मानसून बहुत दगाबाज है!

शिव शंकर गोस्वामी
दुनिया के 190 देशों में से आधे से अधिक देशों में जलवायु मानसूनी प्रकृति वाली है। यह प्रकृति बहुत धोखेबाज है। क्योंकि कहीं कहीं मानसून की अत्यधिक सक्रियता के कारण बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती हैं जिनमें धन जन की काफ़ी हानि होती है तो कहीं कहीं अवषर्ण के कारण सूखे की स्थिति पैदा हो जाती है जो दुर्भिक्ष एवं भुखमरी का कारण बनता है। भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जहाँ आज बाढ़ और जल प्लावन का तांडव है तो दूसरी तरफ बरसात ना होने से फसले बर्बाद हो रही है। इन दोनों परिस्थितियों में धन जन की काफी हानि होती है। यहाँ हम बताने की कोशिश करेंगे कि मानसून की उत्पत्ति कैसे होतीं हैं और यह हमारे लिए अभिशाप तथा वरदान दोनो कैसे है
दरअसल मानसून की उत्पत्ति का मूल स्थान हिन्द महासागर है। हिन्द महासागर का वह क्षेत्र जो भूमध्य रेखा के आसपास पड़ता है वही पर बारहों महीने चालीसा नाम की तेज हवायें पूरब से पश्चिम की ओर चलती रहती है। ऐसा पृथ्वी के घूर्णन के कारण होता है।
चूंकि पृथ्वी अपने अक्ष पर साढे़ तेइस अंश झुकीं हुईं हैं इसलिए हवायें भी समान रूप से एक ही अक्षांश पर नहीं चलती। उसका भी रास्ता जिग जैग होता रहता है। मौसम विज्ञानी फैरल का सिद्धान्त है कि पूरब से पश्चिम को चलने वाला यह चालीसा जब भूमध्य रेखा को पार करता है तो उत्तर गोलार्धो में यह अपने दाहिने तथा दक्षिण गीलार्ध में अपने बाएं मुड़ जाता है। बस यही से मानसून का जन्म होता है। भूमध्य रेखा के उत्तर में आपने दाहिने मुड़ने वाली हवायें जब भारतीय प्रायद्वीप से टकराती है तो दो भागों में बंट जाती है। एक भाग बंगाल की खाड़ी की ओर चला जाता है तो दूसरा भाग अरब सागर की ओर आ जाता है। अब इन दोनों भागों के तीन-तीन हिस्से हो जाते है। बंगाल की खाड़ी वाले का एक हिस्सा म्यांमार की ओर चला जाता है। दूसरा हिस्सा मेघालय त्रिपुरा और पूर्वोत्तर राज्यों में वर्षा करता है। हिमाचल की पूर्वी चोटियों को पार करने की ताकत तब तक इसकी समाप्त हो गयी होती है इसलिए बचे-खुचे बादल वही बरसते रहते हैं जो इन इलाकों में बाढ़ एवं तबही का कारण बनते हैं। असम व पूर्वोत्तर के राज्य हर साल इस त्रासदी को झेलते रहते हैं। अब बचती है तीसरी शाखा जो उत्तर की तरफ बढ़ना तो चाहतीं है लेकिन हिमाचल की चोटियां फिर इसके रास्ते में आ जाती है और ये हवायें पश्चिम की ओर मुडकर बिहार, उड़ीसा उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश में बरसते हुए दिल्ली हरियाणा बढ़ते हुए उत्तराखण्ड हिमाचल प्रदेश तक वर्षा करते हैं लेकिन यह मानसून ज्यों-ज्यों पूरब से पश्चिम की ओर बढ़ता है त्यो-त्यों कमज़ोर होने लगता है। लेकिन जब रब सागर वाला मानसून इससे मिलता है तो कच्छी बरसात होती है।
अब देखते हैं कि अरब सागर वाली शाखा क्या कमाल करती है। इस शाखा की भी तीन उप शाखायें हो जाती है। पहली शाखा केरल कोंकण राद घाट ,भोर घाट और पाल घाट में खूब वर्षा करतीं हैं जिसका फायदा वहाँ के चाय बागानों एवं मसाले की खेती को मिलता है लेकिन पश्चिमी घाट की पहाडि़यों के पूर्वी भाग में इसलिए बरसात नहीं हो पाती क्योंकि वह वृष्टि छाया प्रदेश में आये है। अरब सागर के मानसून की दूसरी शाखा महाराष्ट्र, गोवा, सौराष्ट्र, कच्छ गुजरात होते हुए राजस्थान को पार करके दिल्ली पंजाब हरियाणा होते हुए जम्मू कश्मीर की ओर बढ़ जाती है। राजस्थान के ऊपर से गुजरने के बावजूद यह मानसून वहाँ बरसात नहीं कर पाता है क्योंकि अरावली की समानांतर पहाडियां इन्हें रोक नहीं पाती। यही कारण है कि राजस्थान मरुस्थल का क्षेत्रफल बढ़ता जा रहा है और थार का मरुस्थल हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा मरुस्थल है। मगर कुछ वर्षों से राजस्थान में आश्चर्यजनक रूप से काफी बरसात हो रही है। इस शाखा का टकराव दिल्ली पंजाब के आसपास पूर्वी मानसून से होता है तो इन इलाकों में घनघोर वर्षों होतीं हैं। अरब सागर के मानसून की तीसरी शाखा फारस की खाड़ी की ओर मुड जाती है जो पाकिस्तान अफगानिस्तान एवं मुल्तान में जाकर वर्षा करतीं हैं। सवाल यह है कि मानसून के क्रिया-कलापों में इतनी अनिश्चितता क्यों रहतीं है तो बता दे कि इसके मूल में मुख्य कारण हमारा सूर्य है जो सम्पूर्ण सौर मंडल का मालिक है तथा जिसके चारों ओर इसके सभी नौ ग्रह चक्कर लगाते हैं। हमारी पृथ्वी उसी में से एक है जो 365 दिन में सूर्य का एक चक्कर पूरा करतीं हैं। उसके इसी चक्कर की वजह से ऋतु परिवर्तन होता है और यही मौसम में बदलाव का कारक बनता है। भारतवर्ष में तीन तरह के मौसम गर्मी, बरसात और जाड़ा छह तरह की ऋतुएँ होती है। लेकिन सभी मौसम और ऋतुओं में जाड़ा,गर्मी एवं बरसात में समानता नहीं रहती। यह सूरज के नेचर के आधार पर घटते बढ़ते रहते हैं। यही कारण है कि मानसून भी एक जैसा नहीं रहता और लोग इसे दगाबाज की संज्ञा देते हैं।


