कच्चा हाता की गलियों में गूंजा गम-ए-हुसैन का मरसिया
मजलिस-ए-अज़ा का दिलकश मंज़र

लखनऊ । वह शहर जो अपनी तहज़ीब और मोहब्बत की मिसाल है, एक बार फिर अकीदत के रंग में डूबा नज़र आया। अमीनाबाद के पुराने मोहल्ले कच्चा हाता में, मस्जिद गौरी बी में, 7 रबी-उल-अव्वल को एक ऐसी अलविदाई सालाना मजलिस-ए-अज़ा मुनअकिद हुई, जिसने हर दिल को गम-ए-हुसैन की याद में सरशार कर दिया। रात 9:30 बजे के बाद मस्जिद को रौशन कर दिया, तो हाज़िरीन का हुजूम उमड़ पड़ा, मानो हर शख्स इमाम हुसैन (अ.स.) की याद में अपने दिल का नज़राना पेश करने को बेताब था।
इस मजलिस की रौनक को चार चांद लगाने का ज़िम्मा था हुज्जत उल इस्लाम अलीजनब मौलाना आसिफ अली ग़दीरी साहब किबला के पास। उनकी ज़बान से निकले अल्फाज़, ना अदा हम से हो सके आदाब-ए-ताज़ियत, हसरत रही के ना जी भर के रो सके, जैसे ही हवा में तैरने लगे, हाज़िरीन की आँखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ आया। मौलाना ने कर्बला के उस दर्दनाक वाक़िये को इस खूबसूरती से बयान किया कि हर दिल उस मंज़र में खो गया, जहां इमाम हुसैन (अ.स.) ने हक़ और इंसाफ के लिए अपनी जान का नज़राना पेश किया। उनकी तक़रीर में सब्र और इस्तेक़ामत की ऐसी मिसालें थीं, जो हर सुनने वाले के रूह में उतर गईं।
इस मजलिस का इंतेज़ाम समीर अली, डब्बू, कमाल उर्फ अली और कच्चा हाता के तमाम मोमिनीन की जानिब से किया गया, जिन्होंने अपने जज़्बे और मेहनत से इस मौके को यादगार बना दिया। जैसे ही मजलिस अपने इख्तेताम की तरफ बढ़ी, अंजुमन गिरोहे हुसैन की नौहेख्वानी ने माहौल को और भी गमगीन कर दिया। नौहों के बोल, जो इमाम हुसैन और उनके वफादार साथियों की कुरबानी को याद कर रहे थे, हवा में गूंजे और हर आँख से आंसुओं की लड़ी छलक पड़ी। यह नौहेख्वानी सिर्फ़ शब्दों का मेल नहीं थी, बल्कि एक ऐसा सिलसिला था, जो दिलों को कर्बला की वादी तक ले गया।
यह मजलिस-ए-अज़ा सिर्फ़ एक मजहबी इज्तेमा नहीं थी, बल्कि इमाम हुसैन (अ.स.) की याद में अकीदत और मोहब्बत का एक ज़िंदा पैगाम थी। हर हाज़िर की आँखों में गम और दिलों में इमाम के लिए बेपनाह मोहब्बत साफ़ झलक रही थी। कच्चा हाता की तंग गलियों में बसी यह मजलिस, लखनऊ की तहज़ीब और इमाम की याद का एक अनमोल तोहफा बन गई, जो हर सुनने और पढ़ने वाले के दिल को छू लेगी।



