
डॉ. गिरीश
संकटों से घिरी भाजपा और ध्रुवीकरण की राजनीति-
भारतीय जनता पार्टी नीत केन्द्र की एनडीए सरकार के बारे में यह भ्रम शायद ही किसी को हो कि वह जब जनता के ज्वलंत सवालों पर चारों ओर से घिर जाती है, तब विभाजन, नफरत, भयदोहन और दमन की राजनीति को अपना हथियार बनाती है। इस दिशा में उसका ताज़ा और सुविचारित कदम है कथित “असामान्य जनसांख्यिकीय बदलाव” पर एक कमेटी का गठन करना।
हम यह भूले नहीं हैं कि 2014 में केन्द्र में सत्ता में आने के बाद भाजपा जब भी संकटों में घिरी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को गहरा करने तथा देश के अल्पसंख्यक समुदाय तथा वंचित तबकों में भय पैदा करने को नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और मतदाता सूचियों में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसे फरेबी मुद्दों को लेकर सामने आ गयी।
“जनसांख्यिकीय चिंताओं” के नाम पर एनडीए सरकार एक बार फिर करोड़ों भारतीयों के नागरिक अधिकार छीनने पर उतारू है।
महँगाई, बेरोज़गारी और जनता का बढ़ता असंतोष-
अभी पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में अपने अनैतिक और असंवैधानिक हथकंडों से यद्यपि भाजपा ने तीन राज्यों—असम, पश्चिम बंगाल एवं पांडिचेरी पर कब्जा जमा लिया है, और पश्चिम बंगाल में उसे पहली बार कामयाबी मिली है। लेकिन इन राज्यों में जीत के बावजूद भी यदि भाजपा अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं है तो उसके कारण भी स्पष्ट हैं।
भाजपा की मजदूर विरोधी नीतियों के चलते आज मेहनतकश वर्ग स्वतःस्फूर्त तरीके से सड़कों पर उतर रहा है और भारी दमन का मुकाबला कर रहा है। खेती-बाड़ी की लागत के महंगे होने, फर्टिलाइजर की अनुपलब्धता और फसल की वाजिब कीमतें न मिल पाने से किसानों में भारी आक्रोश है। मनरेगा को खोखला कर देने से ग्रामीण मजदूरों में उबाल है। असंगठित मजदूर दरिद्रता के संकट से जूझ रहे हैं। डबल इंजन सरकारों द्वारा खड़ी की गयी अधिकार विहीनता उन्हें और भी लाचार बना रही है।
भयावह बेरोज़गारी, बार-बार पेपर लीक—परीक्षाओं के रद्दीकरण, सीबीएसई व अन्य परीक्षाओं के कुप्रबंधन, महंगी और दोहरी शिक्षा प्रणाली, रिक्त स्थानों को वर्षों तक खाली रखने और नियुक्तियों में भ्रष्टाचार ने युवाओं को अंतस्तल तक झकझोर दिया है। इस गुस्से की एक झलक इस बात से मिल जाती है कि व्यंग्यात्मक लहजे में सोशल मीडिया पर प्रकट हुई एक पार्टी के रातों-रात करोड़ों से अधिक फॉलोअर बन गये।
खाड़ी युद्ध को लेकर मोदी सरकार की अमेरिकी साम्राज्यवाद एवं जियोनवादी इजरायलपरस्त नीतियों ने भारत को एक अभूतपूर्व संकट में फंसा दिया है और पेट्रोलियम पदार्थों की महंगाई, इस महंगाई की वजह से छलांग लगा चुकी सार्वत्रिक महंगाई से आम आदमी ही नहीं मध्यम वर्ग भी त्राहि-त्राहि कर चुका है। ऐसे में औद्योगिक उत्पादन में आयी भारी गिरावट, रुपये की दिन प्रतिदिन गिरती कीमत तथा आर्थिक असमानता की निरंतर गहराती खाई ने बहुसंख्य लोगों के जीवन को दूभर बना दिया है।
‘जनसांख्यिकीय बदलाव’ का राजनीतिक नैरेटिव-
वर्तमान में जारी जनगणना में जाति के समावेश और उसके संभावित परिणामों से समाज में भारी उथल-पुथल संभावित है। मोदी सरकार उससे भी शंकित है। अतएव मोदी-शाह सत्ता प्रतिष्ठान ने फिर वही नुस्खा अपनाया और सर्वोच्च न्यायालय से वर्षों पूर्व सेवानिवृत्त हुए जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता में कथित “असामान्य जनसांख्यिकीय परिवर्तनों” की जांच के नाम पर उच्चस्तरीय समिति का गठन कर दिया।
इस समिति के गठन की पृष्ठभूमि तैयार करने को भी आजाद भारत के लिये सबसे पवित्र दिन—स्वतंत्रता दिवस को चुना गया। घृणा, विभाजन और उकसावे की चिर-परिचित शैली में 15 अगस्त 2025 को लाल किले की प्राचीर से दिये अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कथित जनसांख्यिकीय बदलाव को एक साजिश करार दिया।
आरएसएस/भाजपा की सुपरिचित लाइन को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि घुसपैठ के जरिये जनसांख्यिकी बदलने की सोची समझी साजिश चल रही है। नये संकट के बीज बोये जा रहे हैं। घुसपैठिये युवाओं की आजीविका छीन रहे हैं, बहनों बेटियों को निशाना बना रहे हैं, इसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। घुसपैठिये भोले-भाले आदिवासियों को गुमराह कर रहे हैं, उनकी जमीन हड़प रहे हैं। परंतु ध्यान रहे कि जनसांख्यिकीय बदलाव राष्ट्रीय सुरक्षा का संकट पैदा करते हैं।
प्रधानमंत्री द्वारा मनगढ़न्त तथ्यों पर आधारित उपर्युक्त कथनों से समाज के विभिन्न तबकों को एक दूसरे के खिलाफ भड़काने की जो कोशिश की गयी है, वह सरकार और उसके नियंताओं – भाजपा और आरएसएस की नीति और नीयत को पूरी तरह उजागर कर देती है।
फासीवादी राजनीति का ऐतिहासिक अनुभव-
इतिहास गवाह है कि फासीवादी और अतिराष्ट्रवादी ताकतों ने सत्ता प्राप्त करने तथा उसे स्थायी बनाने के लिए बार-बार “जनसांख्यिकीय खतरे”, “राष्ट्र की शुद्धता” और “आंतरिक दुश्मन” जैसे नारों का सहारा लिया है। जर्मनी में हिटलर ने यहूदियों और प्रवासियों को राष्ट्र के लिए खतरा बताकर नफ़रत की राजनीति को संगठित किया। इटली में मुसोलिनी ने राष्ट्रवाद और भय के वातावरण के माध्यम से लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया। अमेरिका में मैकार्थीवाद तथा बाद के दौर में प्रवासियों के विरुद्ध चलाये गये अभियानों में भी इसी प्रकार का भय पैदा किया गया। म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध और श्रीलंका में तमिलों के खिलाफ चलायी गयी राजनीति ने भी “जनसंख्या परिवर्तन” के प्रश्न को हथियार बनाया। इतिहास यह भी बताता है कि ऐसी राजनीति अंततः लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और सामाजिक सौहार्द के लिए गहरा खतरा सिद्ध होती है।
चुनावी राजनीति और नागरिकता पर हमला-
प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त 2025 को समिति गठन की घोषणा की थी, और केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 11 सितंबर 2025 को इस प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी थी। लेकिन उसकी घोषणा अब आकर की गयी है। पाँच राज्यों में हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों के सम्पन्न हो जाने के बाद। जिनमें से दो राज्य—असम और पश्चिम बंगाल सीमावर्ती राज्य हैं।
भाजपा का प्रचारतंत्र सीमावर्ती राज्यों में वर्षों से घुसपैठ का हौवा खड़ा करता रहा है और उसे चुनावी मुद्दा बनाता रहा है। कुछ खास वोटों को चुनाव प्रक्रिया से बाहर करने के उद्देश्य से ही सरकार ने चुनाव आयोग के माध्यम से मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण कराया, और अपने मकसद में कामयाब भी रही। अब सीमावर्ती राज्यों सहित रोजगार देने वाले अन्य राज्यों जहां आव्रजन अधिक है, वहां अपने विपरीत रहने वाले मतदाताओं को भाजपा नागरिकता से ही वंचित करने का कुप्रयास कर रही है। इस समिति के गठन को इस नजरिये से ही देखा जा रहा है।
लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों पर संकट-
हम स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहां नागरिकता संविधान द्वारा सुनिश्चित की गयी है, न कि धर्म, भाषा, जाति या राजनीतिक जरूरतों के आधार पर। अतएव अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों और वंचित तबकों को बार-बार “जनसांख्यिकीय खतरे” के रूप में प्रस्तुत करने के प्रयास पूरी तरह असंवैधानिक हैं। निश्चय ही यह आरएसएस/भाजपा द्वारा हिन्दू राष्ट्र बनाने की दिशा में उठाया गया एक और कदम है। अतएव यह देश, जिसमें धर्मनिरपेक्षता एक जीवनपद्धति का रूप लेचुकी है, ऐसे क़दमों को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकता।
समिति गठन के पीछे की राजनीतिक मंशा-
गठित समिति में अध्यक्ष के अलावा जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण, पूर्व आईएएस एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व प्रमुख सचिव दुर्गा शंकर मिश्रा, पूर्व आईपीएस एवं ‘पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो’ (बीपीआर एंड डी) के पूर्व प्रमुख बालाजी श्रीवास्तव एवं डॉ. शमिका रवि जो प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य भी हैं, सदस्य के रूप में नामित किये गये हैं। इसके सदस्य सचिव गृह मंत्रालय के विदेशी मामलों के सचिव होंगे। इनमें से अधिकांश लोग संघ परिवार के चहेते बताये जाते हैं।
समिति के चेयरपर्सन के रूप में चयनित जस्टिस नावलेकर 82 वर्षीय हैं। वे सर्वोच्च न्यायालय में चार वर्षीय कार्यकाल पूरा करके 2008 में सेवानिवृत्त हुए थे। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में वे उस दो सदस्यीय बेंच का हिस्सा थे जिसने 2001 में संसद भवन पर हुए हमले के केस में मोहम्मद अफजल गुरु को दी गयी फांसी की सजा को सही ठहराया था। संभवतः यही उनकी सबसे बड़ी क्वालिफिकेशन है। भाजपा सरकार का कलुषित मन्तव्य समिति के गठन में अपनाये गये इस सांप्रदायिक दृष्टिकोण से पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है।
समिति के गठन संबंधी अधिसूचना में कहा गया है कि यदि आवश्यकता पड़ी तो पैनल स्थानीय सरकारों, सुरक्षा एजेंसियों, सामाजिक संगठनों एवं अकादमिक संस्थानों और अन्य विशेषज्ञों व एजेंसियों से भी परामर्श कर सकता है। कोई भी समझ सकता है कि गृह मंत्रालय की मंशा के अनुकूल परिणाम देने के लिये किस किस की सेवायें ली जायेंगी।
आरएसएस-भाजपा की वैचारिक परियोजना-
अधिसूचना में कहा गया है कि समिति को एक साल के भीतर अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। जरूरी होने पर इसका कार्यकाल छह महीने और बढ़ाया जा सकता है। आखिर सरकार इतनी जल्दबाजी में क्यों है? क्या लोकसभा चुनावों से पहले वह विभाजन, नफरत और उत्पीड़न से भरे और लोगों की नागरिकता और मताधिकार से वंचित करने वाले इस जिन्न को बोतल के बाहर लाना चाहती है?
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि यह वही सरकार है जो जनगणना कराये जाने और महिला आरक्षण के सवालों को वर्षों से टालती रही है।
समिति का गठन आरएसएस और भाजपा के लंबे समय से चले आ रहे विचारधारात्मक और राजनीतिक स्वरों को औपचारिक बनाता है। जिनके बारे में दोनों ही अपने सरोकार लगातार जताते रहे हैं—मुख्यतौर पर अवैध घुसपैठ और खासतौर पर बांग्लादेश से घुसपैठ के जरिये एवं विभिन्न समुदायों के बीच प्रजनन दरों में अंतर से उत्पन्न कथित जनसांख्यिकीय बदलावों के बारे में।
लोकतांत्रिक प्रतिरोध की आवश्यकता-
जिस देश ने लगभग डेढ़ सौ सालों तक असंख्य बलिदानों से परिपूर्ण आजादी की लड़ाई लड़ी हो, और जिस देश की महान जनता 8 दशकों से विशाल लोकतंत्र को मजबूत बनाने में जुटी हो, वह देश कमजोर आबादी—खासकर अल्पसंख्यकों, प्रवासी मजदूरों, दलितों, आदिवासियों और गरीबों को लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करने के कुप्रयासों को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता। निश्चय ही भाजपा और उसकी सरकार के मंसूबों को विफल करना ही होगा।
इस हेतु सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक शक्तियों, प्रगतिशील सामाजिक संगठनों, नागरिक समाज और भारत की जनता को इन विभाजनकारी और निरंकुश कदमों के खिलाफ एकजुट हो कार्यवाहियों में उतरना होगा। यही समय की मांग है और परिस्थितियों का तकाजा भी है।


