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टोकनयुक्त शेयर क्यों हैं क्रिप्टो की कहानी — और भारत को इस दिशा में क्या करना चाहिए

नई दिल्ली : दुनिया भर में शेयर खरीदने और बेचने का तरीका बदल रहा है। इस बदलाव की अगुवाई अब पारंपरिक शेयर बाजार नहीं, बल्कि क्रिप्टो मंच कर रहे हैं। पिछले एक वर्ष में रॉबिनहुड, क्रैकेन और बायबिट जैसे मंचों ने अमेरिका के बाहर के निवेशकों के लिए टोकनयुक्त अमेरिकी शेयर उपलब्ध कराने शुरू किए हैं।

टोकनयुक्त शेयर किसी सूचीबद्ध कंपनी के वास्तविक शेयर का डिजिटल स्वरूप होता है, जिसे ब्लॉकचेन पर एक टोकन के रूप में जारी किया जाता है। इसकी कीमत एप्पल, टेस्ला जैसी कंपनियों के वास्तविक शेयरों के बराबर होती है। प्रत्येक टोकन के बदले वास्तविक शेयर एक अधिकृत संरक्षक संस्था के पास सुरक्षित रखा जाता है। टोकन रखने वाले निवेशक को लाभांश सहित वही अधिकार मिलते हैं, जो सीधे शेयर रखने वाले निवेशक को प्राप्त होते हैं। फर्क केवल इतना है कि इनका संचालन पारंपरिक बैंकों की बंद प्रणालियों के बजाय सोलाना, एथेरियम और आर्बिट्रम जैसे खुले ब्लॉकचेन नेटवर्क पर होता है। यही एक फैसला इस पूरे मॉडल को कारगर बनाता है।

खुले ब्लॉकचेन मौजूदा शेयर बाजार की कई सीमाओं को समाप्त कर देते हैं। अब बाजार केवल एक्सचेंज के निर्धारित समय तक सीमित नहीं रहते और लेनदेन के निपटान के लिए अगले कारोबारी दिन तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता भी नहीं होती। निवेशक कुछ रुपये में भी किसी महंगे शेयर का छोटा हिस्सा खरीद सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि टोकनयुक्त शेयर प्रोग्राम योग्य वित्तीय परिसंपत्ति बन जाते हैं। उदाहरण के लिए, सोलाना पर मौजूद एप्पल के टोकन को गिरवी रखा जा सकता है, उसे किसी स्थिर मुद्रा से बदला जा सकता है या कुछ ही क्षणों में दूसरे देश भेजा जा सकता है। स्थिर मुद्रा ऐसी डिजिटल मुद्रा होती है, जिसका मूल्य अमेरिकी डॉलर जैसी किसी पारंपरिक मुद्रा से जुड़ा होता है। पारंपरिक शेयर बाजार इस स्तर की सुविधा और लचीलापन उपलब्ध नहीं कराता। स्टेबलकॉइन भुगतान प्रक्रिया को समान रूप से कुशल बनाते हैं।यही कारण है कि मुंबई, सिंगापुर या दुबई का कोई निवेशक अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने के लिए लंबी और जटिल अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग व्यवस्था पर निर्भर हुए बिना स्थिर मुद्रा के माध्यम से अमेरिकी टोकनयुक्त शेयर खरीद सकता है।

बाजार के आंकड़े बताते हैं कि इन उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। जून 2025 में क्रैकेन और बायबिट के माध्यम से सोलाना पर शुरू किए गए बैक्ड फाइनेंस के एक्सस्टॉक्स ने कुछ ही सप्ताह में 30 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक का कारोबार दर्ज किया। रॉबिनहुड का यूरोपीय मंच अब एथेरियम नेटवर्क पर 200 से अधिक टोकनयुक्त अमेरिकी शेयर और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड उपलब्ध करा रहा है। दुनिया की अग्रणी परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी ब्लैकरॉक ने भी अपने टोकनयुक्त अमेरिकी ट्रेजरी फंड बिल्ड के माध्यम से इस मॉडल को अपनाया, जिसकी प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियां 2025 में 2.5 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गईं। इससे स्पष्ट है कि ब्लॉकचेन आधारित वित्तीय ढांचे को केवल क्रिप्टो कंपनियां ही नहीं, बल्कि दुनिया की बड़ी वित्तीय संस्थाएं भी अपना रही हैं। इसके विपरीत, बैंकों द्वारा नियंत्रित निजी ब्लॉकचेन नेटवर्क अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सके, क्योंकि वे पारंपरिक वित्तीय व्यवस्था में कोई वास्तविक बदलाव नहीं ला पाए।

भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। वर्ष 2025 के मध्य में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद से जुड़े स्टार्टअप ज़ॉल्ट्स को अपने नियामकीय परीक्षण कार्यक्रम के तहत पायलट परियोजना की अनुमति दी। इसके तहत खुदरा निवेशक केवल 10 रुपये में रिलायंस इंडस्ट्रीज के आंशिक शेयर खरीद सकते हैं और उनके स्वामित्व का रिकॉर्ड वितरित लेखा प्रणाली के माध्यम से सुरक्षित रखा जाता है। अब इस परियोजना का विस्तार अन्य कंपनियों और रियल एस्टेट जैसी परिसंपत्तियों तक किया जा रहा है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि सेबी टोकनयुक्त प्रतिभूतियों को प्रयोग और नवाचार के लिए एक गंभीर क्षेत्र मानता है।

अब प्रश्न यह है कि क्या भारत को इस मॉडल को आगे बढ़ाते हुए खुले ब्लॉकचेन नेटवर्क, स्थिर मुद्राओं और देश के आभासी डिजिटल परिसंपत्ति मंचों का उपयोग भी करना चाहिए? इसके लाभ स्पष्ट हैं—चौबीसों घंटे खुले रहने वाले बाजार, लगभग तत्काल लेनदेन निपटान, बहुत कम राशि से निवेश की सुविधा और पूंजी का अधिक कुशल प्रवाह। भारत के आभासी डिजिटल परिसंपत्ति मंच पहले से ही वित्तीय खुफिया इकाई (FIU-IND) द्वारा निर्धारित केवाईसी और रिपोर्टिंग मानकों का पालन करते हैं, जिससे वे ऐसे उत्पादों के लिए भरोसेमंद माध्यम बन सकते हैं।

हालांकि क्रिप्टो परिसंपत्तियों को अभी तक सेबी या भारतीय रिजर्व बैंक से औपचारिक मान्यता नहीं मिली है, लेकिन दुनिया में हो रहे बदलावों को अब नजरअंदाज करना कठिन होता जा रहा है। वर्ष 2025 में जिन टोकनयुक्त शेयर मंचों को व्यापक स्वीकृति मिली, उन्होंने वितरण के लिए खुले ब्लॉकचेन नेटवर्क और क्रिप्टो एक्सचेंजों का ही उपयोग किया। यही तकनीकी आधार इस पूरे मॉडल को व्यावहारिक बनाता है।

दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (IFSCA) पहले ही वास्तविक परिसंपत्तियों के टोकनीकरण पर काम कर रहा है, जबकि भारत का आभासी डिजिटल परिसंपत्ति तंत्र बड़े पैमाने पर नियामकीय अनुपालन के साथ संचालित हो रहा है। यदि क्रिप्टो नेटवर्क को टोकनयुक्त प्रतिभूतियों के लिए केवल एक सक्षम तकनीकी आधार के रूप में देखा जाए, न कि अलग बहस के रूप में, तो भारत इस उभरते हुए वित्तीय क्षेत्र में अपनी मजबूत भूमिका बना सकता है। अन्यथा, वित्तीय नवाचार का अगला बड़ा दौर दुनिया के दूसरे देशों में आकार लेगा और भारत केवल उसका दर्शक बनकर रह जाएगा।

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