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नफरत और भड़कावे की अनगिनत कोशिशों के बावजूद आमजन के बीच कायम अभूतपूर्व एकता को आगे बढ़ाना होगा

पहलगाम हत्याकांड-

डॉ. गिरीश

पहलगाम की आतंकी घटना जिसमें दो दर्जन से अधिक पर्यटक और स्थानीय नागरिकों की जानें चली गयीं, का उद्देश्य किसी से छिपा नहीं है। निश्चय ही यह जघन्य कांड देश के अन्दर के संप्रदायवादियों द्वारा यहाँ उगाई गयी नफरत की फसल को खाद पानी देकर भारत को अंदर से कमजोर करना था। साथ ही आतंकवाद के घृणित उद्देश्यों को समझ चुकी कश्मीरी जनता और देश के अन्य भागों की जनता के बीच मजबूत होती जा रही मेल- मिलाप की कड़ियों को कमजोर करना था। इस मेल- मिलाप के नतीजे के तौर पर कश्मीर में बड़े पैमाने पर पर्यटकों का आगमन, एकता के दुश्मनों को इसलिए खटक रहा था कि इससे कश्मीर की जनता बेपनाह खुशहाली की ओर बढ़ रही थी और कश्मीर घाटी विकास के मार्ग पर अग्रसर हो रही थी।

पहलगाम कांड पर स्वाभाविक प्रतिक्रिया आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों के उद्देश्यों को समझ कर ही होनी चाहिये थी। लेकिन इस जघन्य कांड के घटने की जिम्मेदारी जिस सत्ता प्रतिष्ठान की थी, उसने अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए जो खेल खेला वह भी कम शर्मनाक नहीं है। सत्ता प्रतिष्ठान और उसके अवयवों ने घटना पर साफगोई के साथ आलोचना और आत्मालोचना करने के बजाय आतंकवादियो द्वारा कथित तौर पर धार्मिक पहचान जानने के बाद हत्यायेँ करने जैसे अपुष्ट और गढ़े गये आख्यानों को ज्यादा उछाला। नफरती तत्वों और गोदी मीडिया ने आतंकवादियों के खिलाफ वांच्छित कठोर कार्यवाही करने की मांग के बजाय मुसलमानों और कश्मीरियों के खिलाफ जहर उगलने पर ज़ोर दिया। उनकी राजनीति को यही सूट करता था। भड़कावे की इन कार्यवाहियों की प्रतिक्रिया होनी ही थी, सो हुयी।

आगरा में एक होटल के बेटर की हत्या इसलिए कर दी गयी क्योंकि वह मुसलमान था। हत्यारों ने वीडियो जारी कर इस शर्मनाक कृत्य की न केवल ज़िम्मेदारी ली, अपितु घोषणा की कि उतने ही लोगों को मारा जायेगा जितनों की हत्या पहलगाम में की गयी है। देहरादून में शहर के बीचोबीच स्थित सैय्यद कमाल शाह बाबा की मजार को तोड़ दिया गया। जबकि बाबा के मुरीदों में अधिकतर हिन्दू समाज से हैं। बात बात पर आस्था का प्रश्न उठाने वाले गैंग ने बाबा के अनुयाइयों की आस्था की किंचित परवाह नहीं की। ऐसी वारदातें अनेकों जगह हो रहीं हैं। अनेकों जगह कश्मीरी छात्रों और नागरिकों को जान से मारने की धमकियाँ दी गयीं। भय के माहौल में उन्हें पलायन करना पड़ा- खास कर उन राज्यों से जहां भाजपा/ एनडीए की सरकारें हैं।

छोटी- बड़ी ऐसी घटनाओं की संख्या हजारों में है। इनका संज्ञान लिया जाना चाहिये और कानूनी कार्यवाही की अपेक्षा की जानी चाहिये।

लेकिन पहलगाम की इस घटना ने देश के इतिहास की धारा को नयी दिशा में मोड़ने का काम भी धीरे से कर दिया है । घटना के बाद की दूसरी प्रतिक्रियाएं न केवल सराहनीय हैं अपितु इस कहावत को चरितार्थ करने वाली हैं कि ‘इतिहास का निर्माण जनता करती है, शासक नहीं!’

घटना वाले दिन शाम को ही कश्मीर में कई जगह लोगों ने स्वतःस्फूर्त जुलूस निकाले। गुस्साये लोगों ने आतंकवाद और उसके आका पाकिस्तान के खिलाफ जोरदार नारे लगाये। घटना के अगले दिन कश्मीर बन्द हुआ। बन्द को सफल बनाने का ऐलान मस्जिदों से किया गया। सोशल मीडिया पर हिंदुओं के साथ साथ मुस्लिमों के बयान भी आए जिनमें आतंकवाद की मुखर आलोचना की गयी, और हत्याओं पर गहरा दुख और आक्रोश प्रकट किया गया।  आतंकवाद के पुतले जलाने में अनेक मुस्लिम संगठन और नागरिक सामने आए। न कहीं दंगा हुआ और न कर्फ़्यू लगा। यह सब स्वाभाविक और स्वतःस्फूर्त तरीके से घट रहा था, किसी राजनैतिक दल ने इसका आह्वान किया हो, ऐसा नहीं था।

घटना के समय भी पर्यटकों की परिचर्या में लगे कश्मीरियों ने लोगों को बचाने और आतंकवादियों को ललकारने का जो उल्लेखनीय और अभूतपूर्व कार्य किया, उसकी चर्चा भी सर्वत्र हो रही है।

आक्रोशपूर्ण इन कार्यवाहियों के बीच आतंकवाद से निपटने में केंद्र सरकार की विफलता पर सवाल भी उठते रहे। आमजन अपने पिछले अनुभवों से यह भी कयास लगाते रहे कि कहीं यह कांड शासक दल का बिहार विधान सभा के भावी चुनावों में लाभ उठाने का हथकंडा तो नहीं है? सरकार द्वारा आतंकवाद को नियंत्रित करने के नाम पर उठाए गये कदमों को लोग आतंकवाद के खिलाफ कम, जनता को बहलाने की कवायद ज्यादा मान रहे हैं। आतंकवाद पर प्रभावी कार्यवाही को लेकर भी मौजूदा सरकार के बारे में जनता सशंकित है।

लेकिन अब हम दोबारा उन कार्यवाहियों की तरफ लौटते हैं जो हमारे इस भरोसे को मजबूती देती है कि जनता जाग चुकी है, और अब उसे और ज्यादा बहकाया नहीं जा सकता।

कश्मीर की जनता का रुझान वहाँ की सरकार के रवैये में स्पष्टतः परिलक्षित हुआ है। जम्मू कश्मीर विधान सभा के विशेष सत्र में आतंकवाद के खिलाफ पहली बार ध्वनिमत से प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव के जरिये विधान सभा ने पूरी दुनियाँ को संदेश दिया कि दहशतगर्दी के लिए अब कोई जगह नहीं है। सदन ने दो मिनट का मौन रख मारे गये 26 पर्यटकों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी। पर्यटकों को बचाने के लिये जान की कुर्बानी देने वाले आदिल हुसैन शाह की बहादुरी को भी याद किया। उपमुख्यमंत्री सुरेन्द्र चौधरी ने कहा कि बर्बर और अमानवीय हमले से गहरा सदमा और दुख पहुंचा है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने वक्तव्य में रेखांकित किया कि 26 साल में पहली बार बिना किसी आह्वान के लोग खुद बाहर आए हैं। इस बदलाव को हमें कायम रखना होगा।

प्रस्ताव में सभी राजनैतिक दलों, धार्मिक- सामुदायिक नेताओं, युवा- संगठनों, नागरिक समूहों से हिंसा को पीछे छोड़कर शांति, सांविधानिक मूल्यों को कायम रखने और एकता पर बल दिया गया। यह आमजनता द्वारा सड़कों पर प्रदर्शित एकता और एकजुटता का ही परिणाम था कि जम्मू कश्मीर विधान सभा में आतंकवाद के खिलाफ सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों एक मंच पर दिखे।

नफरती चिंटूओं द्वारा घटना को लेकर भड़काई जा रही नफरत की आग के बावजूद एकता और एकजुटता का यह मंजर देश के कोने कोने में दिखाई दे रहा है। अलीगढ़ एक ऐसा जनपद है जो पूर्व में सांप्रदायिक दंगों के लिये कुख्यात रहा है। लेकिन पहलगाम कांड के प्रति उपजे आक्रोश ने वहाँ के जनमानस को अभूतपूर्व रूप से एकजुट कर दिया। तमाम व्यापारिक और औद्योगिक संगठनों ने वहां अलीगढ़ बन्द का आह्वान किया तो शहर मुफ्ती ने भी उसका समर्थन किया। ऊपरकोट स्थित जामा मस्जिद से भी बन्द को सफल बनाने का आह्वान किया गया। परिणामतः हिन्दू मुस्लिम सभी इलाकों में अभूपूर्व बन्द हुआ। एक हिन्दी दैनिक द्वारा बहुत ही संक्षेप में दी गई खबर बन्द की व्यापकता और उसके द्वारा कायम हुयी एकता को उजागर कर देती है-

“पहलगाम आतंकी हमले के विरोध में सोमवार को संयुक्त व्यापार मण्डल के आह्वान पर अलीगढ़ पूरी तरह बन्द रहा। शहर में जहां व्यापारियों ने अपने प्रतिष्ठान और फैक्ट्रियाँ बन्द रखीं, वहीं स्कूल कालेज भी नहीं खुले। बिना किसी जबरदस्ती व दबाव के व्यापारियों ने प्रतिष्ठान बन्द रखे। नये से लेकर पुराने शहर तक बन्द सफल दिखाई दिया। पहली बार ऐसा देखने को मिला कि रेहड़ी पटरी वालों ने भी बन्द का पूरा समर्थन किया। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में भी एक भी दुकान नहीं खुली।“

अलीगढ़ में ऐसी जन एकता पहले कभी नहीं देखी गयी।

कश्मीर से लेकर देश के तमाम हिस्सों में देखी जा रही इस जन एकता को हम सलाम पेश करते हैं।

इस जन एकता की न केवल रक्षा की जानी चाहिये, अपितु इसे आगे बढ़ाने के ठोस प्रयास किए जाने चाहिये।

लेकिन जनता जहां एकजुट हुयी है, शान्ति और भाईचारे की मुहिम को आगे बढ़ा रही है वहीं परंपरागत संप्रदायवादी और गोदी मीडिया न केवल नफरत की आग भड़का रहे हैं अपितु युद्धोन्माद पैदा कर रहे हैं। मानो आतंकवाद से निपटने का एक मात्र हल युद्ध ही हो। अनेक विपक्षी दल और उसके नेतागण भी सरकार को युद्ध छेड़ने के लिये ललकार रहे हैं। वे भूल गये हैं कि दुनियाँ के अनेक कोनों में चल रहे और चलते रहे युद्ध भयावह बर्वादी बरपाने के बावजूद भी आतंकवाद को मिटा नहीं पाये। हमें आतंकवाद से सुनियोजित और गंभीर लड़ाई लड़ कर उसे परास्त करना होगा।

निश्चय ही हमें संसद में चर्चा कर इसकी गहन रणनीति तैयार करनी होगी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद पी. संदोष कुमार ने संसदीय कार्य मंत्री को पत्र लिख कर इस विषय पर संसद का विशेष सत्र बुलाने की ठीक ही मांग की है।

लेकिन यहाँ यह दोहराना आवश्यक है कि जनता के बीच जो एकता और एकजुटता कायम हुयी है, उसकी न केवल रक्षा की जानी चाहिये अपितु उसे आगे बढ़ाने को हर संभाव प्रयास किए जाने चाहिये। यह एकता ही है जिससे नफरत और विभाजन का खेल खेलने वाले डरते हैं। और यही सामाजिक एकता उनके फासिस्टवादी मंसूबों को परास्त कर सकती है।

 

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