एलडीए की सीलिंग और कंपाउंडिंग का खेल, एक तमाशा

मोहम्मद सैफ
लखनऊ शहर अपनी नजाकत और तहज़ीब के लिए जाना जाता है, लेकिन लगता है कुछ लोगों ने इस तहज़ीब को अवैध निर्माण की तहज़ीब में बदल दिया है। अमीनाबाद, जो कभी अपनी गलियों और बाजारों के लिए मशहूर था, आज अवैध इमारतों के जाल में तब्दील हो रहा है।
शिकायतें होती हैं, कार्रवाई का ढोंग भी रचा जाता है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात! अमीनाबाद चौराहे पर बाटा शोरूम के सामने स्थित आरिज फैशन क्लब का मामला एक बेहतरीन मिसाल है। पहले LDA ने बड़ी शान से इस अवैध निर्माण को सील किया, मानो भ्रष्टाचार की जड़ ही काट दी हो। लेकिन कुछ दिनों बाद, कम्पाउंडिंग का जादू चला और सील खुल गई। अधिकारियों ने तर्क दिया, क्षेत्रफल कम है, जैसे कि अवैध निर्माण का क्षेत्रफल कम होने से उसका अपराध भी कम हो जाता है।
यह कार्रवाई नहीं, बल्कि एक तमाशा है। यह उन लोगों के लिए एक खुला आमंत्रण है जो नियमों को ताक पर रखकर अपनी मनमानी करते हैं। वे जानते हैं कि थोड़ी-बहुत कागजी कार्रवाई के बाद सब ठीक हो जाएगा। आखिर, जब अधिकारी कुंभकरण की नींद में सोए हों, तो ऐसे बिल्डर क्यों न जश्न मनाएं? परिवर्तन जोन छह के मुखिया, अंगद साहब, जब से आए हैं, ऐसा लगता है कि उन्होंने अवैध निर्माणों को संरक्षण देने का बीड़ा उठा लिया है।
यहां तक कि जब कोई जागरूक नागरिक शिकायत करता है, तो उसे ताना मारा जाता है कि आप बहुत जागरूक हो। मानो जागरूकता एक गुनाह हो और भ्रष्टाचार एक कर्तव्य! यह दिखाता है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि मिलीभगत का खेल है।
अमीनाबाद की संकरी गलियों में पैदल चलना भी मुश्किल है और ऐसे में बिना पार्किंग की व्यावसायिक इमारतें शहर के लिए नासूर साबित हो रही हैं। यह सिर्फ एक इमारत का मामला नहीं, बल्कि पूरे शहर की व्यवस्था का सवाल है, जो भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी हो रही है। जब तक अधिकारी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे और सिर्फ कागजों पर कार्रवाई करते रहेंगे, तब तक लखनऊ का यह ‘विकास’ ऐसे ही जारी रहेगा।



