आत्म शुद्धि पर्व : नवरात्र

एस. वी. सिंह “प्रहरी
ऊर्जा संसार के कण-कण में व्याप्त है परंतु वह अदृश्य है। आदिशक्ति के इस ऊर्जा रूपी अंश को नष्ट करना असंभव है। इसको केवल चेतन अर्थात पुरुष तत्व रूपी ज्ञान के माध्यम से किसी स्वरूप में परिवर्तित किया जा सकता है। सर्वशक्तिमान होने के बावजूद अदृश्य रहकर मायावी होकर आवश्यकतानुसार किसी भी रूप में परिवर्तित होकर यह ऊर्जा शक्ति निरंतर संसार के सृजन की भागीदार बनती रहती है इसीलिए इस ऊर्जा शक्ति को माता आदिशक्ति कहा गया है।
संसार की उत्पत्ति परम शक्ति की इच्छानुसार हुई जिन्होंने संसार के सृजन के लिए अपने संपूर्ण अंश (पुरुष एवं प्रकृति) में से प्रकृति के अंश को अलग किया। पुरुष तत्व चेतन अंश है, जिसे संसार में ज्ञान कहा जाता है तथा प्रकृति तत्व ऊर्जा का अंश है, यही ज्ञान एवं ऊर्जा अंश मिलकर संसार में सृजनन एवं संचालन का कार्य करते रहते हैं। त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश में से ब्रह्मा को सृजन कर्ता, विष्णु को संचालन एवं पालनकर्ता और महेश को संहारक देव के रूप में हम सभी जानते हैं। पुराणों में इस बात का उल्लेख है कि जिस समय असुरों का साम्राज्य बढ़ा तो तीनों देवों ने अपनी-अपनी शक्तियों के समिश्रण से एक सर्वशक्तिमान परमशक्ति का सृजन किया जिसे माता दुर्गा कहा जाता है माता सरस्वती सत्गुणी ऊर्जा शक्ति हैं जो कि भगवान ब्रह्मा देव की शक्ति हैं। माता लक्ष्मी रजोगुणी ऊर्जा शक्ति हैं जो कि जो भगवान विष्णु जी की शक्ति हैं तथा माता पार्वती तपोगुणी ऊर्जा शक्ति हैं जो कि देवों के देव भगवान महादेव की शक्ति है। संसार के प्रत्येक जीव अथवा वस्तु में इन तीनों गुणों की ऊर्जा सदैव विद्यमान रहती है परंतु संसार में संतुलन स्थापित रहता है। परंतु समस्त योगियों में श्रेष्ठ मनुष्य योनि में चेतना का पूर्ण विकास होता है इसीलिए वह सदैव अपने इंद्रियों को गतिमान अथवा स्थिर रखना चाहता है परन्तु विभिन्न प्रकार के खान-पान रहन-सहन को आत्मसात करते हुए विभिन्न वातावरण के निरंतर आवागमन करते रहने के कारण उसके अंदर विद्यमान त्रिगुणों में असंतुलन व्याप्त हो जाता है। हालांकि मनुष्य योगदान और अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करके निरंतर संयम और धर्म का पालन करते हुए अपने गुणों को मूल आचरण के मुताबिक संतुलित कर सकता है परंतु मनुष्य के भीतर व्याप्त भौतिकता एवं इच्छाओं की आसक्ति उसे सदैव अपने आप से दूर कर वाह्य आडंबर की ओर ले जाती है। इन्हीं असंतुलित ऊर्जाओं को संतुलित करने के लिए वर्ष में चार नवरात्र पर्व होते हैं जिनमें से गृहस्थ आश्रम के व्यक्ति दो नवरात्रि पर्व ही मनाते हैं।
नवरात्रि के 9 दिनों में तीन-तीन दिनों के तीन चरण होते हैं। प्रथम तीन दिवस में माता दुर्गा में तमस् ऊर्जा रूपी माता काली, जो कि वीरता एवं आत्मविश्वास की प्रतीक है, की पूजा का विधान है। अगले तीन दिवस में रजत ऊर्जा रूपी माता लक्ष्मी जी, जो धनधान्य एवं भौतिकता का प्रतीक है, की पूजा का विधान है तथा अंतिम तीन दिवस में सत्व ऊर्जा रूपी ज्ञान की देवी माता सरस्वती की पूजा का विधान है।
माता दुर्गा के बारे में पुराणों में कहा गया है कि उन्होंने मधु कैटभ, महिषासुर जैसे तमाम असुरों का वध किया है। यहां पर आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह जानने की आवश्यकता है कि आखिरकार यह असुर कौन है जिसका वध माता आदि शक्ति को करना पड़ा ? इसका उत्तर है कि जो अपने सुर-अर्थात अपने होश में ना हो अर्थात जो अपना आपा खो दे वही असुर है, कई बार जब हमारा आचरण हमारे नियंत्रण में नहीं रहता है तो हमारा आचरण आसुरी प्रवृत्ति वाला हो जाता है। हमारे रक्त में समाई हुई वासना एवं नकारात्मकता को रक्तबीज नामक असुर कहा जाता है, जो हमारे बिगड़े हुए राग हैं उसे मधु नामक असुर कहा गया है तथा हमारे अंदर व्याप्त द्वेष नामक नकारात्मकता को कैटभ नामक राक्षस कहा गया है और जो हमारे जड़त्व में जो नकारात्मकता है उसे महिषासुर नामक असुर कहा गया है। पुराणों में शुंभ और निशुंभ के बारे में उल्लेख किया गया है जिसमें से शुंभ का अर्थ है स्वयं पर संशय करना तथा निशुंभ का अर्थ है अपने आसपास सभी पर संशय करना। जब हम आत्मा एवं प्राण रूपी नवरात्रि पर्व में अपने मन कर्म और वचन से माता दुर्गा का आवाहन करते हैं तो हमारे अंदर विद्यमान असुर रूपी नकारात्मक ऊर्जा का नाश करके हमारी त्रिगुणी ऊर्जाओं में संतुलन स्थापित करके हमको हमारे मूल में स्थापित कर देती हैं, साथ ही माता दुर्गा अपनी शक्तियों से हमारे अंदर विद्यमान नकारात्मक संशय को दूर कर हमारी बुद्धि को शुद्धि प्रदान करती हैं।
किसी भी उपासना में उपवास, जप-तप, प्रार्थना मौन और योग-ध्यान का उल्लेख होता है जिसमें उपवास मनुष्य के अंदर खान-पान से उत्पन्न हुए दोषों में संतुलन स्थापित कर शरीर को पवित्र करता है, जप-तप और प्रार्थना से मनुष्य की सूक्ष्म इंद्रियां जो कि विकार उत्पन्न करने के कारण दूषित हो जाती हैं, स्वच्छ होती हैं और उनमें संतुलन स्थापित होता है, मौन मनुष्य के वाणी दोषों को दूर कर उसमें पवित्रता उत्पन्न करता है तथा योग-ध्यान से मनुष्य के बेचैन मन को शांति प्राप्त होती है। जब मनुष्य के अंदर शांति का वास होता है तो उसके अंदर सकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं और इन्हीं सकारात्मक भाव की ऊर्जा से वह सृजनात्मक एवं उत्पादक कार्य करने में सक्षम होता है। नवरात्रि उत्सव के दौरान देवी दुर्गा के नौ विभिन्न रूपों की आराधना होती है जिसका संस्कृति में वर्णन इस प्रकार है–
प्रथम शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी, तृतीयं चंद्रघंटेति कुष्माडेति चतुर्थकम्।।
पंचम स्कंदमातेति षष्ठं कात्यायनीति च, सप्तम कालरात्रीति महागौरीति चास्टमम्।।
नवम् सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:, उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना: ।।
अर्थात प्रथम दिवस में माता शैलपुत्री द्वितीय दिवस में माता ब्रह्मचारिणी, तृतीय दिवस में माता चंद्रघंटा, चतुर्थ दिवस में माता कुष्मांडा, पंचम दिवस में माता स्कंदमाता, षष्टम दिवस में माता कात्यायनी, सप्तम दिवस में माता कालरात्रि, अष्टम दिवस में माता महागौरीति तथा नवम दिवस में माता सिद्धिदात्री जी की आराधना से देवी माता स्वयं को सभी रूपों में प्रत्यक्ष करती हैं और अपनी शक्तियों से साधक को आशीर्वाद प्रदान करती हैं।



