उत्तर-प्रदेशनई दिल्लीबड़ी खबरलखनऊ

नवाचार का असमंजस और कला : “न्यू मीडिया आर्ट का उद्देश्य दर्शक से संवाद : सुमन सिंह 

लखनऊ :  कला में प्रयोग और नवाचार आवश्यक समझा जाता है, तो साथ ही परंपरा का निर्वहन भी इसका एक महत्वपूर्ण पक्ष है। ऐसे में अक्सर किसी नवाचार की स्थिति में असमंजस या कहें कि उसकी स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता की बहस सामने आ जाती है। देखा जाता है कि रूढ़िवादी लोग ज्यादातर मामलों में किसी भी नवाचार के विरोध में ही नजर आते हैं। आज से लगभग तीन चार दशक पहले जब एक्रेलिक कलर बाजार में आया तब उसे लेकर यही असमंजस सामने था। क्योंकि तब कैनवास पर चित्र रचना के लिए ऑयल कलर का प्रयोग प्रचलन में था। तब ज्यादातर कलाकारों की पहली और आखिरी पसंद यही थी। किंतु देखते देखते उनके बाद की पीढ़ी ने इसी एक्रेलिक माध्यम को अपनी पहली पसंद बना ली। आज स्थिति यह है कि किसी भी प्रदर्शनी में आप जाइए तो पाएंगे कि वहां प्रदर्शित अधिकांश कृतियों एक्रेलिक माध्यम की ही होंगी। उससे भी पहले की बात करें तो फोटोग्राफी के आगमन के बाद दशकों तक यह बहस जारी रही कि फोटोग्राफी कला है या सिर्फ तकनीक। और अंततः कलात्मक फोटोग्राफी जैसे शब्द को मान्यता मिली और कला प्रदर्शनियों में छायाचित्र भी शामिल होने लगे।
यहां तक कि कला प्रदर्शनियों में पेंटिंग, छापाचित्र, रेखांकन और मूर्तिकला के साथ साथ फोटोग्राफी विधा में भी प्रविष्टियां स्वीकार्य हो गईं। वैसे छापा चित्रण से लेकर इंस्टॉलेशन और आर्ट परफॉर्मेंस तक को लेकर भी कुछ इसी तरह की कहानी दोहराई गई। बहरहाल यहां हम बात कर रहे हैं, एक ऐसे ही नवाचार की जो कल कला महाविद्यालय, लखनऊ में देखने को मिला।
उक्त बातें गुरुवार को कला एवं शिल्प महाविद्यालय में नई दिल्ली से आये वरिष्ठ कला समीक्षक सुमन सिंह ने कही। ज्ञातव्य हो कि कला महाविद्यालय में घर – इंटरैक्टिव इंस्टालेशन देखने के लिए कई कलाकार और आमजन उपस्थित हुए।
यह जानकारी देते हुए भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने कहा कि सुमन सिंह ने अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि यहां युवा प्राध्यापक अनिरुद्ध दिवाकर आचार्य अपने छात्रों की टीम के साथ एक इंटरेक्टिव आर्ट सेशन में व्यस्त थे। बचपन में क्रॉस वर्ड या रास्ता ढूंढो जैसी गुत्थी आपके सामने थी। जहां आपके सामने बैठा शख्स आपको बता रहा था कि किस अंक से आप शुरुआत करें और फिर क्रमवार कहां कहां जाएं। दरअसल अंकों के इस मकड़जाल के माध्यम से सामने वाले की कोशिश रहती है कि आप कुछ ऐसी जगह फंस जाएं, जहां से निकलने के लिए आपको रास्ता न मिले। इस दौरान आपका सामना प्रस्तोता या संचालक के चंद सवालों से भी होता रहता है। और अंत में आप इसमें सफल हों या असफल आपके सामने आड़ी तिरछी या सर्पिल रेखाओं से निर्मित एक संरचना या रेखांकन आपके सामने होता है। इस तरह से अनायास आप एक चित्र रच चुके होते हैं।
अनिरुद्ध आचार्य बताते हैं कि यह इंटरैक्टिव आर्ट इंस्टॉलेशन एक सहभागितापरक खेल/नाटक और परफ़ॉर्मेंस है, जिसका उद्देश्य “घर” की अवधारणा और उसके अर्थ की तलाश है। इसके तहत कला महाविद्यालय के छात्र/छात्राओं ने अत्यंत उत्साह के साथ लखनऊ की सड़कों पर घूमते हुए लगभग 400 लोगों से संवाद किया, जिनमें मजदूर, ठेला-विक्रेता, शिक्षक, कलाकार, बच्चे, गृहिणियाँ, ऑटोचालक और विद्यार्थी शामिल थे। इस खेल के प्रतिभागियों को उन रेखाओं की भूलभुलैया के भीतर अपना “घर” खोजना होता है, जिन्हें वे स्वयं कागज़ पर बनाते हैं। इस तरह से यह प्रक्रिया चित्रों के स्वचालित सृजन को संभव बनाती है। इस प्रक्रिया से सृजित चित्रों को 24 फ़रवरी को लखनऊ विश्वविद्यालय के कला एवं शिल्प महाविद्यालय में आयोजित प्रदर्शित किया गया। इस दौरान भी प्रदर्शनी देखने आये कलाकारों एवं कला प्रेमियों ने भी इसी प्रक्रिया से चित्र रचे I इस तरह से वे यहाँ मात्र दर्शक नहीं रहकर इस कला आयोजन के प्रतिभागी बन चुके थे या बन जाते हैं I
यह परियोजना जहाँ “घर” और प्रवासन की हमारी समझ के साथ आलोचनात्मक संवाद करती है। क्योंकि इसकी रचना के दौरान प्रस्तोता आपसे प्रवासन, आवागमन की स्वतंत्रता और स्वतंत्र इच्छा जैसे प्रश्नों पर आपकी प्रतिक्रिया या जवाब सामने लाता है I इस तरह से यह पूरी प्रक्रिया ‘कलाकार’ और ‘गैर-कलाकार’ के बीच के भेद को समाप्त करता है I यानि आपके सामने बैठा कलाकार किसी सामान्य व्यक्ति से कला कर्म करवा ले जाता है I दूसरी तरफ इसके जरिये कला के विद्यार्थियों को अपने परिसर से बाहर निकलकर वास्तविक सामाजिक संसार से जुड़ने का अवसर मिला।
इस प्रक्रिया की शुरुआत यूं तो सितंबर में ही हो गयी थी। और इसके तहत विचार साझा करने के साथ-साथ विभिन्न सामग्रियों के साथ प्रयोग किए गए। उसके बाद फिर से जनवरी में विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के बाद एक मुख्य टीम बनाई गई, जिसे यह प्रशिक्षण दिया गया कि लोगों से किस प्रकार संवाद करना है—मित्रवत व्यवहार करते हुए उनके साथ इस खेल को खेलना है। धीरे-धीरे एक महीने के अभ्यास से आज छात्र पूरी तरह प्रशिक्षित हो चुके हैं I
दरअसल में कला में न्यू मीडिया आर्ट की अवधारणा का मुख्य उद्देश्य दर्शक को कला प्रदर्शन से जोड़ना भी है I इसी क्रम में इंस्टालेशन से शुरू होकर अब यह ऑडियो-विडियो आर्ट के साथ-साथ आर्ट परफोर्मेंस तक पहुँच चूका है I वैसे बहुधा लोग आर्ट परफोर्मेंस को नाटक या अभिनय का पर्याय मान लेते हैं I किन्तु जहाँ नाटक में अभिनेता और दर्शक के बीच एक तयशुदा दूरी होती है, वहीँ आर्ट परफोर्मेंस की सार्थकता इसमें है कि यहाँ दर्शक भी उस प्रदर्शन का सहभागी बन चूका होता है जाने या अनजाने में I
इस आयोजन के लिए जो टीम बनायीं गयी थी उसकी संरचना एवं भागीदारी कुछ इस प्रकार रही I यहाँ प्रयुक्त वर्कशीट तैयार किया है ज्ञानेंद्र प्रताप शाह और कपिल शर्मा ने वहीँ कागजों के इस पुलिंदे के सार-संभाल का ज़िम्मा सरोज शिखा, अंशिका सिंह, तनु गौतम, ऋतु पाल, अक्षत सिंह, आस्था राय, आस्था पांडेय के हवाले था I प्रदर्शन की ज़िम्मेदारी निभाई अमीषा, शिवांगी, आनंद कुमार, उत्कल पांडेय, खुशी वर्मा, देवेश गुप्ता और नेहा मित्तल ने I तो प्रस्तोता की भूमिका या कहें कि प्रतिभागी से संवाद की ज़िम्मेदारी मयंक रस्तोगी, प्रकृति शाक्य, गार्गी भारतीया और सौरभ ने निभाई I

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button