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भारतीय वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि: ग्राफीन ऑक्साइड की बूंदों का रहस्य सुलझाया, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए नई संभावनाएं

नई दिल्ली : भारतीय वैज्ञानिकों ने ग्राफीन ऑक्साइड की बूंदों के सूखने के बाद बनने वाले अलग-अलग पैटर्न के पीछे की प्रक्रिया को समझने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। संगमित्रो चटर्जी, प्रयास सिंह, बिबेक कुमार, रवि कुमार शुक्ला, जितेंद्र बहादुर और रजनीश भारद्वाज के संयुक्त अध्ययन में पता चला कि ग्राफीन ऑक्साइड की नैनोशीट्स का आकार और उनमें ऑक्सीकरण का स्तर यह तय करने में अहम भूमिका निभाता है कि सूखने के बाद बूंद किस तरह की संरचना बनाएगी।

यह अध्ययन डीआईटी यूनिवर्सिटी, आईआईटी बॉम्बे और भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर से जुड़े शोधकर्ताओं ने किया है। शोध के निष्कर्ष सामग्री विज्ञान के साथ-साथ भविष्य की सेंसर, प्रिंटेड इलेक्ट्रॉनिक्स, कोटिंग्स और ऊर्जा भंडारण तकनीकों के लिए उपयोगी हो सकते हैं।

मकड़ी के जाले और मोजेक जैसा पैटर्न क्यों बनता है?
शोधकर्ताओं ने पाया कि करीब 2.2 माइक्रोमीटर आकार वाली और कम ऑक्सीकृत ग्राफीन ऑक्साइड शीट्स सूखने के बाद रेडियल धारियां बनाती हैं। इनका कार्बन-से-ऑक्सीजन अनुपात 14.4 था। ये शीट्स अपेक्षाकृत ढीले तरीके से जुड़ी रहती हैं और सूखने के दौरान दबाव पड़ने पर कागज की तरह मुड़कर सिलवटें बनाती हैं। यही सिलवटें आगे चलकर मकड़ी के जाले जैसे पैटर्न में बदल जाती हैं।

इसके विपरीत, करीब 0.5 माइक्रोमीटर आकार वाली और अधिक ऑक्सीकृत शीट्स का कार्बन-से-ऑक्सीजन अनुपात 10.4 था। ये शीट्स अधिक मजबूती से व्यवस्थित थीं। इसलिए वे आसानी से मुड़ने के बजाय छोटे-छोटे सघन हिस्सों में विभाजित होकर मोजेक टाइल जैसा पैटर्न बनाती हैं।

कॉफी-रिंग इफेक्ट से जुड़ा है पूरा मामला : शोधकर्ताओं ने ग्राफीन ऑक्साइड की बूंदों के व्यवहार को कॉफी-रिंग इफेक्ट से जोड़कर समझा। जब किसी तरल की बूंद सूखती है तो वाष्पीकरण के दौरान उसमें मौजूद कण अक्सर किनारे की ओर चले जाते हैं। ग्राफीन ऑक्साइड की चादरें पानी में एक-दूसरे के साथ व्यवस्थित होकर लिक्विड क्रिस्टल जैसी संरचना बना सकती हैं। यही आंतरिक व्यवस्था बूंद के बहने, मुड़ने और सूखने के तरीके को प्रभावित करती है।

उन्नत तकनीकों से समझी गई संरचना : इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए शोधकर्ताओं ने इंदौर स्थित राजा रमन्ना सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के इंडस-2 परिसर में सिंक्रोट्रॉन आधारित स्मॉल-एंगल एक्स-रे स्कैटरिंग तकनीक का इस्तेमाल किया। इसके अलावा रियोलॉजी के जरिए दोनों तरह के सस्पेंशन के बहने और विकृत होने के व्यवहार का अध्ययन किया गया।

परीक्षणों में पाया गया कि कमजोर तरीके से जुड़ी शीट्स वाला सस्पेंशन तरल की तरह आसानी से बहता है, जबकि अधिक मजबूती से व्यवस्थित शीट्स नरम ठोस पदार्थ जैसा व्यवहार करती हैं। इससे यह समझने में मदद मिली कि सूक्ष्म स्तर की संरचना किस तरह बड़े स्तर पर दिखाई देने वाले पैटर्न को प्रभावित करती है।

सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए क्यों अहम?
इस शोध से ग्राफीन ऑक्साइड को सतह पर अधिक नियंत्रित और समान तरीके से जमा करने की समझ बेहतर हो सकती है। भविष्य में इसका उपयोग प्रिंटेड इलेक्ट्रॉनिक्स, बायोसेंसर, कोटिंग्स और ऊर्जा भंडारण उपकरणों में उपयोगी हो सकता है।

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