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सुख़नदान की महफ़िल – ’शाम-ए-सुख़न’आयोजित

लखनऊ :  22 जनवरी की शाम ख़ास बारादरी, गोमतीनगर, लखनऊ में सुख़नदान फाउण्डेशन की जानिब से शाम-ए-सुख़न उन्वान के तहत एक मुशायरे/कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस मौक़े पर अन्दाज़-ए-बयाॅं और के बानी मोहतरम रेहान सिददीक़ी बतौर चीफ गेस्ट के तौर पर शामिल हुए, मुशायरे की सदारत आलमी शोहरत याफ़ता शायर और नाज़िम मोहतरम वासिफ़ फ़ारूक़ी ने की और शाश्वत सिंह दर्पण ने निज़ामत के फ़राइज़ को अंजाम दिया। सुख़नदान के कल्चरल विंग के नेशनल प्रेसीडेंट मोहम्मद अली साहिल द्वारा मेहमान-ए-खुसूसी जनाब रेहान सिददीक़ी को बुके देकर उनका स्वागत किया गया एवं सुख़नदान फाउण्डेशन के चेयरमैन नदीम फ़र्रूख़ ने फाउण्डेशन के कार्य-कलापों के बारे में प्रकाश डाला और आगामी कार्यक्रमों/उददेश्यों की रूप-रेखा भी प्रस्तुत की।
मुशायरे में शायर/कवि के तौर पर ज़ीशान नियाज़ी, सलीम सिददीक़ी, नदीम फर्रूख़, मोहम्मद अली साहिल, तारा इक़बाल, कमल हाथवी, आदिल रशीद, मो0 फ़ौजान, रूबीना अयाज़, अख़्तर कानपुरी, दुर्गेश शुक्ला, आसिम काकोरवी, असद नदीम, पीयूष अग्निहोत्री ने अपना बेहतरीन और खूबसूरत कलाम पेश किया और सामइन को भरपूर दाद देने को मजबूर किया।
शायरों के मुन्तख़ब अश्आर पाठकों के लिये पेश हैं –
तेरी दुनिया जिसे हैरत से सभी देखते हैं
देख कर मुझ को बहुत दंग हुई है इस बार
वासिफ़ फ़ारूक़ी

कुछ इस तरह से ज़माने पे छाना चाहता है
वो आसमान पे पहरे बिठाना चाहता है
नदीम फ़र्रुख

किरदार बेच देने का अंजाम ये हुआ
दिल में उतरने वाले नज़र से उतर गये
मोहम्मद अली साहिल

काम ले कुछ हसीन होठों से
बातों बातों में मुस्कुराया कर
आदिल रशीद

कहीं पे दिन तो कहीं पर ये रात करता है
ये सूर्य न्याय नहीं पक्षपात करता है
फौज़ान अहमद

अभी डूबा नहीं यादों का सूरज
अभी परछाइयाँ पीछा करेंगी
तारा इक़बाल

एक बच्ची से ख़रीदे हैं ये गजरे हमने
लौट के हम किसी मुजरे से नहीं आए हैं
सलीम सिद्दीक़ी

इनायत आपकी कुछ कम नहीं है
असीर ए ग़म हूँ लेकिन ग़म नहीं है
ज़ीशान नियाज़ी

वो इंतज़ार की लज़्ज़त कहाँ विसाल में है
मज़ा दवा कहाँ है जो देखभाल में है
कमल हाथवी

इश्क़ का आखिरी मक़ाम है मौत
और मैं आखरी मक़ाम पे हूँ
रुबीना अयाज़

हमसे बिछड़ के ख़ुश हो अगर तुम तो ख़ुश रहो
तुमसे बिछड़ के हम भी कोई मर नहीं गए
अख़्तर कानपुरी

ये दुनिया एक दोज़ख़ है जहाँ पर
कहीं से लोग मर कर आ रहे हैं
शाश्वत सिंह दर्पन

कितनी आसानी से मर सकता हूँ मैं
प्यास हूँ पानी से मर सकता हूँ मैं
पीयूष अग्निहोत्री

ये दिल भी अपने मसाइल के हल निकालता है
उदास होता है जिस दिन ग़ज़ल निकालता है
असद नदीम नय्यर

तुम्हें तो रोज़ मौक़े मिल रहे हैं शेर कहने के
यहाँ रोटी की गुंजाइश में ज़ाया हो रहे हैं हम
दुर्गेश शुक्ल

इस कल्चरल प्रोग्राम में एड0 प्रमिला मिश्रा, डा0 उमंग खन्ना, आर0के0 सिंह, आई0एफ0एस0(से0नि0)मेराज हैदर, सुशील दुबे, मंजू श्रीवास्तव, हाजी खुर्शीद खान राजू, मो0 शमीम, कलाम अहमद, नवाब नूरेन आलम, ज़फ़रूल सिददीक़ी, अफ़ज़ाल सिददीक़ी, इं0 वसीम अहमद, शकील सिददीक़ी, इदरीस अहमद के अलावा कई मुअजि़्ज़ज़ लोगों ने मौजूद रहकर प्रोग्राम को वक़ार बख़्शा। शायरों और कवियों को श्रोताओं द्वारा दाद-ओ-तहसीन से खूब नवाज़ा गया और उनकी हौसलाअफ़ज़ाई की गयी।
इस कार्यक्रम मंे मीडिया फोटाग्राफर्स क्लब, न्यूज़ टाइम नेशन, उजाला न्यूज़, आदि के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। शायरी का यह प्रोग्राम ख़ास बारादरी के प्रो0 महमूद उमर के विशेष सहयोग से सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम ख़त्म होने पर सुख़नदान फाउण्डेशन के चेयरमैन नदीम फ़र्रूख़ एवं नेशनल प्रेसीडेंट कल्चरल विंग मोहम्मद अली साहिल ने मौजूद सभी मेहमानों व मीडिया और सुख़नदान की टीम और विशेषकर ख़ास बारादरी के प्रबंधन का शुक्रिया अदा किया गया।

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