
बांग्ला आलेख : मोहम्मद सलीम, अनुवाद : संजय पराते
कुछ साल पहले, विजया दशमी के मौके पर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक (प्रमुख) मोहन भागवत ने नागपुर स्थित संगठन के मुख्यालय में एक नए शब्द का ज़िक्र किया था — ‘सांस्कृतिक मार्क्सवादी।’
लेकिन यह शब्द बिल्कुल भी ‘भारतीय’ नहीं है। इसे विदेश से आयात किया गया था। जैसा कि आरएसएस के वैचारिक नेता राम माधव ने स्वीकार किया था : ‘सांस्कृतिक मार्क्सवाद और जागरणवाद (वोकइज़्म) की अपनी आलोचना में, भागवत को पश्चिम में कई समर्थक मिलेंगे।’ (इंडियन एक्सप्रेस, 28 अक्टूबर, 2023)।
राम माधव सही थे। ‘सांस्कृतिक मार्क्सवाद’ शब्द सुनने में भले ही ‘उत्तर-आधुनिक’ लगे, लेकिन इसकी एक लंबी और ज़हरीली विरासत है (न्यूयॉर्क टाइम्स, 13 नवंबर, 2018)। पिछली एक सदी से, अति-दक्षिणपंथी इस शब्द का इस्तेमाल करते आ रहे हैं, और नव-फ़ासीवादी तो इसे लगातार और चिंताजनक ढंग से इस्तेमाल कर रहे हैं। फ़ासीवाद ने लगातार मार्क्सवाद को निशाना बनाया है — शुरू में इसे ‘यहूदी बोल्शेविज़्म’ का नाम दिया, और बाद में ‘सांस्कृतिक मार्क्सवाद’ कहा। नॉर्वे के अति-दक्षिणपंथी उग्रवादी एंडर्स ब्रेविक ने, जिसने जुलाई 2011 में ओस्लो के एक समर कैंप में 77 बेकसूर लोगों की हत्या का जघन्य अपराध किया था, अपने 1,500 पन्नों के घोषणापत्र में इस शब्द का 600 बार ज़िक्र किया था।
यह बात व्यापक रूप से मानी जाती है कि देश की सीमाओं के भीतर और बाहर, दोनों जगह दुश्मनों की पहचान करना, सत्ता को मज़बूत करने के लिए तानाशाह नेताओं द्वारा अक्सर अपनाई जाने वाली एक रणनीति है। भारत में, मोहन भागवत ने वामपंथी और प्रगतिशील ताकतों के खिलाफ़ तीखी प्रतिक्रिया भड़काने के लिए इसी तरह की बयानबाज़ी की है। वामपंथी ताकतें आरएसएस की फ़ासीवादी विचारधारा और मोदी सरकार के उन तानाशाही कदमों का विरोध कर रही हैं, जो भारत की विविधता की परंपरा को कमज़ोर कर रही हैं। भागवत का मकसद, पश्चिमी धुर-दक्षिणपंथी समूहों की बयानबाज़ी को अपनाकर, इस देश के वामपंथियों को ‘भारतीय संस्कृति’ के दायरे से बाहर दिखाना है। यह उन्हें ‘पराया’ बनाने का एक तरीका है।
बदनामी का यह अभियान वामपंथी छात्र आंदोलनों और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों — जिनमें लेखक, शोधकर्ता और शिक्षाविद शामिल हैं — को दबाने का एक जान-बूझकर किया गया प्रयास है। इसके पीछे की मूल धारणा यह है कि साम्यवाद अपने आप में एक ‘विदेशी’ विचारधारा है ; इसके दार्शनिक आधार, वैचारिक सिद्धांत, प्रतीकात्मक हस्तियाँ और प्रेरक स्थल — ये सभी भारत की सीमाओं के बाहर उत्पन्न हुए हैं, और इस प्रकार यह इसके अनुयायियों को ‘बाहरी’ सिद्ध करता है।

जैसे-जैसे अति-दक्षिणपंथी राजनीति को ज़ोर मिल रहा है, यह दुष्प्रचार भी तेज़ होता जा रहा है। लोगों को ‘बाहरी’ करार देना अब एक महज़ औपचारिकता बनकर रह गया है। बहरहाल, यह परिघटना केवल भारत तक ही सीमित नहीं है। वैश्विक स्तर पर, अति-दक्षिणपंथी समूह एक जानी-पहचानी रणनीति अपनाते हैं : ज़ेनोफ़ोबिया, जिसके तहत विदेशियों को लेकर एक अतार्किक भय और बेवजह की घबराहट पैदा की जाती है। यह रवैया ट्रंप के अमेरिका, फ्रांस में मरीन ले पेन की नव-फ़ासीवादी ‘नेशनल रैली’, जर्मनी की नव-नाज़ी ‘अल्टरनेटिव फ़ॉर जर्मनी’, इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी की ‘ब्रदर्स ऑफ़ इटली’ — जो मुसोलिनी की वैचारिक उत्तराधिकारी है — और स्पेन की नव-फ़्रैंकोवादी ‘वॉक्स पार्टी’ में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है ; ये सभी एक ही तरह के नैरेटिव (आख्यान) से चिपके रहते हैं।
भारत में, आरएसएस लंबे समय से ‘दुश्मनों’ की पहचान करने में लगा हुआ है। संघ के दूसरे सरसंघचालक और सर्वोच्च वैचारिक मार्गदर्शक माधव सदाशिव गोलवलकर ने अपनी किताब ‘बंच ऑफ़ थॉट्स’ में कथित ‘हिंदू राष्ट्र’ के लिए तीन ‘आंतरिक खतरों’ की पहचान की थी : मुस्लिम, ईसाई और कम्युनिस्ट। अपने घोर मुस्लिम-विरोधी लेखन में, ‘गुरुजी’ गोलवलकर ने यह तर्क दिया कि इस देश में सह-अस्तित्व के लिए, मुस्लिमों को ‘दूसरे दर्जे की नागरिकता स्वीकार करनी होगी, बहुमत के वर्चस्व के आगे झुकना होगा और उनके उत्पीड़न को सहना होगा।
मोदी और मोहन भागवत आज एक जैसी ही भावनाएँ व्यक्त कर रहे हैं। इस आख्यान में कुछ भी नया नहीं है। उनके अनुसार, कम्युनिस्टों से जुड़ी हर चीज़ विदेशी है —चाहे वे मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्टालिन जैसी प्रभावशाली हस्तियाँ हों, या फिर ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ जैसा उनका मूल ग्रंथ ही क्यों न हो।



