डिजिटल क्रांति ने मानव जीवन को सर्वाधिक प्रभावित किया है : प्रोफेसर सुमन
डिजिटल जगत में भारतीय भाषाओं की संभावनाओं और चुनौतियों पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

नई दिल्ली : डिजिटल युग में भारतीय भाषाओं की बदलती भूमिका, नई संभावनाओं और समकालीन चुनौतियों पर गंभीर विमर्श के उद्देश्य से दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड कॉमर्स, दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्वावधान में “ डिजिटल जगत में भारतीय भाषाएँ : नूतन विमर्श का निर्माण ” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और संस्थानों से जुड़े शिक्षाविदों, भाषा विशेषज्ञों, मीडिया अध्येताओं और विद्वान शामिल हुए । इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में लगभग 270 प्रतिभागियों ने पंजीकरण कर भाग लिया, और तकनीकी व शोध आलेख प्रस्तुतिकरण में पत्रकारिता को नए सिरे से कैसे समझा जाए उसकी जानकारी दी गई ।
संगोष्ठी के प्रथम दिन उद्घाटन सत्र में आचार्य श्रीकांत पाण्डेय, कार्यवाहक प्राचार्य, दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड कॉमर्स ने स्वागत उद्बोधन दिया। मुख्य अतिथि डॉ. उमाशंकर पचौरी, सूचना आयुक्त, राज्य सूचना आयोग, मध्य प्रदेश ने अपने संबोधन में भारतीय भाषाओं की समकालीन प्रासंगिकता पर विचार रखे। उन्होंने कहा की भारतीय भाषाओं में शब्दों का विशिष्ठ रूप होते है। उन्होंने शब्दों के उच्चारण के माध्यम से समझाया कि भारतीय गणना के माध्यम से कैसे हमारी परिवरिश को निखारा जा सकता है। विशिष्ट अतिथियों के रूप में आचार्य रजनी अब्बी, निदेशक, दक्षिणी परिसर, दिल्ली विश्वविद्यालय; आचार्य गजेन्द्र सिंह, अध्यक्ष, शासी निकाय, डीसीएसी; तथा डॉ. वी. एम. सुब्रमण्य शर्मा, सहायक आचार्य, भाषा-विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय ने सहभागिता की। उद्घाटन सत्र का विषय डिजिटल मानविकी एवं भारतीय भाषाएँ रहा।
प्रथम सामूहिक सत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा और स्वदेशी भाषा दृष्टि विषय पर विचार विमर्श हुआ। इसमें श्री अतुल कोठारी ने बीज वक्तव्य दिया तथा आचार्य दर्शन पाण्डेय, प्राचार्य, राजधानी कॉलेज ने अध्यक्षीय उद्बोधन प्रस्तुत किया। इसके बाद “अनुवाद, स्थानीयकरण एवं बहुभाषिक प्रौद्योगिकियाँ ” विषय पर आयोजित द्वितीय सामूहिक सत्र में आचार्य गिरीश नाथ झा, संस्कृत विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने बीज वक्तव्य दिया और आचार्य बिजेन्द्र कुमार ने अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। प्रथम दिवस के तकनीकी सत्रों में डिजिटल मानविकी, भारतीय भाषाएँ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं भाषा प्रौद्योगिकी, तथा सामाजिक माध्यम, डिजिटल संचार, नूतन विमर्श, डिजिटल मुद्रण एवं ज्ञान-पारिस्थितिकी जैसे विषयों पर शोधपरक चर्चा हुई। इन सत्रों की अध्यक्षता क्रमशः डॉ. वेद प्रकाश वत्स, किरोड़ीमल कॉलेज तथा डॉ. मोनिका राठौर, दिल्ली विश्वविद्यालय ने की।
संगोष्ठी के दूसरे दिन तकनीकी सत्रों की शुरुआत अनुवाद, स्थानीयकरण, बहुभाषिक प्रौद्योगिकियाँ, अंग्रेजी, भारतीय भाषाएँ और डिजिटल सार्वजनिक वृत्त जैसे विषयों के साथ हुई। संगोष्ठी की तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. संतोष पटेल, राजभाषा अधिकारी, दिल्ली उद्यमिता एवं कौशल विश्वविद्यालय ने की। इस सत्र में अन्य विश्वविद्यालयों से आमंत्रित शोधार्थियों ने शोध पत्र प्रस्तुत किया। दूसरे तकनीकी सत्र में भाषा-शिक्षण, शिक्षाशास्त्र, तकनीकी नवाचार तथा डिजिटल युग में भारतीय भाषाओं के भविष्य पर विचार-विमर्श हुआ, जिसकी अध्यक्षता डॉ. ललित पाण्डेय, किरोड़ीमल महाविद्यालय ने की। द्वितीय दिवस के सामूहिक सत्र में “ अंग्रेजी, भारतीय भाषाएँ और डिजिटल सार्वजनिक वृत्त ” विषय पर डॉ. साकेत बहुगुणा, केंद्रीय हिंदी संस्थान, शिक्षा मंत्रालय ने बीज वक्तव्य दिया, जबकि डॉ. रचना शर्मा, अध्यक्ष, मीडिया एवं संचार अनुसंधान केंद्र एवं पाठ्यक्रम निदेशक, हिंदी पत्रकारिता, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली ने अध्यक्षीय उद्बोधन प्रस्तुत किया। “ सामाजिक माध्यम, डिजिटल संचार एवं नूतन विमर्श ” विषय पर आयोजित एक अन्य सामूहिक सत्र में आचार्य गोविन्द सिंह, मीडिया सलाहकार, मुख्यमंत्री, उत्तराखंड ने बीज वक्तव्य दिया तथा आचार्य वीरेंद्र भारद्वाज, प्राचार्य, शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ने अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। संगोष्ठी में “ डिजिटल मुद्रण एवं ज्ञान-पारिस्थितिकी ” विषय पर भी विशेष सामूहिक सत्र आयोजित किया गया। इसमें आचार्य वी. एस. नेगी, भूगोल विभाग, शहीद भगत सिंह कॉलेज (सांध्य) तथा प्रोफेसर हंसराज सुमन, हिंदी विभाग, श्री अरविंदो कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने विचार रखे। सत्र की अध्यक्षता आचार्य संध्या वात्स्यायन, हिंदी विभाग, अदिति महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय ने की।
बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रोफेसर हंसराज सुमन ने कहा कि आज डिजिटल क्रांति ने मानव जीवन को सर्वाधिक प्रभावित किया है , शिक्षा, स्वास्थ्य , प्रशासन , व्यापार , संचार, साहित्य और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में तकनीकी विकास के नए अवसरों को विकसित किया है । उन्होंने बताया कि इंटरेस्ट, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मोबाइल एप्लिकेशन और डिजिटल प्लेटफार्म आज सामाजिक जीवन के अभिन्न अंग बन चुके हैं । इस तरह से हुए बदलाव के बीच भारतीय भाषाओं की भूमिका केवल संचार के माध्यम तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि ज्ञान, संस्कृति, पहचान और सामाजिक विमर्श के निर्माण में अहम भूमिका अदा कर रही है । प्रोफेसर सुमन ने बताया कि डिजिटल जगत में भारतीय भाषाओं ने अनेक विमर्शों के निर्माण का माध्यम बन रही है , दलित विमर्श, स्त्री विमर्श , आदिवासी विमर्श , किन्नर विमर्श, पर्यावरण विमर्श, ग्रामीण जीवन प्रवासी अनुभव और सामाजिक न्याय जैसे विषय अब डिजिटल मंचों पर अधिक व्यापक रूप से चर्चा में आ रहे हैं ।
भारतीय भाषाओं को कम्प्यूटर पर लाने के लिए सरकार के विशेष प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि केंद्र सरकार का मकसद था कि देश के सभी क्षेत्रों में हिंदी भाषा एवं अहिंदी भाषी क्षेत्रों में प्रशासनिक कार्यों को लेकर संपर्क स्थापित किया जा सके । उन्होंने बताया कि भारत की 22 भारतीय भाषाओं को डिजिटलीकरण की प्रक्रिया में शामिल किया गया है और ये भाषाएं काम भी कर रही हैं । प्रोफेसर सुमन ने यह भी बताया कि डिजिटलीकरण की प्रक्रिया में सरकार ने एक महत्वपूर्ण कार्य किया है , वह छायाचित्र का अनुवाद किसी भाषा और उसकी लिपि का, किसी अन्य भाषा और लिपि में अनुवाद आ जाना । उन्होंने नये साहित्य और पत्रकारिता में आ रहे विमर्शों की भी चर्चा की।
दो दिवसीय संगोष्ठी का समापन “ डिजिटल युग में भारतीय भाषाओं का भविष्य ” विषय पर आयोजित समापन सत्र के साथ हुआ। संगोष्ठी के निष्कर्ष डॉ. अभिजीत सिंह ने प्रस्तुत किए। समापन सत्र के मुख्य अतिथि श्री अनिल गुप्ता, सनदी लेखाकार (सीए), दिल्ली रहे। विशिष्ट अतिथियों के रूप में आचार्य पायल मागो, निदेशक, कैंपस ऑफ ओपन लर्निंग, दिल्ली विश्वविद्यालय; प्रोफेसर अजय कुमार भागी, अध्यक्ष, एनडीटीएफ.; तथा श्रीमती भारती बी. गोरे, कोषाध्यक्ष, शासी निकाय, डीसीएसी उपस्थित रहे। समापन सत्र में प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र भी प्रदान किए गए तथा डॉ. राधेश्याम कलावत ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। वहीं संगोष्ठी की रिपोर्ट डॉ.अभिजीत सिंह ने प्रस्तुत की। दो दिनों तक चले इस राष्ट्रीय अकादमिक विमर्श में भारतीय भाषाओं के डिजिटल भविष्य, भाषा प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अनुवाद एवं स्थानीयकरण, डिजिटल सार्वजनिक वृत्त, सामाजिक माध्यम, ज्ञान-पारिस्थितिकी और भाषा-शिक्षण जैसे विविध पक्षों को केंद्र में रखा गया। संगोष्ठी ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि डिजिटल युग में भारतीय भाषाओं का प्रश्न केवल तकनीकी उपस्थिति का नहीं, बल्कि ज्ञान के सृजन, प्रसार और व्यापक सामाजिक संवाद में उनकी सक्रिय भागीदारी का भी है।



