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आरिफ नकवी का लघु उपन्यास मात्र साहित्यिक कृति नहीं है : एक पैगाम है सिरफिरों को !  

के. विक्रम राव
बर्लिन में बसे पत्रकार मेरे अजीज मित्र जनाब आरिफ नकवी का ताजातरीन लघु उपन्यास “बुझते जलते दीपक” वस्तुतः अकलंकारी अर्थों में एक स्कर्ट (लहंगा) जैसा है। विंस्टन चर्चिल की मशहूर उक्ति थी : “राजनेता का भाषण स्कर्ट जैसा हो। लंबा ताकि पूरा विषय उल्लिखित हो जाए। छोटा भी ताकि जनरुचि बनी रहे।” ठीक ऐसी ही है आरिफभाई की लघु रचना। आज के सांप्रदायिक माहौल पर एक उम्दा भाष्य हैं। पाठक की उत्सुकता अंत तक कायम रहती है। एक संदेश भी देती है विकृत अवधारणा पालनेवालों को। इन दोनों संप्रदाय के मतावलंबियों को। गंगा और यमुना की धाराएं भले ही समांनातर बहती रहती हैं। मगर दर्शकों को संगम देखना चाहिए। आरिफ इसी संगम की भावना को बेहतरीन, मर्मस्पर्शी तरीके से रेखांकित कर देते हैं।

आखिरी पृष्ठ में। यदि यह एक लघु कहानी होती तो भावुकता के पैमाने पर सुदर्शन की कहानी “हार की जीत” जैसी दिल को छू जाने वाली होती। बाबा भारती के प्रिय घोड़े को डाकू खड़गसिंह छल से उड़ा ले जाता है। अंत में पश्चाताप करता है। वापस लौटा देता है। ठीक यही होता है आरिफभाई के मुख्य पात्र साजिद के प्रकरण में। आखिरी क्षण में बम का रिमोट वह नहीं दबाता है क्योंकि उस भीड़ में एक नन्ही बच्ची उसे दिखती थी। उसे तभी कोई स्वजन याद आ जाता है। नरसंहार बच जाता है। उसे अहसास हो जाता है कि इस्लाम यह कदापि नहीं सिखाता है। हैवानी हिंसा को। उनका बीजमंत्र यही है। पूरा लघु उपन्यास यही पैगाम देता है। वर्तमान भारतीय समाज को, उसके हर आतंकी को। आरिफभाई की हृदयगत जज्बातों की अभिव्यक्ति में उन्हें बड़ा लाभ मिला, उनके बहुमुखी होने से और देश दुनिया की उनकी लंबी यात्राओं से। उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी, जर्मन आदि में तो उन्हें महारत है ही। वैचारिक रूप से भी वे बड़े सुलझे हुये हैं। संकीर्णता से कोसों दूर।
हम दोनों साथ रहे थे लखनऊ विश्वविद्यालय में। पचास के दशक में। एक वर्ष वे मेरे सीनियर रहे। पर राजनीतिक चिंतन में काफी दूर। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के छात्र संघ स्टूडेंट फेडरेशन के आरिफ पुरोधा थे। तब तक पार्टी में विभाजन नहीं हुआ था। हिंदी-चीनी भाई भाई का दौर था। उसी कालखंड में सोशलिस्ट पार्टी से संबद्ध समाजवादी युवक सभा का मैं विश्वविद्यालय में सचिव था। मगर पार्टी तब टूट चुकी थी। डॉ राममनोहर लोहिया को प्रजासोशलिस्टों ने निष्कासित कर दिया था। आरिफ भाई और मैं सदा सुहृद रहे। गहरी आत्मीयता थी। हालांकि आरिफभाई से हर व्यक्ति मित्रता संजोना चाहेगा। उनकी विशिष्टता ही कुछ ऐसी थी। कशिश पारदर्शी थी।
इस लघु उपन्यास में आरिफभाई ने अवध की मूल संस्कृति को निरूपित किया है। यूरोप तथा पश्चिम एशिया के जीवन जिसकी उन्हें काफी निजी प्रतीती है की यह झलकी है। एक लखनवी होने के नाते मैं तेलुगुभाषी इस लघु उपन्यास का एक अंश उधृत करना चाहूंगा। हमारे पुराने लखनऊ का वर्णन है : “चौक के पास एक सड़क नख्खास कहलाती है। वहां सड़कें चौड़ी थीं, कारें और तांगे और यक्के भी गुजरते थे। हर इतवार को वहां कई मील तक विशेष बाजार लगता था, जहां संसार भर की पुरानी मूल्यवान वस्तुएं कौड़ियों के भाव मिलती थीं। चाहे पुरानी पुस्तकें हों या पुस्तकों की अलमारियां, मेजें, लैंप शेड, झाड़ फानूस, मुरादाबादी या चीनी के बर्तन और दूसरी मूल्यवान वस्तुएं, जिन्हें लोग अपनी गरीबी के कारण अपने घरों में नहीं रख सकते थे और कौड़ियों के मोल बेच जाते थे।”
इस रचना के संदर्भ में आरिफभाई का सिरफिरे जिहादियों को एक बड़ा मानवीय परामर्श भी है। उनके उद्गार हैं : “फितना मचाना कोई जेहाद नहीं है।” अगली ही पंक्तियों में यही मशहूर श्रमजीवी पत्रकार स्वयं के बारे में बताते हैं : “आरिफ हूं, दर्दमंद हूं। पत्थर नहीं कोई।” शब्द आरिफ के मायने यूपी हिंदी संस्थान द्वारा प्रकाशित “उर्दू-हिंदी शब्दकोश” लेखक : मुहम्मद मुस्तफा खां “मद्दाह” (प्रशंसक) के अनुसार : “वाकिफ, ज्ञाता, जाननेवाला, परिचित” आदि। फिर इस्लामी उग्रवाद का आरिफभाई सम्यक विश्लेषण करते हैं क्योंकि इस लघु उपन्यास का आधारभूत मकसद इस बेतुकी हिंसा का बौद्धिक विरोध करना ही है। उपन्यासकार के ही शब्दों में : “कुछ लोगों को मुस्लिम के रूप में आतंकी प्रिय दिखाई पड़ते हैं, जिसका एक बड़ा कारण यह है कि इस्लामी संसार में गैस और तेल इत्यादि के इतने भंडार हैं और उनकी भौगोलिक स्थिति इतनी महत्वपूर्ण है कि उन्हें निर्बल बनाना बहुत सी शक्तियों के लिए हितकर है जो मुस्लिमों के अनपढ़, रूढ़ीवादी, अविवेकता और दुर्बल बिके हुए नेतृत्व को आगे बढ़ाकर उनमें एक और फूट डालते हैं, उनको आपस में लड़ाते हैं, यहां तक कि मुस्लिम भी मुस्लिम को गैर-मुस्लिम समझने लगता है और उसके साथ रक्तपात के लिए आतुर रहता है। और दूसरी ओर आतंकप्रियता को हवा देते हैं और फिर विश्व की सारी समस्याओं का आरोप उनके सिर लगाकर।”

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