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लखनऊ नाट्य समारोह में भरतोदय रंगमंडल एवं सफर फाउंडेशन की मौलिक नाट्य प्रस्तुति दिग्दर्शक का मंचन

  • लखनऊ : लखनऊ नाट्य समारोह के  छठे दिवस गिरीश चन्द्र पूर्व उपाध्यक्ष राज्य ललित कला अकादमी धर्मेंद्र मौर्य एवं नीशू त्यागी ने दीप प्रज्ज्वलित करके कार्यक्रम का शुभारंभ किया. नाट्य संस्था भरतोदय रंगमंडल एव सफर फाउंडेशन की मौलिक नाट्य प्रस्तुति दिग्दर्शक का मंचन किया गया जिसका लेखन प्रियम जानी एवं निर्देशन चन्द्रभाष सिंह  ने किया।
    नाटक दिग्दर्शक  एक “गुरु” (शिक्षक) और उसके “शिष्य” (छात्र) से संबंधित है।  शिष्य जो अब एक सुपरस्टार है, कई वर्षों के बाद अपने पुराने गुरु जो कि उससे किसी बात पर नाराज़ है, के पास आता है  उनसे नाराज़गी का कारण जानने के लिए।
    नाटक की कहानी थियेटर के एक निर्देशक के जीवन, विचारों, भावनाओं और समर्पण<span;> के बारे में है। बूढ़ा दिग्दर्शक मंच पर अभ्यास कर रहा था और जब वह खांसता है तो एक युवक उसे पानी पिलाता है। युवक एक्टिंग में कामयाब होने के लिए गांव से आया था। दिग्दर्शक ने उसका परीक्षण किया और उसे अभिनय सिखाने का फैसला किया। वह उसे ईमानदारी से सिखाता है। लेकिन अचानक युवक ने थिएटर छोड़ने का फैसला किया और ऐसी फिल्मों में जाना चाहता है जो उसके गुरु को बिल्कुल पसंद नहीं है। उनके लिए थिएटर सिनेमा से कहीं बेहतर था। अपनी बातचीत में कई बार वे थिएटर बनाम सिनेमा के लिए बहस करता है। आज कल की जनरेशन थिएटर  व थिएटर गुरुओं को सिर्फ सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करती है। थिएटर की पवित्रता,और भावनाओं की कोई कद्र नहीं है। जबकि थिएटर फौजी समुदाय की तरह है,क्योकि थिएटर मांगता है सम्पूर्ण आत्म समर्पण, निःस्वर्थता और बलिदान जो कि आज की पीढ़ी में कहीं नदारद है।
    दिगदर्शक मंच के प्रति इतने समर्पित थे कि उन्होंने युवा अभिनेता को दो लाख रुपये इसलिए दिए कि उसके पिता बीमारी से ठीक हो जाएं और युवा अभिनेता अभिनय पर ध्यान दे और रंगमंच की सेवा कर सकें, जबकि वो दो लाख रुपये खुद के बेटे की इंजीनियरिंग की फीस थी। यह नाटक कला बनाम पारिवारिक जीवन का भी महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। दिग्दर्शक ने थियेटर के आगे अपने परिवार पर कभी ध्यान नहीं दिया था। अंत में जब उसे सच्चाई का पता चलती है कि युवक को थिएटर क्यों छोड़ना पड़ा। दिग्दर्शक के बेटे ने ही युवक से पिता को छोड़ने के लिए कहा था ताकि उसके पिता उसे महत्व दें, तब उसे एहसास होता है कि उसे अपने बेटे और परिवार को भी महत्व देना चाहिए था। कलाकारों को ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि अपने परिवार को खुश रखना भी एक कला है। इससे पता चलता है कि असली कलाकार वह है जो अपने पारिवारिक जीवन और पेशेवर जीवन दोनो को सहजता से बनाए रखे।
    नाटक में ये भी पता चलता है कि सीखना कभी खत्म नहीं होता। सीखने के लिए और भी बहुत कुछ है।

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