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..फिर भी संघ-भाजपा का राग ‘घुसपैठिया’ जारी!

राजेंद्र शर्मा

मोदीशाही के अंत की शुरूआत हो गयी है। 1 नवंबर की इंडिया ब्लाक समेत तमाम विपक्ष की रामलीला मैदान की विशाल रैली ने, बिगुल बजाकर मोदीशाही के अंत की शुरूआत का एलान किया है। बेशक, इमर्जेंसी के दौरान देवकांत बरुआ द्वारा दिए गए शर्मनाक नारे को भी शर्मिंदा करते हुए,अलग-अलग रूपों में ‘‘मोदी है तो भारत है’’ का नारा लगाने वाले भगवा भक्तों से यहां-वहां ‘‘मोदी कहीं नहीं जाएगा’’ के नारे लगवाए जाने से इस शुरूआत का अर्थ घटने वाला नहीं है। उल्टे, देश भर में तेजी से लोगों की जुबान पर चढ़ते ‘‘वोट चोरी’’ के नारे का मुकाबला करने की कोशिश में, संघ-भाजपा जोड़ी जिस तरह के न सिर्फ भोंथरे, बल्कि बाकायदा पिटे हुए हथियारों का सहारा लेने पर मजबूर नजर आती है, वह एक प्रकार से अंत की इस शुरूआत का ही कबूलनामा है। जाहिर है कि लड़ाई में पिटे हुए हथियारों का सहारा लेना, मन से बाजी में हार मान लेने की ही निशानी होता है।

घुसपैठियों के न सिर्फ घुस आने, बल्कि छा जाने का सरासर झूठा सांप्रदायिक डर फैलाना ही वह पिटा हुआ हथियार है, जिसका मतदाता सूचियों से लेकर चुनाव संचालन तक, समूची चुनाव व्यवस्था में ईमानदारी यानी निष्पक्षता सुनिश्चित किए जाने से जुड़ी मांगों पर केंद्रित जन-आंदोलन के खिलाफ, संघ-भाजपा अपने मुख्य हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। जैसा कि अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है, मौजूदा निजाम के चाणक्य कहलाने वाले, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने ही ‘‘वोट चोरी’’ के खिलाफ जनतंत्र की परवाह करने वाली सभी शक्तियों तथा लोगों के व्यापक अभियान के खिलाफ, ‘‘घुसपैठिया आया, घुसपैठिया आया’’ को हथियार बनाने की शुरूआत की थी। इस व्यापक जन-लामबंदी में दरार डालने की कथित चाणक्य नीति आजमाने में ही अपनी सारी चतुराई लगाते हुए, अमित शाह ने छांटकर राहुल गांधी तथा कांग्रेस को निशाना बनाते हुए यह दावा किया था कि, वे ‘‘घुसपैठियों को बचाने के लिए’’ ही एसआइआर में वोट कटने के वोट चोरी होने का झूठा शोर मचा रहे थे। जाहिर है कि इशारा यही था कि मोदी राज के विरोधी, घुसपैठियों के समर्थन के बल पर सत्ता पर काबिज होने की कोशिश कर रहे हैं!

याद रहे कि इस तरह, एसआइआर के नाम पर करोड़ों की संख्या में, 2024 के आम चुनाव में मतदान करने वाले मतदाताओं के नाम काटे जाने को ‘घुसपैठिया-विरोधी कार्रवाई’ बताकर सही ठहराने की कोशिश, कोई साधारण राजनीतिक नेता नहीं कर रहा था, बल्कि दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश के गृहमंत्री के पद पर बैठा व्यक्ति कर रहा था। और यह दावा इसके बावजूद किया जा रहा था कि मोदीशाही के बारह साल से ज्यादा में संसद में पूछे गए प्रश्नों से लेकर, सूचना का अधिकार के तहत पूछे गए प्रश्नों तक के जवाब में, खुद गृह मंत्रालय द्वारा आधिकारिक रूप से बार-बार यह माना गया था कि सरकार के पास ‘‘घुसपैठियों’’ के संबंध में संख्या आदि की कोई ठोस जानकारी ही नहीं है!

लेकिन, अमित शाह के घुसपैठियों के संबंध में अपनी सरकार के पास कोई ठोस जानकारी नहीं होने के बावजूद, ‘‘घुसपैठिया, घुसपैठिया’’ का शोर मचाने में अचरज की भी कोई बात नहीं है। वास्तव में ‘‘घुसपैठियों का डर’’ फैलाना संघ परिवार का एक ऐसा पुराना हथियार है, जिसका इस्तेमाल करने के लिए वह ‘‘तथ्यों’’ का मोहताज कभी भी नहीं रहा। वह तो अपने प्रचार को ही तथ्य के रूप में प्रचारित करने और फिर बार-बार, तरह-तरह से दोहराकर, सबसे मनवाने में विश्वास करता है, खासतौर पर तब, जबकि संबंधित प्रचार-तथ्य उसके सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के एजेंडा में मददगार हो। कहने की जरूरत नहीं है कि एक स्थिति के बाद, संघ के प्रचारक खुद भी, अपने ही प्रचारित-तथ्यों को सत्य मानने लग जाते हैं।

वास्तव में एसआइआर से भी पहले, संघ परिवार के सांप्रदायिक प्रचार से संचालित ‘‘घुसपैठियों’’ की अंधाधुंध खोज का, आम जनता के लिए ऐसा ही तकलीफदेह अभ्यास, असम में हुआ था। इसका नाम था, एनआरसी का अद्यतनकरण। याद रहे कि इस प्रक्रिया को मोदी-शाह की सरकार देश भर में लागू करना चाहती थी। लेकिन, इसी पैकेज के हिस्से के तौर पर लाए गए, भारतीय नागरिकता की परिभाषा में ही सांप्रदायिक संशोधन करने के लिए लाए गए सीएए कानून के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन की पृष्ठभूमि में और असम के अनुभव की भी पृष्ठभूमि में, सरकार को देश भर में एनआरसी करने का विचार टाल देना पड़ा। यह दूसरी बात है कि अब चोर दरवाजे एसआइआर के नाम पर, वही खेल खेलने की कोशिश की जा रही है। और असम में एनआरसी का क्या हुआ?

बेशक, बांग्लादेश से लगती हुई सीमा वाला राज्य होने के चलते, असम में 1971 में बांग्लादेश की स्थापना के दौर की उथल-पुथल के दौरान तथा उसके बाद भी, रोजी-रोटी की तलाश में बांग्लादेश से गरीब मजदूरों के आने का सिलसिला चलता रहा था। इसी मुद्दे को लेकर 1980 के दशक में असम में उग्र-बांग्लादेशी-विरोधी आंदोलन भी चला था, जिसका अंत 1985 के असम समझौते पर हुआ था। इसी समझौते के एक प्रावधान के आधार पर और भाजपा व संघ परिवार के अनवरत प्रचार के दबाव में तथा सुप्रीम कोर्ट के अनुमोदन से, भाजपा के राज में असम में एनआरसी कराया गया। हजारों करोड़ रूपये फूंक कर और सैकड़ों जानें कुर्बान करने तथा समूची जनता तथा खासतौर पर गरीब, अशिक्षित, सामाजिक रूप से कमजोर लोगों तथा महिलाओं को बेशुमार तकलीफों से गुजारने के बाद, एसआइआर की ही तरह नागरिकता-जांच की इस प्रक्रिया के अंत में, करीब 20 लाख असमवासियों की नागरिकता को ‘‘संदिग्ध’’ करार दिया गया था।

लेकिन, अंत में जब यह सच सामने आया कि संघ के प्रचार और उसकी अपेक्षाओं के विपरीत, इस प्रक्रिया में अपनी नागरिकता साबित न कर पाने वालों में दो-तिहाई हिंदू ही थे, जबकि मुसलमान एक-तिहाई से भी कम थे, तो संघ परिवार को पल्टी मारने में देर नहीं लगी और भाजपा की राज्य सरकार ने सिर्फ एनआरसी को नामंजूर ही नहीं किया, बल्कि एनआरसी कराने वाले उच्चाधिकारियों को तरह-तरह के मुकद्दमों में भी फंसा दिया। और इस तरह, यह पूरी कसरत सिर्फ इसलिए जनता के लिए अकारण मुसीबत बनकर रह गयी कि उसके नतीजे, घुसपैठियों के खतरे के संघ परिवारी प्रचार से मेल नहीं खाते थे।

काफी हद तक ऐसा ही किस्सा, एसआइआर का रहा है, जिसके पीछे भी ‘‘घुसपैठियों के खतरे’’ के बेतहाशा अतिरंजित संघ-भाजपायी प्रचार से बनी धारणाएं ही थीं। यह कोई संयोग ही नहीं है कि बिहार से 2025 के जून में जब एसआइआर की प्रक्रिया की शुरूआत हुई थी, तभी से न सिर्फ भाजपा की केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा और संघ कुनबे द्वारा नागरिकता जांच की ओर इशारा करने वाली इस प्रक्रिया की समूची डिजाइन की, विपक्ष की आलोचनाओं के सामने, यह कहकर हिमायत की जा रही थी कि यह मतदाता सूचियों को ‘‘घुसपैठियों’’ से शुद्घ करने के लिए जरूरी था, बल्कि खुद चुनाव आयोग ने भी बाकायदा अपनी विज्ञप्ति में मतदाता सूचियों में ‘विदेशी अवैध प्रवासियों के नामों की मौजूदगी’ को, इस अभूतपूर्व कसरत का एक प्रमुख कारण बताया गया था। वास्तव में यह भी संयोग ही नहीं है कि चुनाव आयोग आरटीआइ इन्क्वाइरियों के जवाब में इसकी जानकारी देने से बचता रहा है कि उसने देश भर में एसआरआर कराने का फैसला, कब और किस बैठक में लिया था। उसका जवाब है — हमें नहीं पता!

हैरानी की बात नहीं है कि जब बिहार में एसआइआर की प्रक्रिया पूरी हुई, मीडिया और विपक्ष के भी बार-बार पूछने के बावजूद, चुनाव आयोग ने इस सरल से सवाल का जवाब देने से इंकार कर दिया कि जिन एक करोड़ से कुछ कम लोगों के नाम इस प्रक्रिया में मतदाता सूचियों से काटे गए थे, उनमें से कितने नाम विदेशी नागरिक होने के आधार पर काटे गए थे! वजह बहुत सरल थी। छ: करोड़ से ज्यादा मतदाताओं में ऐसे लोगों की संख्या 600 भी नहीं थी। उनमें भी नेपाली महिलाओं की संख्या ही ज्यादा थी, जिनका ससुराल बिहार में है। मुसलमानों की संख्या, पांचवां हिस्सा भी नहीं थी, जबकि संघ परिवार के आख्यान में तो ‘‘घुसपैठिया’’ और मुसलमान समानार्थी ही हैं। यह दिलचस्प है कि उसके बाद से चुनाव आयोग ने तो एसआइआर प्रक्रिया के दौरान एक बार भी यह बताना गवारा नहीं किया है कि इस प्रक्रिया में कितने ‘‘घुसपैठिए’’ पकड़े गए हैं, लेकिन संघ परिवार के इसी बहाने से मतदाता सूचियों की चुनाव आयोग द्वारा सत्ताधारी पार्टी के अनुकूल काट-छांट की हिमायत करने में, कोई कमी नहीं आयी है। अमित शाह, ‘‘वोट चोरी’’ के आरोपों के सामने, इसी सिलसिले को आगे बढ़ा रहे थे।

यह भी याद रहे कि अमित शाह द्वारा उक्त दावा इसके बावजूद किया जा रहा था कि तब तक, अब भी अधूरी एसआइआर की प्रक्रिया में, 2024 की मतदाता सूचियों में से 13 करोड़ 30 लाख से ज्यादा मतदाताओं के बाहर कर दिए जाने की जानकारी देश के सामने आ चुकी थी। याद रहे कि जिस बांग्लादेश को भारत में ‘‘घुसपैठ’’ का मुख्य स्रोत माना जाता है, उसकी आबादी कुल पौने अठारह करोड़ है। तो क्या बंग्लादेश की आबादी के दो तिहाई हिस्से के बराबर बांग्लादेशी भारत में घुसपैठिया बनकर रह रहे थे। वह भी तब, जबकि विश्व बैंक के ताजातरीन आंकड़ों के अनुसार, प्रतिव्यक्ति आय के लिहाज से बांग्लादेश के लोग, भारतीयों को ‘‘दरिद्र पड़ौसी’’ के रूप में देखते हों, तो गलत नहीं होगा!

बहरहाल, एसआइआर के ‘‘घुसपैठियों के खतरे’’ के संघ परिवारी प्रचार का जोरदार खंडन ही बन जाने का किस्सा इतने पर ही खत्म नहीं हो जाता है। मीडिया में आयी खोजी रिपोर्टों के अनुसार, ऐसे छ: राज्यों में जहां एसआइआर की प्रक्रिया पूरी हो गयी है, 9 करोड़ 96 लाख मतदाताओं में से, कुल 1600 विदेशी पाए गए हैं। इनमें बांग्लादेशी तो छोड़ ही दें, मुसलमानों की भी संख्या उल्लेखनीय नहीं है। कर्नाटक में, 99 लाख 70 हजार मतदाताओं के नाम काटे गए हैं, जिनमें कुल 716 विदेशी हैं और इनमें भी 545 नेपाली ही हैं। साफ है कि एसआइआर ने, जो अंतत: चूंकि एक प्रकार की गिनती है, उसने अगर भाजपा के मनमाफिक मतदाता सूचियां बनाने का काम किया है, तो दूसरी तरफ उसने अनजाने ही ‘‘घुसपैठियों के खतरे’’ के गुब्बारे में पिन चुभोने का भी काम किया है।

फिर भी इस ‘‘घुसपैठिया’’ गुब्बारे को पूरी तरह से फाडऩे के साथ ही, संघ परिवार के एसआइआर के बचाव को भी ध्वस्त करने का श्रेय, हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक राजनीति के फायरब्रांड प्रतिनिधि, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, योगी आदित्यनाथ को जाता है। योगी ने भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी में अपने संबोधन में पार्टी नेतृत्व को आगाह किया कि एसआइआर की प्रक्रिया में राज्य में 1 करोड़ 27 लाख हिंदुओं के (दूसरे शब्दों में भाजपा के अपने) वोट काट दिए गए हैं। उन्होंने अपनी पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं से भाजपा के ‘‘कमल एप’’ की मदद से, ये वोट वापस जुड़वाने का आह्वान किया, जो अन्य चीजों के अलावा भाजपा-शासित राज्यों में एसआइआर की प्रक्रिया के एक स्वांग ही बनाकर छोड़ दिए जाने को भी दिखाता है।

लेकिन, सबसे बढक़र यह प्रकरण यही दिखाता है कि नागरिकता जांच की अपनी सारी कसरत के जरिए भाजपा के मनमाफिक टार्गेटिंग की अपनी सारी कोशिशों के बावजूद, एसआइआर की प्रक्रिया भी किसी उल्लेखनीय संख्या में ‘‘घुसपैठियों’’ को खोजने में नाकाम रही है, क्योंकि ये करोड़ों घुसपैठिये संघ के प्रचार की ही कृति हैं और वहीं रहते हैं। दूसरी ओर, घुसपैठियों के नाम पर मुसलमानों के लिए गड्ढा खोदने वालों ने, गरीब व सामाजिक रूप से कमजोर हिंदुओं और महिलाओं के लिए भी फौरन मताधिकार और अंतत: नागरिक अधिकार बचाने की भारी चुनौती पैदा कर दी है। इसके बावजूद, अगर भाजपा ज्ञानेश कुमार और उसके एसआइआर के बचाव के लिए, ‘‘जनतंत्र बचाओ’’ के विडंबनापूर्ण नारे के साथ, यहां-वहां जवाबी रैलियां कर रही है और अमित शाह से लेकर भाजपा अध्यक्ष, नितिन नबीन तक ‘‘तीन करोड़ घुसपैठिए’’ खोज लेने के दावे कर रहे हैं, तो यह संघ-भाजपा के अपने एक पिटे हुए हथियार पर ही भरोसा करने के लिए मजबूर होने को दिखाता है। यह भी तो मोदीशाही के अंत की शुरूआत का ही इशारा है।

 

 

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