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छत्तीसगढ मे रतन सिस्टर्स का कथक

लखनऊ । छत्तीसगढ मे लखनऊ की युगल कथक नृत्यांगना रतन सिस्टर्स ने मचाया धमाल। मौका था अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस पर एकल नृत्य प्रस्तुत का इस अवसर पर छत्तीसगढ के खैरागढ मे कथक नृत्य की एकल प्रदर्शन हुआ। गुरू पंडित अर्जुन मिश्र और वर्तमान मे कथक गुरू सुरभि सिंह की शिष्याओ ईशा रतन, मिशा रतन , संगीता कश्यप ने अपनी कथक की एकल मंच प्रस्तुति दी। तबले पर साथ दिया लखनऊ घराने के पंडित विकास मिश्र ने , गायन और हारमोनियम पर जगजीत ने सहयोग किया ।इस अवसर पर महाराष्ट्र , झारखंड, मध्यप्रदेश के साथ स्थानीय प्रतिभागी भी शामिल हुए। इन्दिरा कला संगीत विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना खैरागढ़ रियासत के 24वें राजा विरेन्‍द्र बहादुर सिंह तथा रानी पद्मावती देवी द्वार संपादित करें.

 

 

कहा जाता है कि राजकुमारी को संगीत का शौक था। राजकुमार की बाल्याकाल में ही असमय मृत्‍यु के बाद राजा साहब और रानी साहिबा ने स्‍वर्गवासी राजकुमारी के शौक को शिक्षा का रूप देकर अमर कर दिया। प्रारंभ में इन्दिरा संगीत महाविद्यालय के नाम से इस संस्‍था का प्रारंभ महज़ दो कमरों के एक भवन में किया गया, जिसमें 4-6 विद्यार्थी एवं तीन गुरु हुआ करते थे। इस संस्‍था के बढ़ते प्रभाव और लगातार छात्रों की वृद्धि से रानी साहिबा ने इसे अकादमी में बदलने का निर्णय लिया और फिर यह संस्‍था इन्दिरा संगीत अकादमी के नाम से जानी जाने लगी। साथ ही एक बड़े भवन की भी व्‍यवस्‍था की गई जिसमें कमरों की संख्‍या ज्‍यादा थी। समय के साथ धीरे धीरे संगीत के इस मंदिर का प्रभाव और बढ़ता गया।

इसी बीच राजा साहब व रानी साहिबा मध्‍य प्रदेश राज्‍य के मंत्री बनाये गये। तब उन्‍होंने इसे विश्‍वविद्यालय के रूप में स्‍थापित किये जाने का प्रस्‍ताव तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री पं.रवि शंकर शुक्‍ल के समक्ष रखा, जिसे उन्‍होंने स्‍वीकार कर लिया और समस्‍त औपचारिकताओं के पश्‍चात् राजकुमारी इन्दिरा के जन्‍म दिवस 14 अक्‍टूबर 1956 को इन्दिरा कला संगीत विश्‍वविद्यालय की विधिवत् स्‍थापना कर दी गई। इसका उद्घाटन प्रियदर्शिनी इन्दिरा गांधी जी द्वारा स्‍वयं खैरागढ़ आकर किया गया और विश्‍वविद्यालय के प्रथम कुलपति के रूप में श्री कृष्णक नारायण रातन्जनकर जी नियुक्त किये गये।

ललित कला के क्षेत्र में यह एक अनोखा प्रयास था। इस विश्‍वविद्यालय हेतु राजा साहब व रानी साहिबा ने अपना महल ‘कमल विलास पैलेस’ दान कर दिया। यह विश्‍वविद्यालय आज भी इसी भवन से संचालित हो रहा है। यहां ललित कलाओं के अंतर्गत गायन, वादन, नृत्‍य, नाट्य तथा दृश्‍य कलाओ की विधिवत् शिक्षा दी जाती है। इनके अतिरिक्‍त हिन्‍दी साहित्‍य, अंग्रेजी साहित्‍य और संस्‍कृत साहित्‍य विषय भी अध्‍ययन हेतु उपलब्‍ध हैं। प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्‍क़ति एवं पुरातत्‍व विभाग भी इस विश्‍वविद्यालय का एक महत्‍वपूर्ण विभाग है, साथ ही साथ एक संग्रहालय जिसमें विभिन्‍न कालों की मूर्तियां तथा सिक्‍कों का संग्रहण कर प्रदर्शनार्थ रखा गया है।

यहाँ आने वाले छात्रों में भारत के विभिन्‍न प्रदेशों के अतिरिक्‍त अन्‍य देशों जैसे श्रीलंका, थाईलैण्‍ड, अफगानिस्‍तान आदि से भी छात्र बड़ी संख्‍या में संगीत की शिक्षा ग्रहण करने प्रतिवर्ष आते हैं। साथ ही समय-समय पर विश्‍वविद्यालय द्वारा राष्‍ट्रीय व अंतर्राष्‍ट्रीय सेमीनार, वर्क शॉप, सांस्‍कृतिक कार्यक्रम आदि का आयोजन संस्‍क़ति मंत्रालय के सहयोग से किये जाते रहे हैं जिसमें देश व विदेश के ख्‍याति‍लब्‍ध कलाकार, विद्वान, विषय विशेषज्ञ व संगीताचार्य अपने वक्‍तव्‍य एवं संगीत से संबंधित ज्ञान विश्‍वविद्यालयीन विद्यार्थियों के साथ साझा करते हैं।

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