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धर्मांतरण -उद्देशिका व मौलिक अधिकारों के अंतर्गत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के विरूद्ध : अनुपम मिश्रा

(ऐसी घटनाएं संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों के अंतरगत धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध होने के साथ देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा ख़तरा हो सकती है। )

लखनऊ: कानपुर, कौशांबी तथा जौनपुर में ईसाई मिशनरियों द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन कराए जाने की घटना पर राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय सचिव अनुपम मिश्रा ने जारी एक बयान में कहा कि धर्मांतरण की उपरोक्त तीनों घटनाओं से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि ‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम’ लागू होने के पश्चात भी ईसाई मिशनरियां कितनी सुनियोजित व गुपचुप तरीके से धर्मांतरण की घटनाओं को अंजाम देने में लगी है। ऐसी घटनाएं संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों के अंतरगत धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध होने के साथ देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा ख़तरा हो सकती है।

अनुपम मिश्रा ने कहा कि संविधान की उद्देशिका और मौलिक अधिकारों के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 25 – 28 तक के उपबंध धर्म और उपासना में न केवल समानता की प्रत्याभूति देते हैं बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को इस बात की स्वतंत्रता है कि वह अपनी इच्छा से किसी भी धर्म अथवा उपासना की पद्धति को अपना सकता है किंतु इसका अर्थ यह क़तई नहीं है कि लोगों को लालच या दबाव बनाकर उनका मतांतरण कराया जाए! स्टेनिसलास बनाम मध्य प्रदेश राज्य AIR- 1970 SC -908 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा करना आपराधिक कृत्य माना जाएगा ।
धर्मांतरण की घटनाएँ मूलत: शहर से दूरदराज़ के उन क्षेत्रों में अधिक हैं जहाँ लोग अशिक्षित व आर्थिक रूप से कमज़ोर है ऐसे लोगों को लालच और उनकी अज्ञानता का लाभ उठाकर उन्हें बरगलाकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए विवश किया जाता है।
अशिक्षित वह आर्थिक रूप से विपन्न लोग इनके प्रलोभनों में आकर धर्म परिवर्तन के लिए हामी भर देते हैं अतः सरकार को ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्यवाही करते हुए साथ ही इस विषय की गंभीरता को समझते हुए ऐसी संस्थाओं व व्यक्तियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई करनी चाहिए क्योंकि ऐसे धर्मांतरण से सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश पर इसका नकारात्मक असर पड़ता है।

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