बिक गईं दीवारें, बिक गया ईमान, वजीरगंज के मलबे से झांकती लाचार जिंदगी
एक बेबस मां की खामोश चीख, इंसाफ की तलाश में दर-दर भटक रही मां
लखनऊ। शहर की चमचमाती सड़कों और विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच कुछ ऐसी गलियां भी हैं, जहाँ इंसाफ की आवाज अक्सर कंक्रीट के शोर में दब जाती है। वजीरगंज के सिटी स्टेशन, लारी हाउस के पास का मामला भी कुछ ऐसा ही दर्द अपने भीतर समेटे हुए है। यहाँ सवाल सिर्फ एक मकान के टूटने का नहीं, बल्कि उस मां का है, जिसने करीब पांच दशक तक अपने दो बच्चों के साथ उसी आशियाने में जिंदगी के थपेड़े सहे और उसे अपना संसार समझकर जीती रही।
करीब 1400 वर्गफीट के कदीमी मकान और नजूल की कथित अतिरिक्त भूमि को मिलाकर लगभग 1800 वर्गफीट का वह परिसर उस परिवार के लिए महज ईंट, गारे और छत का ढांचा नहीं था। वह आधी सदी की मेहनत, यादों, रिश्तों और संघर्षों का पता था। लेकिन एक दिन सरकारी कार्रवाई और अदालती आदेश की आड़ में ऐसा घटनाक्रम सामने आया, जिसने इस परिवार को सड़क पर ला खड़ा किया।
पीड़िता का आरोप है कि जिस अधिवक्ता को उसने अपना सहारा और कानूनी ढाल समझा, उसी पर बाद में विरोधी पक्ष से मिलीभगत का संदेह पैदा हुआ। मामला अदालत तक पहुंचा और आदेश भी हुआ। मगर पीड़िता के मुताबिक, उस आदेश के अमल के दौरान जो कुछ हुआ, उसने कानून की संवेदनशीलता पर ही सवाल खड़े कर दिए।
बताया जाता है कि अदालत के अमीन, पुलिस बल और कुछ लोगों की मौजूदगी में अचानक कार्रवाई हुई। पीड़िता का आरोप है कि उसे पर्याप्त पूर्व सूचना नहीं दी गई और देखते ही देखते घर का सारा सामान बाहर कर दिया गया।
कानून का मतलब क्या सिर्फ आदेश पढ़ देना है, या उस आदेश के अमल के दौरान इंसानियत को बचाए रखना भी कानून की जिम्मेदारी है?
यह सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि आरोपों के मुताबिक, घर से निकाले जाने के बाद महिला अपने दो बच्चों के साथ कई दिनों तक सड़क की पटरी पर रहने को मजबूर हुई।
किसी घर का टूटना सिर्फ उसकी दीवारों का गिरना नहीं होता। उसके साथ चूल्हे की गर्माहट, बच्चों की नींद, मां की उम्मीद और बरसों की जमा पूंजी भी टूटती है। सबसे कचोटने वाली बात यह है कि महिला और उसके बच्चे कई दिनों तक खुले आसमान के नीचे रहे। आसपास लोग रहे होंगे, आवाजाही भी होती रही होगी, लेकिन क्या किसी ने यह पूछने की जरूरत महसूस की कि इन बच्चों की रात कहाँ कटेगी?
आज हम विकास की ऊंची इमारतें गिनने में इतने व्यस्त हैं कि शायद यह भूल गए हैं कि उनके नीचे कितने इंसानी दर्द दबे पड़े हैं। इमारतें ऊंची होती गईं और इंसानियत की छत नीची।
पीड़िता ने नासिर, रेहान, हसन, माजिन, हम्माद, अफ्फान, इब्राहिम, बिलाल, खालिद और फरजाना जैसे लोगों के नाम लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होना जरूरी है। यदि संबंधित लोगों पर पूर्व से कोई आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, तो उनकी वास्तविक स्थिति भी पुलिस अभिलेखों से स्पष्ट की जानी चाहिए।
यदि नजूल भूमि पर कब्जे और उस पर ताले लगवाए जाने के बाद वहाँ मलबे के बीच नई संभावनाएं तलाशने की कोशिश हो रही है, तो सवाल बेहद सीधा है, जिस जमीन पर सरकार का दावा हो, वहाँ किसी व्यक्ति का दावा आखिर इतना मजबूत कैसे हो जाता है कि एक बेबस परिवार कमजोर पड़ जाता है?
इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू यही है कि कानून की किताब में हर कार्रवाई के लिए प्रक्रिया है, लेकिन पीड़िता की कहानी में वह प्रक्रिया कहीं दिखाई नहीं देती। एक तरफ अदालतें हैं, दूसरी तरफ सरकारी अमला है, तीसरी तरफ प्रभावशाली लोगों के आरोप हैं, और इनके बीच खड़ी है एक मां, जिसके पास अपने बच्चों को समझाने के लिए शायद अब सिर्फ इतना है कि इंसाफ जरूर मिलेगा।
मगर गरीब और कमजोर आदमी के लिए न्याय की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसे न्याय मिलने से पहले ही अपनी जिंदगी की बची-खुची जमा पूंजी मुकदमे की सीढ़ियों पर खर्च करनी पड़ती है। तारीख पर तारीख मिलती है, मगर बच्चे तारीख नहीं खाते उन्हें रोटी चाहिए।
आज वहाँ शायद दीवारें नहीं हैं। ईंटें बिखरी हैं, मलबा पड़ा है और जमीन पर नए सपनों की तस्वीरें बनाने वाले लोग भी हो सकते हैं। लेकिन उस मलबे में एक मां की जिंदगी के पचास साल भी दबे हैं।
वजीरगंज की यह कहानी हमसे पूछती है कि क्या कानून सिर्फ ताकतवर के हाथ में मौजूद कागज है, क्या गरीब के लिए इंसाफ तक पहुँचना भी एक महंगी इमारत है, क्या सरकारी जमीन की हिफाजत करने वाला तंत्र तब जागेगा जब जमीन पर इमारत खड़ी हो जाएगी, और क्या उस मां के आंसुओं का भी कोई पंचनामा बनेगा जो अपने बच्चों के साथ खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर हुई?
शहर आगे बढ़ रहा है। नई इमारतें उठ रही हैं। बाजार फैल रहे हैं। जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन ऊंची होती इमारतों के बीच इंसानियत कितनी नीचे गिर चुकी है?
अब निगाहें प्रशासन पर हैं। देखना यह है कि यह मामला भी फाइलों की धूल में दबकर रह जाएगा, या फिर किसी जिम्मेदार अधिकारी की कलम उस धूल को हटाकर सच सामने लाएगी।


