े कॉर्पोरेशन काम करते हैं सेब के बगानों में अमेरिका में, जहाँ पर उनको बड़ी सब्सिडी मिलती है, उसके एवेज में हमें अपने किसानों को प्रोत्साहन देना चाहिए, पैकेज देना चाहिए, आर्थिक सहायता देनी चाहिए, उसकी बजाए हम उनका गला मरोड़ने का काम कर रहे हैं, दम घुटाने का काम कर रहे हैं।
एक अन्य प्रश्न पर कि बादाम पर इम्पोर्ट ड्यूटी घटा दी है क्या? श्रीमती श्रीनेत ने कहा कि जी, हाँ बादाम पर, अखरोट पर, इन सब चीजों पर इम्पोर्ट ड्यूटी घटाई गई है और ये कहाँ पर पैदा होते हैं, ये आप देख लीजिए। क्या मोदी जी जम्मू-कश्मीर से अपनी दुश्मनी निभा रहे हैं? क्या वो हिमाचल से अपनी हार का बदला ले रहे हैं? क्या अडानी के खिलाफ हुए प्रदर्शन का बदला ले रहे हैं, मुझे नहीं पता। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि प्रतिशोध की राजनीति में अब उनके प्रतिद्वंदी नहीं, प्रतिशोध की राजनीति में इस देश का किसान, इस देश का युवा, इस देश का बेरोजगार, इस देश का मजदूर, इस देश की महिला है और इसका कोई कारण ही नहीं हो सकता है।
एक अन्य प्रश्न पर कि रविशंकर प्रसाद ने इंडिया गठबंधन को लेकर जो बयान दिया है, क्या कहेंगी? श्रीमती श्रीनेत ने कहा कि भाजपा से हमें दो-तीन सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। एक राष्ट्रवाद पर, एक सनातन धर्म पर और एक हमारे आजादी के आंदोलन के कंट्रीब्यूशन पर, क्योंकि इन सब पर उनका स्कोर निल-बटे सन्नाटा है। कांग्रेस पार्टी सर्वधर्म समभाव में यकीन करती है और हमें किसी से इस सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं है और खासतौर से उन ढोंगियों से जो इस तरह की बातें करते हैं। हम सर्वधर्म समभाव में विश्वास करते हैं, इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कहूंगी। हम उस धर्म में विश्वास करते हैं, जिसका बड़ा ग्रंथ ये कहता है- “दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज नहीं काहू व्यापा”। हम उस धर्म में विश्वास करते हैं जहाँ पर “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” कहा जाता है।
तो पहले इन बातों का जवाब दें। लोग भूख से, बेरोजगारी से मर रहे हैं। आपको जी-20 के वक्त बड़े-बड़े पर्दे लगाने पड़ गए, बड़ी-बड़ी दीवारें खड़ी करनी पड़ गईं कि देश के गरीब ना दिख जाएं। आप किसके सगे हैं? मणिपुर में महिलाओं को नंगा परेड़ कराया गया। मणिपुर में दो दिन पहले चार लोगों की हत्या हुई। घाटी में 6 जगह कर्फ्य़ू लगा हुआ है, खबर आ रही है कि कुछ पुलिस वालों और आर्मी की झड़प हुई। आप किसके सगे हैं? किस महिला का सम्मान करते हैं आप? जिस दिन “दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज नहीं काहू व्यापा” नहीं कहिएगा, उस दिन आप सनातन धर्म पर बात करिएगा। सर्वधर्म समभाव हमारे देश की नींव है और हम उसमें यकीन रखने वाले लोग हैं।
जेडीयू के अध्यक्ष ललन सिंह के एक वक्तव्य को लेकर पूछे एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्रीमती श्रीनेत ने कहा कि अब ये आपका ही कहना है कि उन्होंने साफ तौर से नहीं कहा और सुझाया, पता नहीं आपको सुझाया, आपने इंटरप्रटेशन किया, आपने अपनी क्रोनोलॉजी बनाई, पता नहीं। मेरे इंटरप्रटेशन और आपके इंटरप्रटेशन में अंतर हो सकता है। मुझे लगता है कि ये जो सारी बातें की जाती हैं मीडिया में, करेंगे आप लोग, आप लोगों का काम है इनफरेंस निकालना, आपका काम है अटकलें लगाना, अटकलों का बाजार गर्म भी रहना चाहिए, तभी थोड़ा मौज-मसाला चलता रहता है। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि इंडिया के 28 घटक दल एक बात को लेकर सर्वसम्मति से एकसाथ खड़े हैं और वो है इस देश के संविधान को सर्वोपरि रखना। इस देश को संविधान से चलाना, इस देश के युवाओं और बेरोजगारों के बारे में चर्चा करना, महंगाई पर बात करना, आर्थिक असमानता पर बात करना, जलते हुए मणिपुर पर बात करना, अडानी महाघोटाले पर बात करना और उस पर हमारी सर्वसम्मति है। बाकी ठीक है, कोई कुछ कहता है, अच्छी बात है कहनी चाहिए। आप लोगों की खबरें कहाँ से लगेंगी, अगर कोई कुछ कहेगा नहीं तो।
एक अन्य प्रश्न कि बीजेपी के एक कैबिनेट मंत्री कह रहे हैं कि अगर कोई सनातन धर्म के खिलाफ बोलेगा, तो उसकी जुबान काट ली जाएगी, उसकी आंखें निकाल ली जाएंगी? श्रीमती श्रीनेत ने कहा कि मुझे लगता है कि जो मुझे बोलना है, मैं बोल चुकी हूं और आपने जो उल्लेख किया है मेरा धर्म और मैं हिंदू धर्म की अनुयायी हूं, वो इस तरह की भाषा और अमर्यादा नहीं सिखाता है, इसलिए ढोंगी शब्द का प्रयोग किया था।
एक अन्य प्रश्न पर कि नए संसद भवन में जो विशेष सत्र बुलाया जा रहा है, उसमें कहा जा रहा है कि कर्मचारी नई ड्रेस में होंगे? श्रीमती श्रीनेत ने कहा कि ऐसा है हर चीज पर टिप्पणी करना जरुरी नहीं है। कुछ चीजें तो ये देश भी देख रहा है। जब रानी नाम की एक 20-22 साल की लड़की कहती है कि हम कीड़े-मकोड़े नहीं हैं, हमें इस तरह से सरकार क्यों छुपा रही है, सांस लेना मुश्किल हो रहा है, यहीं दिल्ली शहर में, क्योंकि उसके आगे बड़ी दीवार बन जाती है। वो असलियत है आज इस देश की मुझे लगता है कि इस तरह की अटकलों पर टिप्पणी करने से बेहतर है, हम फिर से सरकार से ये पूछेंगे कि आज तक 6 स्पेशल सत्र हुए हैं। हर स्पेशल सत्र का एजेंडा बताया गया है। आपने भी कुछ स्पेशल सत्र किए थे, आपने भी एजेंडा बताया है। उस परंपरा को, उस मर्यादा को, उस गरिमा को क्यों भंग कर रहे हैं, लोगों को बताइए ये कोई बर्थडे पार्टी थोड़े ही है कि आओ-आओ मैं सरप्राइज दूंगा, सरप्राइज बर्थडे पार्टी है। यहाँ आ कर पता चलेगा क्या हो रहा है, अरे ये देश का सदन है, संसद है, किसी कानून से चलता है। संविधान से चलता है, ये क्या देश का इन्होंने मखौल बना दिया है। मतलब आप 50 लोग यहाँ बैठे हैं, हमारी पार्टी, बाकी विपक्षी पार्टियां, बाकी मीडिया,अटकलें चल रही है कि भाई संसद में इस बार क्या होगा।
मतलब जादूगर कोई आया है वो क्या करेगा इस बार। इस बार बच्चे की सरप्राइज की बर्थडे पार्टी में क्या ट्रिक कराएंगे मम्मी पापा। अरे देश का संसद है, देश का सदन है, एक गरिमा होती है, एक मर्यादा होती है हर स्पेशल सत्र के पहले एजेंडा शेयर किया जाता है। वो एजेंडा शेयर क्यों नहीं किया जा रहा है, मुद्दा ये है, ये सारी चीजें नहीं हैं।
एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्रीनेत ने कहा कि देखिए ऐसा है उन्होंने क्या कहा, नहीं कहा, जलेबी बनाने का काम ये सरकार करती है। ये एक नया शगूफा छोड़ दिया गया है। ये सरकार दो तरीकों से चलती है, एक – चरण चुंबक मीडिया को नए-नए शगूफे दिया करो। तो महंगाई पर, बेरोजगारी पर, मणिपुर पर, अडानी महाघोटाले पर डिबेट ही ना हो। फिर लोगों को भेज दो प्रेस वार्ता में, वो जाकर प्रेस वार्ता में व्यवधान डालें, विघ्न डालें और इधर-उधर मुद्दा भटक जाए और तीसरा चलता है, शगूफे छोड़ते रहो, एक के बाद एक होट एयर बलून, गुब्बारे छोड़ते रहो, लोग उसी में बिजी रहेंगे, उसी में उलझे रहेंगे, कौन आपसे सवाल पूछ रहा है। यूसीसी एक हॉट एयर बैलून, वन नेशन वन इलेक्शन एक हॉट एयर बैलून, इंडिया भारत एक हॉट एयर बलून, 2019 में सीएए आया था, आज तक नियम नोटिफाई नहीं हुए, वो एक होट एयर बैलून, तो दिक्कत की बात ये है कि सरकार इन्हीं सब शगूफे पर चलती है। अब ये शगूफा है कि डीजल व्हीकल पर टैक्स लगेगा, अब इस पर होंगे डिबेट। फिर कह दिया जाएगा, नहीं-नहीं हम तो कुछ ऐसी बात कर रहे थे। डीजल इस देश का मुख्य ट्रांसपोर्ट फ्यूल है। डीजल के दाम बढ़ने से सबसे ज्यादा प्रभाव किसानों पर पड़ता है। डीजल का दाम बढ़ने से सब्जी, फल, आटा सबकुछ महंगा होता है। डीजल के दाम बढ़ने से इन्फ्लेशन बढ़ता है। ये सरकार जो है, ये समझती नहीं है कि डीजल का दाम बढ़ने से किसान की जेब से जो आपने 30 लाख करोड़ कर में लूटे हैं, उसका वापस करने का वक्त है और गला घोंटने कर पैसा खींचने का वक्त नहीं है।



