साहित्य साधक सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थान लखनऊ ने प्रो. विश्वम्भर शुक्ल एवं सरवर लखनवी को सम्मानित किया

लखनऊ : साहित्य साधक सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थान लखनऊ की मई माह की काव्य गोष्ठी रविवार 25 तारीख़ को उपमा आर्य के निवास बी वी /23 सेक्टर 6ए बाबू विहार तेलीबाग में सम्पन्न हुई। गोष्ठी में कवि “प्रो. विश्वम्भर शुक्ल” को “गोस्वामी तुलसीदास साहित्य साधक सम्मान” एवं शायर “प्रभात कुमार सरवर लखनवी” को “मिर्जा ग़ालिब साहित्य साधक सम्मान” से सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता भूपेंद्र सिंह “होश लखनवी” ने की। मुख्य अतिथि अनिल किशोर शुक्ल निडर रहे, विशिष्ट अतिथि हरि प्रकाश हरी रहे। संस्था के अध्यक्ष डॉ हिमांशु सक्सेना “अर्श लखनवी” एवं कार्यक्रम आयोजक आर्य दम्पति दीनबंधु आर्य व उपमा आर्य की विशेष उपस्थिति रही। समारोह का कुशल संचालन मनमोहन बाराकोटी ,तमाचा लखनवी ने किया।
सभी मंचस्थ मनीषियों सहित अरविन्द रस्तोगी, डाॅ. स्वाति पाण्डेय, “”प्रीत””, तारिका सिंह “नूर”, नीलेश ज्वाला आदि ने दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती पूजन कर कार्यक्रम का प्रारंभ किया। कवयित्री डाॅ. तारिका सिंह नूर द्वारा वाणी वंदना एवं कवयित्री श्वेता शुक्ला द्वारा भारत माता वंदना के सुमधुर वाचन के साथ कार्यक्रम प्रारंभ हुआ।
कार्यक्रम के इस पर्व पर 30 से अधिक कवि मनीषियों ने अपनी शानदार काव्य प्रस्तुति देकर प्रांगण में उपस्थित सभी का दिल जीत लिया। दीपांशी शुक्ला ने पढ़ा- चलूं साथ तेरे दगा तो न दोगे, मेरे हौसलों को डिगा तो न दोगे।, कुलदीप शुक्ला ने पढा- ज़िन्दगी जो सवांरता है यहाँ,दिल उसी को पुकारता है यहाँ।, डॉ० स्वाति पांडेय प्रीत ने पढा- प्रियवर तेरे दर्शन को अब तरसे मेरे नैन।, अरविंद रस्तोगी धवल ने पढ़ा- गीतों का मेरे आंगन में नित मुस्काना होता है।, डाॅ० हरी प्रकाश हरि ने कहा- हमने हर हमले के बदले हमलावर का मुॅंह तोड़ा है।, संध्या सिंह ने पढा- पानी का कागज़ लिया, लिखी नमक से पीर। निलेश ज्वाला ने बोले- शेर तो शेर है सुनो “ज्वाला”, आँख गीदड़ भी अब दिखाता है।, तारिका सिंह नूर ने पढ़ा- बहुत हो चुकी अब तो नफ़रत की खेती, फ़सल इश्क की आज देखें उगाकर।, दीन बंधु आर्य ने कहा- लिखेंगे इक खत कभी तो तुमको जो मैने अब तक लिखा नहीं है। उपमा आर्या सहर जवाब में बोली- शाम यादों की सुहानी रह गई, जिंदगी बन के कहानी रह गई।, रश्मि शफ़क ने पढा- है हवा संदली संदली,जाने क्यों याद वो आ रहा है।, विपुल मिश्र बजरंगी को याद कर के बोले- सीता जी के प्यारे प्रभु राम के दुलारे और नयनों के तारे हैं वीर हनुमान।, उमा लखनवी ने पढा- हम जो से खौफ से लगते है।, रमा शंकर वर्मा ने पढा- छलक उठे संगीत भारती गाउं ऐसे गीत।, अमर विश्वकर्मा बोले- जबसे उनकी मेहरबानी हो गई, ज़िंदगी और भी सुहानी हो गई।, श्वेता शुक्ला बोली-जिंदगी की डोर अंजनी के लाल थामिएगा,एक पल और अब अकेले नहीं चला जाता है।, मनमोहन बारा कोटी ने राम को याद किया- जब-जब मन आहत हुआ लिया राम का नाम, तब ही तो पूरे हुए सारे बिगड़े काम।,अनिल किशोर निडर बोले – उठो देश के वीर जवानों जागो अपनी आँखें खोलो।,
गोस्वमी तुलसीदास सम्मान से सम्मानित प्रो विश्वम्भर शुक्ल बोले-राष्ट्र की महान है परम्परा यही; शान्ति, ध्यान,योग का विचार दे चलो।, मिर्ज़ा ग़ालिब सम्मान से सम्मानित सरवर लखनवी ने कहा- मैंने आंसुओं से जो लिख दिया, अभी उसको तूने पढ़ा नहीं।, संस्था के संस्थापक डॉ० हिमांशु सक्सेना ‘अर्श लखनवी’ ने जिंदगी की व्याख्या करते हुए कहा- खूबसूरत फूल का एक हाथ है ये जिंदगी, तो कभी जलता हुआ अंगार है ये जिंदगी।, फलस्वरूप भूपेंद्र सिंह होश ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सभी प्रस्तुतियों की भूरि-भूरि प्रसंशा करते हुए कहा- इक झलक भर दिखी थी तुम्हारी सनम, मुझको सारे जहां की खुशी मिल गई। आदि अनंय कवियों ने अपने गीत गजल छंद एवं मुक्तकों से सबको भाव विभोर कर दिया। अंत में संस्था की ओर से कार्यक्रम आयोजक कवि दीनबंधु आर्य ने धन्यवाद ज्ञापन कर कार्यक्रम को पूर्ण किया।



