शिक्षा अज्ञानता के अंधकार में प्रकाश की किरण है: डॉ. सैयद गुलाम नबी अहमद
लखनऊ विश्वविद्यालय के फारसी विभाग में ‘वर्तमान समस्याएं एवं उनके समाधान’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित

लखनऊ : शिक्षा के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। यह व्यक्ति को दुनिया को समझने, समस्याओं को सुलझाने और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल प्रदान करती है। हालांकि, केवल शिक्षा ही पर्याप्त नहीं है। यदि व्यक्ति में नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूकता नहीं है, तो उसकी शिक्षा समाज के लिए हानिकारक भी साबित हो सकती है। शिक्षा अज्ञानता के अंधकार में प्रकाश की किरण है। शिक्षा इस दुनिया में हर इंसान का मौलिक अधिकार है। दुनिया का विकास पूरी तरह से शिक्षा पर निर्भर करता है। इसलिए हमें शिक्षा को बढ़ावा देकर अज्ञानता को दूर करना चाहिए। शिक्षा के महत्व को उजागर करने के लिए नेल्सन मंडेला ने कहा था: शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं। यह विचार लखनऊ विश्वविद्यालय के फारसी विभाग के अध्यक्ष डॉ. सैयद गुलाम नबी अहमद ने ‘वर्तमान समस्याएं और उनके समाधान’ शीर्षक संगोष्ठी में अपने अध्यक्षीय भाषण में व्यक्त किए। संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि और निदेशक डॉ. सिकंदर इस्लाही ने कहा कि आपकी जानकारी में है कि वर्ष 2017 से अकादमिक और बौद्धिक संगोष्ठियों की एक श्रृंखला आयोजित की जा रही है, जिसका उद्देश्य युवाओं, छात्रों को लिखने, पढ़ने और उनके लेखन कौशल को उजागर करने के अवसर प्रदान करना है। अल्हम्दुलिल्लाह, यह प्रयास लखनऊ, सीतापुर, पीली-भीत और विशेष रूप से आजमगढ़ के विभिन्न गांवों में लगातार जारी है। इस अकादमिक आंदोलन के तहत, हमें खुशी है कि बड़ी संख्या में छात्रों और स्नातकों ने इन संगोष्ठियों में भाग लिया और लेख लिखने के लिए आकर्षित हुए। वे युवा जो शुरू में दो पेज लिखने से भी डरते थे, अब, माशा अल्लाह, पंद्रह से बीस पेज के शोध लेख लिखने की क्षमता विकसित कर चुके हैं और अब, माशा अल्लाह, बड़ी संख्या में छात्र लेखन और संकलन के क्षेत्र में कदम रख चुके हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के फारसी विभाग में आयोजित संगोष्ठी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। हमारा प्रयास है कि सेमिनारों को महज औपचारिकता न बनाया जाए, बल्कि इसे वैज्ञानिक और बौद्धिक आंदोलन के रूप में बनाए रखा जाए और इसके मानकों को उच्चतम स्तर तक बढ़ाया जाए।
विशिष्ट अतिथि जियाउल्लाह सिद्दीकी नदवी ने कहा कि इस्लामी इतिहास गवाह है कि मुसलमानों ने शिक्षा और प्रशिक्षण में ज्ञान प्राप्त करके धर्म और दुनिया में गौरव और प्रगति हासिल की, लेकिन जब मुसलमान ज्ञान और शिक्षा से दूर हो गए, तो उन्होंने एक राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान खो दी। इसलिए, यदि हम इस्लाम में शिक्षा के महत्व को देखते हैं, तो शिक्षा का इस्लामी दर्शन यह है कि युवाओं की मानसिक, शैक्षणिक और बौद्धिक क्षमताएं उच्च मानवीय मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए ताकि समाज में अच्छाई कायम रहे। किसी के अधिकारों का हनन नहीं किया जाना चाहिए, एक दूसरे का सम्मान किया जाना चाहिए। किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए, निर्माता की इच्छा और आखिरत में मोक्ष को ध्यान में रखना चाहिए। समाज में व्यक्तिगत और सामूहिक जिम्मेदारियों को दृढ़ संकल्प के साथ पूरा किया जाना चाहिए। वास्तव में, इस्लाम में शिक्षा एक उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है और इसके माध्यम से व्यक्ति और समाज को सुधारने का काम किया जा सकता है। कार्यक्रम को डॉ. शबीब अनवर अलवी, डॉ. मुहम्मद खबीब, डॉ. आरिफ हसनैन, डॉ. रजा अजहरी और डॉ. मुहम्मद रेहान ने भी संबोधित किया और वर्तमान समस्याओं और उनके समाधान पर चर्चा की। इस अवसर पर सेमिनार में अपने शोधपत्र प्रस्तुत करने वालों को अतिथियों द्वारा प्रमाण पत्र, स्मृति चिन्ह और मेडल भी प्रदान किए गए। सेमिनार में अपने सारगर्भित शोधपत्र प्रस्तुत करने वालों में विशेष रूप से डॉ. नजीर हुसैन, डॉ. एजाज अहमद, डॉ. सैयद अनवर सफी, मुहम्मद तनवीर आलम, सैयदा शबिया फातिमा, डॉ. आतिफा जमाल, डॉ. सना अजहर, निकहत जहरा, जियाउल्लाह सिद्दीकी, मुहम्मद नियाजुल हक, हसीब उर रहमान, डॉ. अर्शी, अलमास अहमद अंसारी, मुहम्मद दानिश मजीद, डॉ. मुहम्मद रेहान, मुहम्मद शोएब आदि शामिल रहे। इस सेमिनार का पहला कार्यक्रम 16 मई को चर्याकोट, आजमगढ़ जिले में हुआ था। ईश्वर की इच्छा से यह सिलसिला लंबे समय तक जारी रहेगा।



