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आरआईएस में हिंदी दिवस का आयोजन: ज्ञान, नीति और जनसंवाद की भाषा के रूप में हिंदी विषय पर हुआ व्याख्यान 

'आजादी के आंदोलन में पत्र - पत्रिकाओं का योगदान महत्त्वपूर्ण रहा है'

नई दिल्ली : विकासशील देशों के लिए अनुसंधान एवं सूचना प्रणाली (RIS) ने इंडिया हैबिटेट सेंटर में ज्ञान, नीति और जनसंवाद की भाषा के रूप में हिंदी विषय पर विविध गतिविधियों के साथ हिंदी दिवस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य हिंदी को केवल अभिव्यक्ति और संचार की भाषा के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान-सृजन, शोध, नीति-विमर्श और व्यापक जनसंवाद के एक सशक्त माध्यम के रूप में उसकी समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित करना था। कार्यक्रम का शुभारंभ आरआईएस (RIS )के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. पंकज वशिष्ठ के स्वागत वक्तव्य से हुआ। उन्होंने भारतीय संस्कृति, ज्ञान और बौद्धिक परंपराओं की संवाहक भाषा के रूप में हिंदी की समृद्ध विरासत पर प्रकाश डालते हुए कार्यक्रम की वैचारिक भूमिका प्रस्तुत की। उन्होंने अकादमिक और नीतिगत क्षेत्रों में हिंदी की भूमिका को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया तथा भारतीय भाषाओं के माध्यम से ज्ञान और विचारों को समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँचाने के महत्व को रेखांकित किया।

अपने विशेष संबोधन में डॉ. राजन सुदेश रत्न, मुख्य समन्वयक, DAKSHIN, RIS ने प्रतिभागियों को दैनिक जीवन के साथ-साथ कार्यालयीन कामकाज और संवाद में भी यथासंभव हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा की जीवंतता उसके नियमित और सार्थक प्रयोग से बढ़ती है। इस संदर्भ में उन्होंने व्यावसायिक और संस्थागत संवाद में हिंदी के प्रयोग को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

हिंदी दिवस के अवसर पर कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर हंसराज सुमन ने हिंदी की समृद्ध साहित्यिक और बौद्धिक विरासत पर अपने विचार रखे। उन्होंने कबीर, भारतेंदु हरिश्चंद्र और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जैसे महान साहित्यकारों के योगदान का उल्लेख करते हुए उनके साहित्य की चिरस्थायी प्रासंगिकता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इन साहित्यकारों का योगदान केवल हिंदी साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक विश्व साहित्य और मानवीय चिंतन में भी उनका महत्वपूर्ण स्थान है। उनके वक्तव्य ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि साहित्य भाषायी और भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर व्यापक सामाजिक और बौद्धिक चेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने बताया कि आजादी के आंदोलन में हिंदी के समाचार पत्रों व पत्रिकाओं के संपादकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है , इन समाचार पत्रों ने लोगों में राष्ट्रीय चेतना की भावना पैदा की । माखनलाल चतुर्वेदी , गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों ने भी आजादी के आंदोलन में अपना योगदान दिया है । उस समय की पत्रिकाओं में राष्ट्रीय सद्भावना के भाव को बढ़ावा देने के उद्देश्य से युवाओं में जोश भरने का काम किया है ।

कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण हिंदी दिवस विशेष प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता हिंदी ज्ञान-संगम रही, जिसने आयोजन को संवादपरक और सहभागितापूर्ण स्वरूप प्रदान किया। प्रतियोगिता में RIS के अधिकारियों और कर्मचारियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रश्नोत्तरी में हिंदी भाषा एवं साहित्य, भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान-परंपरा, समसामयिक विषयों तथा भारतीय कूटनीति से जुड़े प्रश्न शामिल किए गए। इस प्रकार प्रश्नोत्तरी ने हिंदी को ज्ञान, नीति और समकालीन विमर्श से जोड़ने वाले कार्यक्रम के व्यापक विषय को भी सार्थक रूप से अभिव्यक्त किया। हिंदी ज्ञान-संगम का संचालन डॉ. सारिन नम्बीशन शशिकुमार, समन्वयक, FITM ने किया। उन्होंने भाषा, साहित्य, संस्कृति और समसामयिक ज्ञान से जुड़े रोचक प्रश्नों के माध्यम से प्रतिभागियों को सक्रिय रूप से जोड़े रखा। प्रतिभागियों के उत्साह और सक्रिय सहभागिता ने प्रश्नोत्तरी को ज्ञान, सीखने और सामूहिक भागीदारी के एक जीवंत उत्सव में परिवर्तित कर दिया।

हिंदी ज्ञान-संगम के विजेताओं को प्रोफेसर हंसराज सुमन और डॉ. राजन सुदेश रत्न द्वारा सम्मानित किया गया। इसके साथ ही ज्ञान और मैत्रीपूर्ण प्रतिस्पर्धा से परिपूर्ण कार्यक्रम का यह महत्वपूर्ण चरण संपन्न हुआ। हिंदी दिवस का यह आयोजन हिंदी को एक गतिशील और ज्ञानपरक भाषा के रूप में आगे बढ़ाने की आवश्यकता को पुनः रेखांकित करता है—एक ऐसी भाषा, जो भारत की समृद्ध साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत से शक्ति प्राप्त करते हुए शोध, विकास और सार्वजनिक नीति से जुड़े जटिल विचारों को व्यापक समाज तक पहुँचाने में सक्षम है। इस प्रकार RIS में हिंदी दिवस 2026 का आयोजन भाषा, साहित्य, ज्ञान और सहभागिता का सार्थक संगम बना तथा इस विचार को सुदृढ़ किया कि ज्ञान की सामाजिक सार्थकता तब और बढ़ जाती है, जब वह लोगों की अपनी भाषा में उन तक पहुँचता है।

 

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