ये जेन ज़ी-जेन ज़ी क्या है? : राजेंद्र शर्मा
राजनैतिक व्यंग्य-समागम

ये जेन-ज़ी, जेन-ज़ी क्या है? माने नौजवान हैं, अच्छी बात है। माने पढ़े-लिखे हैं, और अच्छी बात है। अपना दिमाग रखते हैं, यह भी बुरा नहीं है। किसी के कहने भर से कुछ नहीं मानते, किसी के कहने से कुछ नहीं करते, जो सही जंचे, वही करते हैं, यह सब तो अच्छा है। लेकिन, इसका मतलब यह थोड़े ही है कि अपनी संस्कृति-संस्कार, सब को भूलकर किसी की भी खिल्ली उड़ाने लग जाएंगे।
अब बताइए, इन्हीं के इस्तीफा दो, इस्तीफा दो की रट पकड़ने पर, धर्मेंद्र प्रधान जी ने इस्तीफा दिया। इन्हीं की और इन्हीं के भाई-बांधवों की सेवा करने के लिए जो पद संभाला था, उस पद से इस्तीफा दिया। इस्तीफा दिया कि इन्हीं के जरिए भारत-विरोधी षड्यंत्र आगे न बढ़ने पाएं और राष्ट्र विरोधी ताकतों के मंसूबे कहीं सफल न हो जाएं।
इनके एंटी-नेशनल आकाओं से लड़ने के लिए, भारत माता के चरणों में अपनी गद्दी का सिर काट कर चढ़ा दिया। पर राष्ट्र के लिए उनकी कुर्बानी का खुद सम्मान नहीं करना था, तो नहीं करते, पर ये तो भगवा पार्टी के सांसदों के संसद के दरवाजे पर प्रधान का सम्मान करने का भी मजाक उड़ा रहे हैं। और दलीलें तो ऐसी-ऐसी फालतू कि कुछ पूछो ही मत।

कह रहे हैं कि टोपी पहनाकर और शॉल ओढ़ाकर यह किस का सम्मान हो रहा है? 2024 के पेपर लीक के बाद, 2026 में पेपर लीक के रिपीट होने का सम्मान? सीबीएसई परीक्षा कॉपियों की जांच की धांधली का सम्मान? परीक्षा दर परीक्षा गड़बड़ी के अनोखे रिकार्ड का सम्मान? नीट की चोरी की वजह से 22 बच्चों के जान गंवाने का जश्न? किस बात का सम्मान? अगले ने अपनी गद्दी का सिर काटकर मां भारती के चरणों में चढ़ा दिया और ये हैं कि अगले को टोपी पहनाने पर हुज्जत कर रहे हैं — ऐसे नाशुक्रे हैं ये जेन ज़ी!
और ये धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगने पर ही रुक जाते, तब तो फिर भी इनकी एंटीनेशनलता को बच्चा समझ कर माफ किया जा सकता था। ये तो प्रधान जी के प्रात: आराध्य, देवतुल्य मोदी जी की भी खिल्ली उड़ाते हैं।
मोदी जी ने रातों में बारह-बारह बजे तक जागकर रीलें बनायीं और वह भी सेल्फी मोड में अकेले-अकेले। पता नहीं टेलीप्रॉम्प्टर भी साथ में था या नहीं। और इन्होंने न उम्र का ख्याल किया, ना उनकी फ्रेंडशिप कबूल की, उल्टे कैमरा एंगल, कैमरे से दूरी के खोट और निकालने लगे। उधर खुद, भीड़ में तो भीड़ में, अकेले-अकेले अपने सोशल मीडिया खातों में भी, अगले के ऐसे-ऐसे मीम बना रहे थे, ऐसे-ऐसे नारे उठा रहे थे, ऐसे-ऐसे कैरीकेचर बना रहे थे और ऐसे-ऐसे गाने बना रहे थे कि पूछो मत।
और हद्द तो यह हो गयी कि अगले अंग्रेजी में भिगो-भिगो के, शुद्ध देसी गालियां भी दे रहे थे और वह भी शाकाहारी गालियां ही नहीं, तरह-तरह की हिंदू सेनाओं के सेनापतियों की भारी-भारी गालियों की टक्कर की गालियां! हिंदू भक्ति में मुकाबला करने में इनकी नानी मरती है, पर हिंदू सैनिकों से गालियों में इनसे मुकाबला करा लो, ऐसे हैं ये जेन-ज़ी!
और ये जो जेन-ज़ी की कुर्बानियों के गीत गाए जा रहे हैं, ये सब राई का पहाड़ बनाने वाली बातें हैं। जून-जुलाई की तपती गर्मी में राजधानी में जंतर-मंतर पर आकर बैठ ही गए, तो क्या हो गया? ये रहते तो ज्यादा टैम इंटरनेट पर और अपने फोन में ही हैं। इन्हें कहां गर्मी, बारिश, तपिश, उमस कुछ भी महसूस होता है? इन्हें कहां टैम का पता चलता है — बैठ गए तो बैठे रह गए एक महीने।
रही बात भूख हड़ताल वगैरह की, तो इन्हें खाने का होश ही कहां रहता है? मांऐं ही पीछे पड़ी रहती हैं कि बेटा खा ले, कुछ तो खा ले ; तब बड़ा एहसान पटकते हुए दो-चार ग्रास खा लें, तो खा लें, वर्ना ये तो यूं भी हवा खाकर ही जिंदा रहते हैं। बीस-बाईस दिन की भूख हड़ताल तो इनके लिए कुछ भी नहीं है।
और रही पुलिस की मार के सामने भी डटे रहने की बात, किसी से नहीं डरने की बात, तो ये इस दुनिया को जानते ही कितना हैं, जो डरेंगे? पहले किसी जुलूस-वुलूस में गए नहीं, पुलिस की लाठी खाई नहीं, गोली चलती देखी नहीं, जेल की सूरत देखी नहीं। और तो और, जमकर पिटाई तक नहीं खाई, न मां-बाप से, न स्कूल में और न मोहल्ले-पड़ोस में। 20 जुलाई को जो हुआ, इन्हें शुरू में तो वीडियो गेम लगा होगा। बाद में फंस गए, तो करते भी तो क्या करते? मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। खुद तो शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी बन गए और बेचारे पुलिस वालों को जल्लाद के नाम से बदनाम कर दिया। अब जंतर-मंतर पर पैलेट गन चलने का शोर मचा रहे हैं, जबकि इन्हें पुलिस को थैंक यू कहना चाहिए, एके-47 नहीं चलाने के लिए। क्या सोचते हैं, एके-47 क्या सिर्फ बिहार के पुलिस वाले ही चलाना जानते हैं? शाह साहब के डाइरेक्ट कंट्रोल में, दिल्ली पुलिस को अपने बिहारी बिरादरों से कमजोर दिल का समझा है क्या?
रही पैलेट गन की बात तो, इन जेन-ज़ी वालों ने क्या समझा था कि पैलेट गन इस्राइल से चलकर कश्मीर तक आ सकती है, तो देश में आगे नहीं जाएगी और सिर्फ कश्मीर में ही रहेगी! कितने भोंदू हैं ये जेन-ज़ी वाले।
भगवाधारियों को इन जेन-ज़ी वालों को देशभक्ति सिखानी ही पड़ेगी। प्यार से सीखें तो प्यार से, नहीं तो मार से। वर्ना ये तो देश को बर्बाद ही कर देंगे। देश का भविष्य, देश का भविष्य सुन-सुनकर ये कुछ ज्यादा ही सिर चढ़ गए हैं। मोदी जी ने एक महीने जंतर-मंतर पर क्या बैठने दिया, इन्होंने तो सारी दुनिया में भारत का नाम ही खराब कर दिया। पुलिस की लाठी, पुलिस की आंसू गैस, पुलिस की गोली, सब सारी दुनिया को दिखा दिया और अमृत काल को, दुनिया वालों की नजरों में तानाशाही काल बना दिया। इनमें जरा भी देशभक्ति होती, तो क्या ये एक जरा से पेपर लीक को लेकर इतना भारी हंगामा खड़ा करते और वह भी यह जानते-समझते हुए कि इंटरनेट के इस जमाने में, गोदी मीडिया भी बहुत काम का नहीं रह गया है — बाकी दुनिया से कुछ भी छुपा नहीं रह पाता है। उल्टे कॉकरोच बनकर ये तो लंदन, न्यूयार्क वगैरह में भी प्रदर्शन करने के लिए सडक़ों पर निकल आए, भारत को बदनाम करने के लिए — ऐसे एंटीनेशनल हैं ये जेन-ज़ी।
और इनके हमदर्द — वो तो सब के सब सुर्खे हैं। उंगली पकड़ कर पहुंचा पकड़ रहे हैं ; प्रधान का इस्तीफा मिल गया, अब शाह जी का इस्तीफा मांग रहे हैं। इनका क्या है, कल मोदी जी का भी इस्तीफा मांगने लग जाएंगे। ऐसे-ऐसों की हिम्मत बढ़ा रहे हैं, ये जेन-ज़ी वाले।



