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क्रिप्टो परिसंपत्तियाँ और टैक्स पारदर्शिता का नया दौर

नई दिल्ली में OECD के 18वें वैश्विक मंच की मेजबानी ऐसे समय हुई है, जब दुनिया क्रिप्टो परिसंपत्तियों को लेकर नई कर व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। वर्ष 2027 अब ज्यादा दूर नहीं है और कई देश राजनीतिक सहमति से आगे बढ़कर क्रिप्टो-एसेट रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क (CARF) को लागू करने की तैयारी में जुट गए हैं। इसके तहत देशों के बीच क्रिप्टो लेनदेन की जानकारी साझा की जाएगी, यानी अब क्रिप्टो भी वैश्विक टैक्स व्यवस्था के दायरे में पूरी तरह आएगा।

पिछले कुछ वर्षों में क्रिप्टो परिसंपत्तियों के तेजी से विस्तार ने सरकारों के सामने नई चुनौती खड़ी की हैं । यह लेनदेन पारंपरिक बैंकिंग प्रणाली और सीमाओं से परे संचालित होता है, जिससे टैक्स पारदर्शिता बनाए रखना मुश्किल हो गया था। इसी पृष्ठभूमि में CARF को तैयार किया गया, ताकि क्रिप्टो लेनदेन की जानकारी भी उसी तरह साझा हो सके, जैसे बैंक खातों की होती है।

CARF के तहत क्रिप्टो एक्सचेंज, ब्रोकर और प्लेटफॉर्म को रिपोर्टिंग इकाई माना गया है। इन्हें उपयोगकर्ताओं की पहचान, उनका टैक्स निवास और निर्दिष्ट लेनदेन का विवरण संबंधित टैक्स विभाग को देना होगा। इसके बाद यह जानकारी अन्य देशों के टैक्स विभागों से साझा की जाएगी। इसका केवल एक ही उद्देश्य है कि कोई भी कंपनी या व्यक्ति सीमा पार जाकर रिपोर्टिंग से बच न सके।

अब तक सत्तर से अधिक देश इस ढाँचे को लागू करने पर सहमत हो चुके हैं। इनमें अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे बड़े वित्तीय केंद्र भी शामिल हैं। कुछ वर्ष पहले तक जब क्रिप्टो को लेकर नियम स्पष्ट नहीं थे, तब इस तरह की वैश्विक सहमति की कल्पना भी मुश्किल थी।

हालांकि, सभी देशों में इसे लागू करने का तरीका एक जैसा नहीं है। ब्रिटेन ने CARF को स्पष्ट समय-सीमा और विस्तृत नियमों के साथ अपने टैक्स कानून में शामिल किया है। जर्मनी और अन्य यूरोपीय संघ देशों ने DAC8 के माध्यम से इसे लागू किया है, जिसमें सख्त निगरानी और दंड का प्रावधान है। इन देशों में इसे मौजूदा मजबूत कर व्यवस्था का विस्तार माना जा रहा है।

ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों ने CARF को न्यूनतम मानक मानते हुए अपने घरेलू नियम और कड़े किए हैं। उभरती अर्थव्यवस्थाओं में पूंजी के तेज प्रवाह और महंगाई जैसी चुनौतियों के बीच सख्त रिपोर्टिंग को वित्तीय स्थिरता से भी जोड़ा जा रहा है।

वहीं भारत और नाइजीरिया की स्थिति थोड़ी अलग है। दोनों देशों ने शुरू में क्रिप्टो परिसंपत्तियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन अब वे पूरी तरह विरोध की नीति से हट गए हैं। वे अब इस क्षेत्र पर सख्त निगरानी सुनिश्चित करने पर ध्यान दे रहे हैं, लेकिन इसे औपचारिक मान्यता देने को लेकर सतर्क बने हुए हैं।

भारत क्रिप्टो क्षेत्र पर कड़ी टैक्स नीति के जरिए निगरानी रखता है, जिसमें 1% टीडीएस और 30% का फ्लैट पूंजीगत लाभ कर शामिल है। केंद्रीय बजट 2026 में, भारत सरकार ने आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 509 के तहत क्रिप्टो-आस्ति रिपोर्टिंग व्यवस्था शुरू की (जो आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 285BAA के अनुरूप है), जो सेवा प्रदाताओं पर रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी डालती है।

नाइजीरिया भी प्रतिबंध से लाइसेंसिंग और कराधान की ओर बढ़ा है, जो ऐसी ही व्यावहारिक सोच दिखाता है। इन देशों के लिए, CARF को नीति का समर्थन करने के बजाय अनुपालन की मजबूरी के रूप में देखा जा सकता है।

अमेरिका का रुख कुछ अलग नजर आता है। उसने CARF को औपचारिक रूप से लागू नहीं किया, लेकिन अपने ब्रोकर नियमों के जरिए घरेलू स्तर पर उससे मिलते-जुलते प्रावधान लागू कर दिए हैं। ये प्रावधान CARF की भावना के अनुरूप हैं, पर साथ ही यह भी दर्शाते हैं कि अमेरिका वैश्विक मानकों को अपनी घरेलू जरूरतों और कानूनी ढांचे के अनुसार ढालकर अपनाता है।

स्पष्ट है कि CARF का उद्देश्य क्रिप्टो परिसंपत्तियों पर पारंपरिक प्रतिबंध लगाना नहीं है। इसका मूल लक्ष्य टैक्स विभागों की पहुंच को मजबूत करना है। डिजिटल वित्त के इस दौर में क्रिप्टो लेनदेन पर निगरानी अनिवार्य हो चुकी है। यह कहना सही नहीं होगा कि CARF से क्रिप्टो नवाचार पर रोक लग जाएगी, लेकिन इतना तय है कि अब क्रिप्टो को ‘अलग और स्वतंत्र क्षेत्र’ की तरह नहीं देखा जाएगा। इसे नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय ढांचे में शामिल किया जा रहा है। अब नीति निर्माताओं की जिम्मेदारी है कि वे इन वैश्विक मानकों को प्रभावी ढंग से लागू करें। डेटा की शुद्धता सुनिश्चित करना, गोपनीयता की रक्षा करना और देशों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना जरूरी होगा। उद्योग जगत के लिए भी संदेश स्पष्ट है—बाजार में हिस्सेदारी के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ेगी। नवाचार के साथ जवाबदेही निभानी होगी।

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