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समय के साथ बदला शोक सभाओं का स्वरूप

प्रो. हंसराज सुमन

शोकसभा संस्कृति का एक हिस्सा है। लगभग सभी धर्मों में शोकसभा का रिवाज़ है। शोकसभा कई तरह की हो सकती है। 1. वांछित उपलब्धि न होना, 2. कार्य संपन्न न होना, 3. कोई नुकसान हो जाना, 4. शारीरिक व्याधि होना, 5. शारीरिक और मानसिक क्षति होना, 6. सम्पत्ति का नुकसान होना, 7. इन सबमें बड़ा शोक मृत्यु शोक है। शोक-सभाओं का आकार और रूप भी अलग-अलग है। अर्थात् छोटे स्तर की शोकसभा और बड़े स्तर की शोकसभा। घर-गृहस्थी में शोकसभा, पारिवारिक और कुटुंब में शोकसभा, परिचितों, संबंधियों और बृहत सामाजिक स्तर पर शोकसभा। स्वाभाविक है कि शोकसभाएँ सान्त्वना और ढांढस बधाने के लिए की जाती है। क्षतिपूर्ति तो संभव नहीं होती है लेकिन आलंबन के दूसरे माध्यम मिल जाते हैं। संबंधियों और परिचितों के सुझाव और सहयोग से ही यह संभव हो पाता है, इसलिए शोकसभा में लोगों को आमंत्रित किया जाता है या फिर जानकारी मिलने पर लोग पहुंच जाते हैं।

मृत्यु पर शोकसभा का रूप भावुकता और संवेदना युक्त होता है। समय के साथ साथ रिश्तों में बदलाव आते गये, लोगों के व्यवहार में परिवर्तन हुआ और आपसी रिश्ते भी स्वार्थ से जुड़ते गये। ऐसे में मृत्यु पर लोगों की संवेदनाएँ भी बदलती गईं। आधुनिक युग में मृत्यु पर संवेदनाएँ भी औपचारिकता निभाने तक सीमित हो गईं। शहर और गाँव के वातावरण और समाज में बहुत अंतर है। ग्रामीण परिवेश में सामाजिकता का बंधन है जबकि शहर में सामाजिक बंधन में स्वतंत्रता है। गाँव और शहर की सहानुभूति और संवेदनाएँ भी अलग-अलग हैं। ग्रामीण परिवेश में लिहाज का ख्याल होता है। संपर्क टूटने और सामाजिक बहिष्कार का डर होता है इसलिए खुशी के मौके पर बेशक न जाएँ लेकिन शोक होने की खबर मिलने पर लोग जरूर जाते हैं।

आधुनिकता के आगोश में अब गाँव भी आने लगे हैं। औपचारिकता निभाने की प्रवृत्ति बढ़ गई है। किसी शोक में इच्छा से सहभागिता अब खत्म होने लगी है। नयी परंपरा बनने लगी है दिखावा बढ़ गया है। सिर्फ़ निर्वाह करना रह गया है। संवेदनाओं के स्थान पर सुझाव देने की स्थिति बढ़ गई है। कुछ स्थान पर यह धार्मिक दोहन का रूप भी ले चुकी है। मृत्यु भोज से पिंडदान तक सिर्फ दोहन होने लगा है, बेशक मृतक के परिजन आर्थिक रूप से संकट में आ जाएँ या मानसिक रूप से प्रताड़ित हो जाएँ, लेकिन धार्मिक रिवाज को निभाना जरूरी होता है । आज के समय में परंपरा से चली आ रही धार्मिक मान्यताएँ भी टूटने लगी हैं। शहरी परिवेश में तो बहुत कम रिवाजों का ख्याल रखा जाता है । क्योंकि समय अभाव के कारण लोग परंपरा का निर्वाह नहीं कर पाते, कुछ लोग तो तार्किक दृष्टि से भी परंपराओं को बेबुनियाद ठहरा देते हैं।

एक समय था जब गाँव में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर रिश्तेदार, सगे संबंधी या मृतक जहाँ कार्य करता था वहाँ से लोग तेरहवीं तक शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करने आते थे। तेरह दिनों तक घर में लोगों का आना जाना लगा रहता था। तेरहवीं या सत्रहवीं वाले दिन आसपास के लोग, सगे संबंधी और रिश्तेदार हवन के समय आकर शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करके चले जाते थे, लेकिन समय के साथ-साथ शोक सभाओं का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। आजकल महानगरों, शहरों और गाँवों में नव धनाढ्य वर्ग के बीच शोक सभाओं के आयोजन ने दिखावे का भदेस रूप ले लिया है। इसके लिए बड़े-बड़े टेंट लगाने, बड़ा मंडप सजाने, सफेद रंग के पर्दे, कालीन बिछाए जाते हैं। कहीं-कहीं तो शोक सभा को आयोजित करने के लिए होटल, बैंक्वेट हॉल या बड़े पार्क में शोकसभा का आयोजन किया जाता है। शोकसभा के आयोजन से पूर्व तरह-तरह के कार्ड छपवाए जाने लगे हैं। ऐसा लगता है कि यह शोकसभा न हो कर मानो कोई बड़ा उत्सव हो रहा हो। जिस तरह से शादी का आयोजन होता है ठीक उसी तरह से शोकसभा का आयोजन होने लगा है। इस प्रकार की शोक सभाओं में मृतक परिवार के प्रति शोक की भावना कम दिखाई देती है और दिखावा या प्रदर्शन की प्रवृत्ति ज्यादा होती है ? इन शोक सभाओं में यह भी देखने में आया है कि मृतक परिवार के लोग मृतक का बड़ा फोटो स्टेज के साथ सजाकर साथ में धूप, अगरबत्ती व बहुत से गुलाब के फूल रख देते हैं, शोकसभा में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति मृतक के फोटो पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धानुसार पैसे चढ़ाता है। शोकसभा के लिए एक निश्चित समय निर्धारित कर दिया जाता है। समयानुसार आयोजन शुरू किया जाता है। पंडित जी एक घंटे तक गरुड़ पुराण या परिवार की सहमति से अन्य किसी का पाठ करते हैं। इस पाठ के समय मृतक परिवार के लोग ऐसे सज-संवरकर बैठते हैं जैसे किसी विवाह, शादी में खूबसूरत परिधानों में सज-संवर कर जाते हैं।

आधुनिक नव धनाढ्य वर्ग में शोक-परिधानों की मॉडलिंग भी होने लगी है। उनके पहनावे से लगता ही नहीं कि परिवार में किसी की मृत्यु पर शोकसभा हो रही है, चेहरों पर दिखावटी शोक का भाव लिए हर एक आगंतुक का स्वागत किया जाता है। शोकसभा समाप्त होने के बाद स्वादिष्ट भोजन की पंक्ति ऐसे लगी होती है मानों मृतक से मुक्ति का सुख मिल गया हो। मृतक को तो कष्टों से मुक्ति मिल ही गई, परिजनों में भी मृतक से मुक्ति की संतुष्टि का भाव दिखने लगता है । शोकसभा के पश्चात् परिवार की वे लड़कियाँ जिनकी शादी हो चुकी है मृतक का परिवार उन्हें सम्मान स्वरूप मान देता है, उन लड़कियों के साथ जितनी भी महिलाएँ आती हैं उन सबको मान सम्मान किया किया जाता है।

महानगरों में होने वाली शोक सभाओं में समाज में अपनी प्रतिष्ठा दिखाने की प्रतिस्पर्धा लगी हुई है, शोक सभा में कितने लोग आएँ, वीआईपी, एमपी, एमएलए या अभिनेता या कोई लोकप्रिय नेता आया क्या ? इतना ही नहीं कितनी कारें, बड़ी गाड़ियाँ, अधिकारी, बड़ा नेता आया है तो उसकी खबर बन जाती है और कई दिनों तक खूब चर्चा होती है, फला व्यक्ति के यहाँ इतने लोग आए थे। यह परिवार की प्रतिस्पर्धा का भाव सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने की कोशिश है। मृतक परिवार के व्यक्ति की शोकसभा में आकर अपनी संवेदना व्यक्त कर चला जाता है लेकिन उसकी चर्चा गाँव, महानगर में लंबे समय तक होती है। वर्तमान में यह भी देखने में आया है कि धनाढ्य वर्गों को देखकर छोटे व मध्यमवर्गीय परिवार के लोग भी इस दिखावे की होड़ में आ जाते हैं। वे भी देखा देखी शोकसभा का वैसा ही आयोजन करने लगे हैं। तात्पर्य यह है शोकसभा का आयोजन मृतक परिवार पर विवाह शादी की भाँति आर्थिक बोझ बनता जा रहा है, शोकसभा पर आयोजित कार्यक्रम में यह आर्थिक बोझ उसे पूरा करने के लिए पैसे उधार लेकर भी पूरा करना पड़े तो वह करता है। वह सामाजिक प्रतिष्ठा को मजबूरी मानकर एक दूसरे के देखा देखी यह आयोजन करने पर मजबूर हो जाता है।

आजकल देखने में तो यह भी आया है कि शोकसभा के पश्चात अपनी हैसियत के अनुसार चाय, कॉफी, खाना, समोसा, बिस्किट, नमकीन, पकौड़े व बोतल बंद पानी जैसी चीजों का प्रबंध करते हैं। ऐसा लगता है कि यह शोकसभा का आयोजन नहीं है बल्कि कोई अन्य भव्य आयोजन हो रहा है। अधिकांश शोक सभाओं के आयोजन को देखकर लगता ही नहीं कि यह मृतक के प्रति शोक संवेदना व्यक्त की जा रही है बल्कि लोग शोकसभा में आते जरूर हैं लेकिन उन्हें देखकर कहीं से नहीं लगता कि वे मृतक परिवार के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करने आएं हैं ? क्योंकि इसका स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। इस बदलाव में कहीं न कहीं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया का प्रभाव पड़ा है। सोशल मीडिया, वॉट्सअप, स्टेट्स, फेसबुक पर शोक सभाओं के आयोजन के लिए रंगीन कार्ड छपवाएं जाते हैं, उन रंगीन कार्डों को देखकर ही अन्य लोग शोक सभा के कार्ड छपवातें हैं। सोशल मीडिया ने जब से लोगों के बीच अपनी दस्तक दी है तब से समाज में शोक सभाओं में बदलाव आया है । यह बदलाव शोक सभा को भी मनोरंजन में बदल देगा ऐसा कभी सोचा नहीं था ?

मेरा ऐसा मानना है कि यदि मृतक परिवार शोकसभा में भव्य आयोजन करने की बजाय उसे सादगी और बिना किसी आडम्बर के मनाए, किसी व्यक्ति की देखा देखी न करें, अपनी हैसियत और प्रतिष्ठा के हिसाब से शोकसभा पर खर्च करें। यदि संभव हो तो मृतक परिवार सामाजिक संस्थाओं को दान करें जहाँ वृद्धाश्रम, महिला आश्रम, नेत्रहीन बच्चों का छात्रावास, गरीब कन्याओं को विवाह शादी पर दान स्वरूप वस्त्र, बर्तन आदि भेंट करना चाहिए ताकि उस परिवार की मदद हो सकें। इसके अतिरिक्त ऐसे बच्चों की आर्थिक सहायता करें जो पारिवारिक रूप से कमजोर हैं, उनकी स्कूल फीस, ड्रेस और आर्थिक रूप से कुछ रुपये पैसे देकर मदद की जा सकती है। मेरा यह भी मानना है कि जाने वाला व्यक्ति तो चला गया, मृतक परिवार अपनी सामाजिक हैसियत को देखते हुए और समाज में सामाजिक बदलाव लाने के लिए शोक सभाओं में पैसा कम खर्च करें और ऐसे लोगों की मदद करें जो भविष्य में कुछ करके दिखाएँ और युवा पीढ़ी उनसे प्रेरणा ग्रहण करें। युवा पीढ़ी ही समाज में बदलाव ला सकती है बशर्त उन्हें अपने महापुरुषों का साहित्य, उनकी कहानियाँ व उनके द्वारा किए गए कार्यों से परिचित कराया जाए। शोक सभाओं में मृतक परिवार द्वारा किया जाने वाला खर्च बच्चों की शिक्षाओं पर लगाएँ, जब वे मानवतावादी साहित्य पढ़ेंगे तभी समाज में बदलाव आ सकता है।

 

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