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समझ क्या रखा है इन नोबेल शांति पुरस्कार वालों ने!

राजनैतिक व्यंग्य-समागम

विष्णु नागर

भारत- पाकिस्तान समेत सात युद्ध रुकवाने का दावा करनेवाले डोनाल्ड ट्रंप जी मात खा गए। कितनी ही बेचारे ने लाबिइंग की थी, नेतन्याहू टाइप कितने ही विश्व नेताओं से उसने सिफारिशें करवाई थीं, मगर उस गरीब को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला, तो नहीं ही मिला। सुबह उठकर उसे जो झटका लगा होगा, उसकी कल्पना ही की जा सकती है! हे राम, ये क्या हो गया, टाइप गम हुआ होगा!

अभी उसने झटपट गाजा पट्टी के लिए बीस सूत्रीय शांति योजना संपन्न करवाई थी कि इसके बाद तो कोई ताकत उसे रोक नहीं पाएगी। मोदी जी ने इस सफलता के लिए अपने ‘दोस्त ‘ ट्रंप को बधाई भी दी थी, मगर सब व्यर्थ गया। दिन-रात की ‘मेहनत’ भैंस की तरह पानी में गई और यह पुरस्कार ले गईं वेनेजुएला की मारिया कोरिना मकाओ! कोई बात है भला!

ये क्या हो रहा है दोस्तो। दिल्ली के लोक कल्याण मार्ग में भी इससे मायूसी छा गई होगी। बधाई पत्र का ड्राफ्ट बेकार चला गया वरना अपने ‘मित्र’ ट्रंप को बधाई देने वालों में मोदी जी सबसे आगे होते!

वैसे क्या भारत तथा ब्राजील पर पचास प्रतिशत टैरिफ लगाने के लिए कोई विश्व पुरस्कार देने की व्यवस्था नहीं है? अगर नहीं है, तो ट्रंप अपने अलग सोशल मीडिया एकाउंट की तरह नेतन्याहू स्पांसंर्ड शांति पुरस्कार शुरु करके उसे ले लेगा! समझ क्या रखा है इन नोबेल शांति पुरस्कार वालों ने!

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)

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