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स्वतंत्रता आन्दोलन में साहित्यिक पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई: डॉ. अमित द्विवेदी

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पत्रकारिता दिवस पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी.

साहित्यिक पत्रिकाएं आर्थिक समस्याओं से संघर्ष करती रही हैं: डॉ. विजय कर्ण

लखनऊ : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पत्रकारिता दिवस के अवसर पर 30 व 31 मई, 2023 को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हिन्दी भवन के निराला सभागार लखनऊ में किया गया है।पूर्वाह्न 10.30 बजे से होने वाले इस कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण, पुष्पार्पण के साथ हुआ.उपरान् वाणी वन्दना डॉ. सरोज खुल्बे ने की। सम्माननीय अतिथि जितेन्द्रनाथ मिश्र, डॉ. जवाहर कर्नावट, पद्मकान्त शर्मा ‘प्रभात’, डॉ. संजय श्रीवास्तव, अमित द्विवेदी, विजय कर्ण, कृष्ण बिहारी त्रिपाठी, डॉ. ओम प्रकाश तिवारी, डॉ. मुकुल श्रीवास्तव का उत्तरीय द्वारा स्वागत डॉ. अमिता दुबे, प्रधान संपादक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा किया गया।

प्रथम दिवस ( प्रथम – सत्र) में स्वतंत्रता पूर्व साहित्यिक पत्रकारिता पर विचार रखते हुए डॉ.अमित द्विवेदी ने कहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान की। स्वतंत्रता आन्दोलन में साहित्यिक पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रेस तथा पत्रकारिता के द्वारा राष्ट्रवाद का नया स्वरूप मिला। सामान्य पत्रकारिता लोकमत का निर्माण करती है। सामाजिक चेतना को जगाने में साहित्यिक पत्रकारिता का स्थान प्रमुख हैं। ‘माधुरी’ व ‘मतवाला’ पत्रिका ने समाज को नई दिशा प्रदान की। साहित्यिक पत्रकारिता ने भारत भूमि की भरपूर सेवा की।

जयपुर से पधारे डॉ. संजय श्रीवास्तव ने कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता का उद्देश्य था. हिन्दी साहित्य पत्रकारिता हिन्दी गद्य का श्रेष्ठ रूप है। हिन्दी पत्रकारिता सामाजिक दशा और दिशा बदलने के प्रतिबद्ध थी। अंग्रेजी के विरोध के लिए हिन्दी पत्रकारिता का उदय हुआ जुगल किशोर शुक्ल ने खड़ी बोली का हिन्दी साहित्य के लिए व्यवस्थित किया। 1857 के बाद पूरे भारत में हिन्दी पत्रकारिता एक ज्योति के रूप में प्रज्जवलित हुई । भारतेन्दु हरिचन्द्र ने सम्पादन कार्य ‘कवि वचन सुधा’ से किया। उन्होंने हिन्दी भाषा को आमजन के बीच लाने का काम किया । इसके बाद ‘हरिश्चन्द्र’ पत्रिका निकाली। उन्होंने राष्ट्रचेतना को विकसित किया। ‘बालबोधिनी के माध्यम से प्रगतिशील रचनाओं का प्रकाशन किया।


हिन्दी साहित्य पत्रकारिता लोगों को ज्ञान देने का काम करता है। समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने का काम किया। हिन्दी साहित्य पत्रकारिता ने हताश और निराश लोगों में उर्जा और संचार फैलाने का काम किया। हिन्दी साहित्य पत्रकारिता ने बंगाल विभाजन का विरोध किया। हिन्दी पत्र – पत्रकाओं का मुख्य उद्देश्य देश को आजाद कराना ।

सीतापुर से पधारे पद्मकान्त शर्मा ‘प्रभात’ ने कहा कि आजादी के पूर्व की पत्रकारिता आजादी के ध्येय के लिए समर्पित थी। उस समय के समाचार पत्र एवं पत्रिकायें साहित्य और सूचनाओं को समान्य रूप प्रकाशित करती थीं। उन्होंने समाज में आजादी की पृष्ठ भूमि तैयार की साहित्य और पत्रकारिता एक दूसरे पर आधारित हैं। पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आन्दोलन की अलख जगायी । भारतेन्दु जी की कवि वचन सुधा ने क्रांति की चेतना जागृत स्वतंत्रता सेनानियों ने अभिव्यक्ति की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिये । पत्रकारिता का उद्देश्य लोक कल्याण की भावना थी। पत्रकारिता लोक कल्याण की सकारात्मक भावना से परिपूर्ण होनी चाहिए।

भोपाल से पधारे डॉ. जवाहर कर्नावट ने कहा कि हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास स्वर्णम रहा है। विश्व के अधिकांश देशों में साहित्यिक पत्रकारिता को महत्व दिया जाता रहा है। स्वतंत्रता पूर्व पत्रकारिता ने आजादी की अलख जगायी। बाल कृष्ट भट्ट, बाल मुकुन्द गुप्त, प्रताप नारायण मिश्र, श्याम सुन्दर दास, जुगुल किशोर ने साहित्यिक पत्रकारिता को नया आयाम दिया । साहित्य केवल कहानी, कविता नहीं होता वह सभी विषयों से जुड़ा रहता है वह चाहे विज्ञान के रूप में हो या अन्य महावीर प्रसाद द्विवेदी साहित्यिक पत्रकारिता के कर्मवीर थे। अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने अपने शब्दों से पत्रकारिता को नई शब्दावली प्रदान की। मॉरीशस की पत्रिका ‘दुर्गा’ हस्तलिखित थी। मॉरीशस में इस पत्रिका ने हिन्दी को जीवित रखने का कार्य किया। लाला हरदयाल ने विदेशों में साहित्यिक पत्रकारिता के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। साहित्यिक पत्रकारिता ने हिन्दी का पूरे विश्व में प्रचार-प्रसार किया। हिन्दी पत्रकारिता ने हिन्दी भाषा को विश्वस्तर पर महत्वपूर्ण स्थान दिलाया।

 

वाराणसी से पधारे जितेन्द्रनाथ मिश्र ने कहा कि यह बहुत सुखद है कि हम गंगा दशहरा दिवस के अवसर पर पत्रकारिता दिवस मना रहे है। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कौन सा शब्द किसने दिया महत्वपूर्ण यह है जब से पत्रकारिता का विकास हुआ तब से साहित्य का स्वरूप बदल गया है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपनी लेखनी से स्वतंत्रता की वह अलख जगायी जो भारतीयों के हृदय में बैठ गयी।

द्वितीय सत्र का विषय ‘स्वातंत्रोत्तर साहित्यिक पत्रकारिता’ था. जिसमें डॉ. मुकुल श्रीवास्तव ने कहा कि भारत में पाठकों में हिन्दी भाषा का प्रयोग निरन्तर बढ़ता जा रहा है। सूचना क्रांति बढ़ने से हिन्दी बढ़ती जा रही है। इन्टरनेट के हर कोने में हिन्दी अपना स्थान बनाती जा रही है। सोशलमीडिया में हिन्दी भाषा का प्रभुत्व है। हिन्दी अपनी सहजता, सरलता के कारण सर्वग्राहय हो रही हैं पुस्तकों के बाहर भी साहित्य का दायरा बढ़ रहा है। तकनीकी ने साहित्य के क्षेत्र में मूलभूत परिवर्तन किया है। सोशल मीडिया नये लेखक, दर्शक बनाने में सफल भूमिका निभा रही है।

मुम्बई से पधारे ओम प्रकाश तिवारी ने कहा कि स्वतंत्रता के समय की पत्रकारिता तलवार की धार पर चलने के समान की पत्रकारिता थी। बाबूराव विष्णु पराड़कर ने अपनी सम्पादकीय के माध्यम से अपनी बात को जनसामान्य तक पहुँचाया। आजादी के बाद भी साहित्यिक पत्रकारिता ने समाज को नई दिशा प्रदान करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। बाल पत्रिकाओं ने साहित्य को समृद्ध किया । दिनमान, रविवार व धर्मयुग साहित्यिक पत्रिकाओं ने हिन्दी पाठकों को साहित्य व समाज को दिशा प्रदान की। इन्टरनेट पर भी अब साहित्यिक पत्रिकाएं निकल रही हैं।

कानपुर से पधारे कृष्ण बिहारी त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकारिता समाज की समस्याओं को उजागर करती है। पत्रकार भी एक कहानीकार होता है। समाचार की रोचकता पत्रकार ही बनाता है। साहित्य, कथा, उपन्यास, आत्मकथा, जीवनी के माध्यम से लेखक समाज की दशा को दर्शाता है। साहित्यिक पत्रकारिता श्रम साध्य है। वर्तमान में हिन्दी पाठकों की संख्या कम होती
जा रही है। यह एक विचारणीय विषय है। परन्तु आशा है कि भविष्य में एक बार फिर पत्रिकाओं का युग पुनः आयेगा। पाठक पढ़ेगा।

नालन्दा से पधारे डॉ. विजय कर्ण ने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएं आर्थिक समस्याओं से संघर्ष करती रही हैं। साहित्यिक पत्रकारिता देश की भाषा व साहित्य को समृद्ध बनाती है । परिवार में पत्र-पत्रिकाओं के संचयन से पढ़ने की परम्परा बनाये रखने में सहायता मिलती है। पत्रिकाएं संस्कार पर आधारित कहानी चाहिए। पत्रकारिता को मिशन के रूप में अपनाना होगा। विचारधारा परक पत्रिका अपने देशकाल के अनुरूप होनी चाहिए । सामाचार पत्रकारिता जन सामान्य के लोक मत का निर्माण करती है। लेखन संस्कार परक होना चाहिए । पत्रिका को अपने मूल तत्व से भटकना नहीं चाहिए ।

डॉ. अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उ.प्र. हिन्दी संस्थान ने कार्यक्रम का संचालन किया। इस संगोष्ठी में उपस्थित समस्त साहित्यकारों, विद्वत्तजनों एवं मीडिया कर्मियों का आभार व्यक्त किया। हिन्दी संस्थान ने कार्यक्रम का संचालन किया। इस संगोष्ठी में उपस्थित समस्त साहित्यकारों, विद्वत्तजनों एवं मीडिया कर्मियों का आभार व्यक्त किया।

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