रूहानियत, ख़ुलूस और ख़िदमत की शानदार मिसाल बना ख़म्स-ए-मजालिस
ख़िदमत, अकीदत और अज़ादारी का रूहानी इख़्तिताम

लखनऊ की तहज़ीब केवल उसकी इमारतों, गलियों और दस्तरख़्वानों में ही नहीं बसती, बल्कि उसकी रूह उन मजालिस में भी सांस लेती है, जहाँ इश्क़-ए-अहले-बैत का चराग़ हर साल नई रौशनी के साथ जलता है। अमीनाबाद स्थित मस्जिद पड़ाइन में अंजुमन गरोह-ए-हुसैन और लाल उर्फ़ मीसम कच्चा हाता की जानिब से आयोजित ख़म्स-ए-मजालिस का पाँच दिवसीय रूहानी सिलसिला 30 मुहर्रम को पूरे अदब, एहतराम और अकीदत के साथ अपने इख़्तिताम को पहुँचा।
पाँच दिनों तक मस्जिद का माहौल इबादत, इल्म और इश्क़-ए-हुसैनियत की ख़ुशबू से महकता रहा। मजालिस में शामिल होने वाले अज़ादारों की तादाद हर रोज़ बढ़ती गई और फ़िज़ा में या हुसैन की सदाएँ गूंजती रहीं। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि इंसानियत, सब्र, क़ुर्बानी और वफ़ा के उस पैग़ाम की ताज़ा तफ़्सीर थी, जिसे इमाम हुसैन (अ.स.) ने कर्बला की तपती ज़मीन पर अपने ख़ून से अमर कर दिया।
इन पाँचों रातों में मौलाना मीसम जैदी साहब क़िबला ने ख़त्म-ए-नबुव्वत जैसे अहम और नाज़ुक मौज़ू पर अपने इल्मी, फ़िक्री और असरदार ख़िताबात से महफ़िल को रूहानी कैफ़ियत से सराबोर कर दिया। उनके बयानात ने न सिर्फ़ अक़ीदे को मज़बूती बख़्शी, बल्कि नई नस्ल को दीन की बुनियादी तालीम से भी रूबरू कराया। शायरों, सोज़ख़्वानों और नौहाख़्वानों ने अपने दर्द-ओ-अहसास से लबरेज़ कलाम पेश कर कर्बला के ग़म को ताज़ा कर दिया और अश्क़ों का एक मुक़द्दस सिलसिला जारी रहा।
इस मुक़द्दस आयोजन की कामयाबी के पीछे केवल मजलिस की तक़रीरें नहीं, बल्कि उन ख़ामोश ख़िदमतगारों की अथक मेहनत भी रही, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर हर ज़िम्मेदारी को अमानत समझकर निभाया। अंजुमन के ज़िम्मेदार लाल उर्फ़ मीसम ने बताया कि यह पाँच दिवसीय मजालिस हर वर्ष पूरी निष्ठा और अकीदत के साथ आयोजित की जाती है और इसकी कामयाबी पूरी कमेटी की सामूहिक मेहनत का नतीजा है।
उन्होंने विशेष रूप से लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट, नगर निगम तथा बिजली विभाग का दिल की गहराइयों से शुक्रिया अदा किया। पाँचों दिनों तक सुरक्षा, ट्रैफ़िक नियंत्रण, साफ़-सफ़ाई और विद्युत व्यवस्था बेहद शानदार रही। थाना प्रभारी सुनील कुमार आज़ाद एवं उनकी पूरी टीम ने मुस्तैदी और जिम्मेदारी के साथ अपनी ड्यूटी निभाई, जिससे हजारों अज़ादार पूरी तसल्ली और सुकून के साथ मजालिस में शरीक हो सके।
इसी तरह सबील की ख़िदमत भी इस आयोजन की रूह बनकर सामने आई। समीर, अली, कमल, राज, डब्बू, क़ासिम, हसन, बॉबी और अन्य ख़िदमतगारों ने दिन-रात मेहनत कर आने वाले अज़ादारों के लिए पानी और अन्य इंतज़ामात की बेहतरीन व्यवस्था की। यह सेवा केवल प्यास बुझाने का ज़रिया नहीं, बल्कि इमाम हुसैन (अ.स.) की याद में इंसानियत की ख़िदमत का वह अमल था, जिसे हर अज़ादार अपने लिए इबादत समझता है।
इस मुक़द्दस आयोजन को कामयाबी की मंज़िल तक पहुँचाने में क्षेत्र के सक्रिय युवा नेता शान का योगदान भी अत्यंत सराहनीय रहा। उन्होंने नगर निगम, बिजली विभाग एवं पुलिस प्रशासन के साथ निरंतर समन्वय स्थापित कर साफ़-सफ़ाई, विद्युत व्यवस्था, सुरक्षा तथा अन्य आवश्यक प्रबंधों को सुचारु बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी सक्रियता और समर्पण के परिणामस्वरूप पाँच दिवसीय ख़म्स-ए-मजालिस का आयोजन पूरी शान, अनुशासन और सकुशल वातावरण में संपन्न हुआ।
ख़म्स-ए-मजालिस का यह इख़्तिताम एक बार फिर इस हक़ीक़त की गवाही देता है कि लखनऊ की अज़ादारी केवल एक रस्म नहीं, बल्कि तहज़ीब, तअज़ीम, मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत की वह ज़िंदा रवायत है, जो हर साल नई पीढ़ी को कर्बला के उस अज़ीम पैग़ाम से जोड़ती है कि हक़ और इंसाफ़ की राह में दी गई क़ुर्बानी कभी ज़ाया नहीं जाती।
यक़ीनन, अंजुमन गरोह-ए-हुसैन का यह आयोजन न सिर्फ़ एक शानदार धार्मिक विरासत का आईना है, बल्कि यह इस बात का भी सबूत है कि जब इबादत, ख़िदमत और अख़लाक़ एक साथ चलें, तो महज़ एक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास की एक ख़ूबसूरत दास्तान जन्म लेती है।



