लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतें – कोठी दिलकुशा

के. सरन
कोठी दिलकुशा और इसके शानदार बाग को नवाब सआदत अली खां ने बनवाया था। सआदत अली निहायत विनम्र और समझदार इन्सान थे। किस्मत से आसफुद्दौला के बाद नवाब बनने के पहले वह अवध जैसे सूबे के नवाब शुजाउद्दौला के बेटे होते हुए भी, बनारस में अपनी मां के साथ रहते हुए बहुत कष्ट उठाए थे।
उन्होने राजधानी को सजाने संवारने के लिए रेजीडेन्सी
से दिलकुशा तक एक कतार में कई महल और बगीचों को बनवाया। टेढ़ी कोठी (जहां अब ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन का कार्यालय है) ,दरबार-हाल (लाल बारादरी),कोठी नूर बख्श, कंकर वाली कोठी,खुर्शीद मंजिल,बादशाह मंजिल, आदि बनवाई। दिल कुशा कोठी जो आज लखनऊ शहर के बीच है उस समय शहर से दूर बाहर और जंगली इलाके में, शिकार खेलने के मकसद से बनवाई गई थी।

दिलकुशा कोठी में शिकार खेलने का पूरा इंतजाम था।ऊंची मंजिल की मीनार नुमा कोठी के अन्दर से ही शिकार खेलने और शिकार पर निशाना लगाने के लिए इसकी चारों दिशाओं की ओर खुलने वाली इटैलियन शैली की चार बड़ी खिड़कियां लगवाई गई थीं।इस इलाके में चारों तरफ हिरन और जंगली जानवर रहते थे और पाले जाते थे। नवाब यहां तबियत बहलाने और आराम फरमाने साथियों के साथ आया करते थे।
सआदत अली के बाद नसीरुद्दीन हैदर ने भी इसका नवीनीकरण कराया था और नए तरीके से इसे सजाया संवारा था ।नसीरुद्दीन हैदर को अंग्रेजी ढ॔ग से रहने और खाने पीने का शौक था।उसने अपने अंग्रेज दोस्त मिस्टर माट्ज जो पश्चिमी संगीत का महारथी था उसे इस कोठी में अपने मनोरंजन के लिए रखा था जो पेन्टिंग भी बहुत बढिया बनाता था ।
इसी कोठी में उसने एक से बढकर एक पेन्टिंग्स नसीरुद्दीन हैदर के लिए बनाई थीं। यहां नवाब की बेगमें सावन में आकर रहती थीं उनके लिए झूले ड़ाले जाते थे ।ऐशो आराम का पूरा सामान यहां उपलब्ध रहता था।
एक तरह से नवाब सआदत अली की बनवाई इस कोठी का असली इस्तेमाल नसीरुद्दीन हैदर ने किया।
1857 में जब अंग्रेजों ने लखनऊ को घेरा तो कानपुर की ओर से लखनऊ में घुसने वाली अंग्रेज़ी सेना को बेगमहजरत महल और डंका शाह के नेतृत्व में आलमबाग में स्थित नवाब अली शाह द्वारा अपनी बेगम आलम आरा के कहने पर बनवाई गई कोठी के मुख्य गेट जो अब chandar नगर गेट है, के पास अँग्रेजी सेना को रोका गया था ।वहीं अंग्रेजों से युद्ध हुआ और अंग्रेज सेना दिलकुशा की ओर से शहर की ओर जाने के लिए बढ़ी तभी गुजरते हुए,उनकी नजर एकान्त में बनी दिलकुशा कोठी पर पड़ी। महफ़ूज़ जगह जानकर अंग्रेज़ी सेना ने यहीं पड़ाव डाल दिया और रात्री में रुक गई।
शहर में अंग्रेज सेना से गदर जारी था।जैसे ही लखनऊ के क्रांतिवीरों को यह पता चला उन लोगों ने दिलकुशा कोठी को घेर लिया और जबरदस्त हमला किया।उन्होने दिलकुशा कोठी की ईंट से ईंट बजा दी। अंग्रेज सेनापति हेनरी हैवलाक ने इसी कोठी में दम तोड़ दिया।
दिलकुशा गार्डेन का बहुत बड़ा हिस्सा अब लखनऊ कैंट और बस्तियों मे तब्दील हो चुका है।
गदर में 1857 में ही यह बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी खंडहर में तब्दील हो चुकी इस कोठी के भग्न अवशेष के रूप में शिकार गाह के लिए सआदत अली खां द्वारा बनाई गई गोल बारादरी ही अस्तित्व में है।फिल्हाल जो अवशेष हैं उन्हे सजा -संवार कर रखा गया है।
सर्वाधिकार सुरक्षित



