कला दीर्घा, अंतरराष्ट्रीय दृश्य कला पत्रिका एवं कला स्रोत कलावीथिका के संयुक्त तत्वावधान में ‘पारस’ अंतरराष्ट्रीय दृश्य कला प्रदर्शनी का समापन
कला दीर्घा पत्रिका ने कलाकारों को मंच देते हुए 26 वर्षों की लंबी यात्रा पूरी की है” : आचार्य उमेश वशिष्ठ

लखनऊ। शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में कला दीर्घा, अंतरराष्ट्रीय दृश्य कला पत्रिका एवं कला स्रोत कलावीथिका के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘पारस’ अंतरराष्ट्रीय दृश्य कला प्रदर्शनी का समापन हुआ। प्रदर्शनी का उद्घाटन 01 सितंबर को प्रख्यात लेखक एवं विद्वान आचार्य सूर्य प्रसाद दीक्षित ने किया था। श्रद्धेय गुरुओं को समर्पित इस प्रदर्शनी की संकल्पना भारतीय सांस्कृतिक चेतना में निहित उस रूपांतरणकारी प्रतीक ‘पारस’ से प्रेरित है, जिसके स्पर्श से साधारण असाधारण और लौह स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है।इसी भाव को गुरु के संदर्भ में देखा जाए तो गुरु वह ‘पारस’ है, जो अपने ज्ञान, अनुभव, स्नेह, अनुशासन और संस्कार के स्पर्श से शिष्य के भीतर छिपी प्रतिभा और संभावनाओं को पहचानकर उन्हें विकसित होने की दिशा प्रदान करता है। प्रदर्शनी का आयोजन डॉ. अनीता वर्मा एवं श्री सुमित कुमार के समन्वय एवं संयोजन में किया गया। इसमें कुल 48 कलाकारों की कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गईं। प्रदर्शनी में समकालीन कला की नवीनतम प्रवृत्तियों से संबद्ध विविध कलात्मक प्रयोग देखने को मिले। चित्रकला और छापाचित्र से लेकर सिरामिक, टेक्सटाइल कोलाज, छायाचित्र एवं बुनाई जैसे विभिन्न माध्यमों में सृजित कलाकृतियों ने कला स्रोत कलावीथिका के परिसर में एक बहुवर्णी और बहुआयामी दृश्य-संसार का निर्माण किया।विभिन्न माध्यमों और कलाभाषाओं में व्यक्त ये कृतियाँ एक-दूसरे से संवाद करती हुई भारतीय समकालीन कला की विविधता और प्रयोगशीलता को रेखांकित करती हैं। ‘पारस’ की एक विशिष्ट विशेषता इसकी अंतरराष्ट्रीय सहभागिता रही। भारत के साथ-साथ बांग्लादेश और श्रीलंका के कलाकारों ने भी इस प्रदर्शनी में सहभागिता की। तीन देशों के कलाकारों की रचनात्मक उपस्थिति ने इसे व्यापक दक्षिण एशियाई सांस्कृतिक संदर्भ प्रदान किया।भौगोलिक सीमाओं, भाषायी विविधताओं और अलग-अलग सांस्कृतिक अनुभवों के बावजूद गुरु के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की संवेदना सभी कलाकारों को एक साझा भावभूमि पर ले आती है। इस दृष्टि से ‘पारस’ केवल कलाकृतियों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि विभिन्न संस्कृतियों और कलाभाषाओं के मध्य एक जीवंत रचनात्मक संवाद भी है। प्रदर्शनी में शामिल कलाकृतियों में विभिन्न कला-गुरुओं की परंपराओं, उनके संस्कारों, सौंदर्यबोध तथा कलाकारों की व्यक्तिगत एवं स्थानीय संवेदनाओं के विविध रूप देखने को मिले। कहीं परंपरा आधुनिक संवेदना से संवाद करती दिखाई दी, कहीं लोक-स्मृति समकालीन दृश्यभाषा में रूपांतरित होती नजर आई और कहीं रंग, रेखा, रूप तथा माध्यम के अभिनव प्रयोग गुरु-शिष्य संबंध की आत्मीयता को मूर्त रूप प्रदान करते दिखाई दिए। प्रदर्शनी का अवलोकन करने के बाद मुख्य अतिथि, प्रख्यात लेखक एवं कवि डॉ. सर्वेंद्र विक्रम सिंह ने कहा कि कला की शिक्षा प्राथमिक स्तर से ही शुरू होनी चाहिए। विद्यार्थियों की रचनात्मक स्वतंत्रता के महत्व को समझते हुए उन्हें अपनी सृजनात्मक प्रतिभा के प्रदर्शन के पर्याप्त अवसर दिए जाने चाहिए। इसके लिए सरकार और समाज, दोनों को मिलकर प्रयास करना होगा। उन्होंने कहा कि इस दिशा में सामूहिक चिंतन और प्रयास के सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि “उत्कृष्ट कला सदैव सरल होती है।” इस अवसर पर आचार्य उमेश वशिष्ठ ने कहा कि कला दीर्घा पत्रिका ने अपनी 26 वर्षों की यात्रा में कला के विविध रूपों का प्रलेखन करते हुए कलाकारों को मंच प्रदान किया है। साथ ही, युवा कलाकारों को अपने साथ जोड़कर विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से कला-जगत में निरंतर और स्मरणीय योगदान दिया जा रहा है। उन्होंने इसे सराहनीय एवं अनुकरणीय पहल बताया। कला स्रोत कलावीथिका के निदेशक अनुराग डीडवाना, कला दीर्घा पत्रिका की प्रकाशक डॉ. लीना मिश्र, संपादक डॉ. अवधेश मिश्र, आचार्य उमेश वशिष्ठ एवं डॉ. सर्वेंद्र विक्रम सिंह ने सभी प्रतिभागी कलाकारों को उनकी सहभागिता के लिए प्रशस्ति-पत्र प्रदान किए तथा उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। उन्होंने आशा व्यक्त की कि ये कलाकार अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंधों को और मजबूत करते हुए कला की सार्वभौमिक भाषा को निरंतर समृद्ध करेंगे। कला दीर्घा की प्रकाशक डॉ. लीना मिश्र ने बताया कि ‘हौसला’, ‘वत्सल’, ‘समर्पण’, ‘ढिबरी’, ‘बसंत’, ‘नॉस्टैल्जिया.25’, ‘चौपाल’, ‘हुलास’, ‘मड़ई’, ‘अरघान’, ‘नैवेद्य’ और ‘पारस’ जैसी प्रदर्शनियों के माध्यम से कला दीर्घा ने निरंतर अपनी रचनात्मक गतिविधियों का विस्तार किया है। उन्होंने बताया कि पत्रिका शीघ्र ही देश के अन्य प्रमुख महानगरों में भी अपनी कला गतिविधियों का आयोजन करेगी।


