प्रशिक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी भारत के लिए बड़ी चुनौती: PHFI-IPHS के कार्यवाहक कुलपति

नई दिल्ली : भारत स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत बनाने और इस पर निवेश बढ़ाने की दिशा में लगातार काम कर रहा है। इसके बावजूद, देश के सामने एक ऐसी बड़ी चुनौती बनी हुई है जिस पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। भविष्य में आने वाले स्वास्थ्य संकटों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए भारत में प्रशिक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भारी कमी है। यह बात PHFI इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ साइंसेज (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) के कार्यवाहक कुलपति डॉ. एम. विष्णु वर्धन राव ने अपने लेख में कही है।
“इंडियाज़ नेक्स्ट हेल्थ क्राइसिस: इट इज़ नॉट अ डिज़ीज़, इट इज़ अ वर्कफोर्स गैप” शीर्षक वाले अपने लेख में डॉ. राव लिखते हैं कि भारत ने अस्पतालों और स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया है, लेकिन आज भी देश में ऐसे प्रशिक्षित विशेषज्ञों की भारी कमी है जो स्वास्थ्य संकटों को रोकने, उनका प्रबंधन करने और समय पर प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम हों।
कोविड-19 महामारी का जिक्र करते हुए डॉ. राव लिखते हैं कि भारत ने कम समय में अस्पतालों और क्रिटिकल केयर सुविधाओं का तेजी से विस्तार किया, लेकिन महामारी के दौरान एपिडेमियोलॉजिस्ट, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधकों, डेटा वैज्ञानिकों और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को पर्याप्त संख्या में जुटाना आसान नहीं था। उनका कहना है कि ऐसा कुशल कार्यबल तैयार करने के लिए वर्षों तक लगातार निवेश और सहयोग की जरूरत होती है।
डॉ. राव लिखते हैं कि इस वर्ष भारत का स्वास्थ्य बजट 1.06 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है, जो स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। लेकिन उनका कहना है कि केवल अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र बनाना ही पर्याप्त नहीं है। बेहतर नतीजे तभी मिलेंगे, जब प्रशिक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी उपलब्ध हों। ये विशेषज्ञ लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की योजना बनाते हैं, स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं, बीमारियों के फैलाव पर नजर रखते हैं और स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लेख में बताया गया है कि भारत में इस समय लगभग 45,000 योग्य सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी है। साथ ही, सार्वजनिक स्वास्थ्य शिक्षा का विस्तार चिकित्सा शिक्षा की तेज़ी से हुई वृद्धि के अनुरूप नहीं हो पाया है। डॉ. राव लिखते हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का उद्देश्य केवल बीमारी का इलाज करना नहीं है। इसका मकसद बीमारियों को फैलने से रोकना, टीकाकरण की बेहतर रणनीति तैयार करना, बीमारियों पर नजर रखने की व्यवस्था विकसित करना और ऐसी नीतियां बनाना है, जिनसे लोगों तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच सकें।
लेख में ‘वन हेल्थ’ (One Health) दृष्टिकोण के बढ़ते महत्व पर भी जोर दिया गया है। यह अवधारणा बताती है कि इंसानों, पशुओं और पर्यावरण का स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। डॉ. राव लिखते हैं कि कोविड-19 महामारी ने यह साफ कर दिया कि नई और उभरती बीमारियां पर्यावरण में होने वाले बदलावों से जुड़ी होती हैं। इसलिए इनसे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों को मिलकर काम करना होगा।
डॉ. राव आगे लिखते हैं कि डिजिटल हेल्थ तकनीकों, इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड, टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म और वियरेबल उपकरणों के तेजी से बढ़ते उपयोग के कारण ऐसे विशेषज्ञों की जरूरत लगातार बढ़ रही है, जो स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों को समझ सकें और उनका इस्तेमाल बेहतर नीति बनाने तथा बीमारियों पर नजर रखने में कर सकें।
लेख में डॉ. राव ने सार्वजनिक स्वास्थ्य कैडर विकसित करने के लिए राज्य सरकारों की हालिया पहलों और सार्वजनिक स्वास्थ्य शिक्षा तथा नीति निर्माण को मजबूत करने वाली साझेदारियों का स्वागत किया है। उनका कहना है कि ये सकारात्मक कदम हैं, लेकिन स्थायी बदलाव तभी आएगा, जब इनके लिए लंबे समय तक लगातार निवेश किया जाएगा।
लेख के अंत में डॉ. राव लिखते हैं, “महामारी ने हमें यह महंगा सबक दिया कि मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी कितनी भारी पड़ सकती है। अब हमारे सामने सवाल यह है कि क्या हम इसे केवल एक बार की आपदा मानकर भूल जाएंगे, या इसे एक सीख के रूप में स्वीकार कर भविष्य के लिए अधिक मजबूत और लचीली स्वास्थ्य व्यवस्था तैयार करेंगे।”



