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महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 129 वीं जयंती डीयू में बड़े धूमधाम से मनाई

स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को विद्यालयों व विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाए : प्रो.सुमन

नई दिल्ली : फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस ( शिक्षक संगठन ) के तत्वावधान में दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर के कला संकाय में शुक्रवार को अदम्य साहस , देशभक्ति के प्रतीक , आजाद हिंद फौज के मुखिया , महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाषचंद्र बोस की 129 वीं जयंती पराक्रम दिवस के रूप में बड़े धूमधाम से मनाई । इस अवसर पर एक दिवसीय संगोष्ठी एवं व्याख्यान का आयोजन भी किया गया । जिसका विषय –” स्वतंत्र भारत के निर्भिक स्वप्नद्रष्टा का अतुलनीय योगदान ” था । संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रसिद्ध मीडिया विश्लेषक प्रोफेसर के.पी. सिंह ने की। इस अवसर पर मुख्य वक्ता फोरम के चेयरमैन प्रोफेसर हंसराज सुमन व मंच संचालन सुश्री पल्लवी प्रियदर्शिनी ने किया । कार्यक्रम में डॉ.प्रीतम सिंह शर्मा , डॉ. सुरेंद्र सिंह , श्री घनश्याम भारती , श्री राम केवल , कु.कंचन वर्मा , श्री विशाल कुमार , डॉ.के.योगेश , श्री हर्ष कुशवाहा , डॉ.आर.के. सरोज आदि छात्रों के अलावा बहुत से शोधार्थी भी उपस्थित रहे ।

संगोष्ठी में मुख्य वक्ता प्रोफेसर हंसराज सुमन ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को स्मरण करते हुए भावभीनी भावांजलि अर्पित की । उन्होंने कहा कि नेताजी एक सच्चे देशभक्त ,राष्ट्रवादी व भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के ऐसे अद्वितीय महानायक है जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया । उनकी जयंती पर मात्र उन्हें स्मरण करने का अवसर नहीं है बल्कि उनके विचारों , सिद्धांतों को युवा पीढ़ी को अपनाने का दिन है । प्रो.सुमन ने बताया कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में सुभाष चंद्र बोस की भूमिका अन्य नेताओं से इसलिए अलग थी क्योंकि वे केवल याचना या संवैधानिक सुधारों में विश्वास नहीं रखते थे। उनका स्पष्ट मत था कि अंग्रेज़ी शासन भारत को स्वेच्छा से स्वतंत्रता नहीं देगा। इसी सोच ने उन्हें सशस्त्र संघर्ष के मार्ग की ओर अग्रसर किया। जब उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन किया, तब यह केवल एक सैन्य संगठन नहीं था, बल्कि यह भारत की सोई हुई चेतना को जगाने वाला आंदोलन था। “ तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा ” दिल्ली चलो व जय हिंद जैसा नारा केवल भावनात्मक उदघोष नहीं था, बल्कि वह उस यथार्थ का उद्घाटन था जिसमें स्वतंत्रता का मूल्य त्याग से चुकाना पड़ता है । आज भी बहुत कम लोग जानते हैं कि सुभाष चंद्र बोस ने महिलाओं की भूमिका को स्वतंत्रता संग्राम में कितनी गंभीरता से लिया। रानी झांसी रेजीमेंट का गठन इस बात का प्रमाण है कि वे समानता को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में मानते थे। उस युग में महिलाओं को युद्धभूमि में नेतृत्व देना एक क्रांतिकारी विचार था। बोस समझते थे कि राष्ट्र की मुक्ति तब तक अधूरी है, जब तक समाज का हर वर्ग उसमें सहभागी न बने।

प्रो. हंसराज सुमन ने आगे कहा कि आज के समय में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी NEP के अंतर्गत पाठ्यक्रमों का पुनर्गठन किया जा रहा है, तब यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों को केवल एक अध्याय या फुटनोट तक सीमित न किया जाए। उन्हें उसी गंभीरता और विस्तार के साथ पढ़ाया जाए जैसे अन्य महान क्रांतिकारियों को। शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के साथ सुभाष चंद्र बोस का नाम भारतीय युवा चेतना का साझा प्रतीक है। जहाँ भगत सिंह विचारों की क्रांति के प्रतीक हैं, वहीं बोस संगठित सशस्त्र संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय रणनीति के। इन सभी को एक साथ पढ़ाना छात्रों को यह समझने में मदद करेगा कि स्वतंत्रता संग्राम एकरूप नहीं था, बल्कि उसमें विचार, बलिदान, संगठन और संघर्ष के अनेक आयाम थे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आधार वाले पाठ्यक्रम में सुभाष चंद्र बोस को शामिल करने का अर्थ केवल इतिहास पढ़ाना नहीं, बल्कि नेतृत्व, साहस, अनुशासन और राष्ट्रनिष्ठा जैसे मूल्यों को जीवंत करना है। बोस का जीवन युवाओं को यह सिखाता है कि राष्ट्र के लिए सोचना, जोखिम उठाना और आवश्यकता पड़ने पर व्यवस्था से टकराना भी देशभक्ति का ही स्वरूप है। आज जब युवा वर्ग करियर, सुविधा और व्यक्तिगत सफलता के बीच उलझा हुआ है, तब बोस का जीवन यह प्रश्न खड़ा करता है कि हम राष्ट्र के लिए क्या कर रहे हैं ?

संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर के.पी. सिंह ने व्याख्यान में अपने विचार रखते हुए कहा कि सुभाष चंद्र बोस महज़ स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी ही नहीं बल्कि एक विशुद्ध विचारक और दार्शनिक थे जिन्होंने कई सामाजिक न्याय एवं समतावादी विचारों को बढावा दिया है । उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान में नेताजी के विचारों को जीवंत करने का यही समय अति प्रासंगिक है जिसके फलस्वरूप उस राष्ट्र की परिकल्पना को भी प्राप्त किया जा सकता है जिसका स्वप्न नेताजी ने देखा था । उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत आजादी के आंदोलन में भाग लेने वाले नायकों को पढ़ाया जाना चाहिए । दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को मुख्य विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए , यहाँ उनके नाम पर चेयर बने व उनके नाम पर सुभाषचंद्र भवन तथा शोध अध्ययन केंद्र खोलने के लिए फोरम दिल्ली विश्वविद्यालय कुलपति से मांग करें। कार्यक्रम के अंत में देशभक्ति से संबंधित एक गीत डॉ .राजकुमार ने गाया । इस संगोष्ठी को सफल बनाने में प्रो.संदीप , प्रो. प्रमोद कुमार सहित श्री प्रसून पाटिल , श्री प्रदीप कुमार आदि छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रहीं ।

 

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