तंज़ीमुल मकातिब में दो दिवसीय टेबिल टॉक
अज़ादारी की मूल रवायत और पवित्रता बचाने पर गंभीर मंथन

लखनऊ। अय्यामे अज़ा शोक के दिनों में बढ़ती दिखावेबाज़ी, कुरीतियों और अज़ादारी की मूल भावना से हो रहे समझौतों पर अंकुश लगाने के लिए गोलागंज स्थित तंज़ीमुल मकातिब के प्रांगण में एक बेहद महत्वपूर्ण दो दिवसीय टेबिल टॉक, गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में देश भर से आए प्रमुख शिया उलमा, बुद्धिजीवियों और वरिष्ठ पत्रकारों ने अज़ादारी के व्यावहारिक, सामाजिक और रवायती स्वरूप को सुरक्षित रखने के लिए कई गंभीर चिंताएं व्यक्त कीं और सुधार के मार्ग सुझाए।
संस्था के सचिव मौलाना सफी हैदर ने विचार-विमर्श के लिए लगभग दो दर्जन विषय प्रतिभागियों के समक्ष रखे, जिनमें अज़ादारी के नाम पर आपसी मुक़ाबला बाज़ी, बे-हिजाबी, नमाज़ के समय से टकराव, सोशल मीडिया के दुष्प्रचार और लाउडस्पीकर के दुरुपयोग जैसे गंभीर मुद्दे शामिल थे।
मजलिसों में बयानों की मर्यादा को लेकर वक्ताओं ने बेहद संजीदा बातें कहीं। **मौलाना वसी हसन खाँ फैज़ाबाद ने साफ़ लफ़्ज़ों में कहा कि मजलिसों में ऐसी कोई भी मनगढ़ंत रिवायत या बयान नहीं पढ़ा जाना चाहिए, जिससे इमाम की तौहीन का पहलू निकलता हो। उन्होंने कहा कि रहबर-ए-मुअज़्ज़म की शहादत ने कर्बला के संदेश को जिस तरह फैलाया, उसका ज़िक्र हमारी मजलिसों में होना चाहिए।
इसी बात को आगे बढ़ाते हुए मौलाना यासूब अब्बास ने चिंता जताई कि कुछ ख़तीब और ज़ाकिर मजलिसों में केवल लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा रुलाने (गिरया कराने) के फेर में मासूमीन की बे-हुरमती कर बैठते हैं, जो कि बेहद चिंताजनक है।
मौलाना इब्ने अब्बास ने कौम को याद दिलाते हुए कहा कि लोग यह न समझें कि अज़ादारी हमसे है, बल्कि सच यह है कि हम अज़ादारी से हैं। मिंबर का इस्तेमाल इमाम हुसैन के संदेश को पहुंचाने के लिए होना चाहिए, न कि अज़ादारी के मक़सद को बर्बाद पामाल करने के लिए। वहीं मौलाना काज़िम मेहदी उरूज ने ताकीद की कि अज़ादारी में अपनी तरफ़ से नई-नई रस्में गढ़कर कोई भी बढ़ोतरी न की जाए, बल्कि पुरानी और साफ़-सुथरी रवायतों को ही बाकी रखा जाए।
अज़ादारी के दौरान लाउडस्पीकर के गलत इस्तेमाल से होने वाली दिक्कतों पर भी खुलकर बात हुई। मौलाना सफी हैदर ने दुख जताते हुए कहा कि देर रात तक तेज़ आवाज़ में माइक का इस्तेमाल और महिलाओं द्वारा इस तरह मजलिस पढ़ना कि आवाज़ें आपस में टकराएं, अवाम के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है। यह तरीका सवाब के बदले अज़ाब साबित होता है, जिस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए।
यूनिटी कॉलेज के प्रिंसिपल सिब्तैन नूरी ने भी इस बात का पुरज़ोर समर्थन किया और कहा कि रात-रात भर लाउडस्पीकर के इस्तेमाल से मोहल्ले के बीमार, बच्चों और बुजुर्ग लोगों को होने वाली दिक्कतों पर हमें गंभीर होना पड़ेगा।
मजलिसों की मौजूदा व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए मौलाना सफी हैदर ने कहा कि आज मिंबर पर जाने के लिए कोई कड़ा नियम या बोर्ड नहीं है जो ज़ाकिरों की योग्यता तय कर सके। इसके अलावा उन्होंने तबर्रुक के वितरण में की जाने वाली कैटेगरी भेदभाव पर भी सवाल उठाए। मौलाना सरताज हैदर नायब इमाम-ए-जुमा, आसिफी मस्जिद ने मजलिसों में बहुत लंबी पेशखानी और गैर-जरूरी लंबी निज़ामत को सुधारने की वकालत की।
कौम के भीतर छिपे खतरों को लेकर मौलाना सिराज हुसैन ने आगाह किया कि जब दुश्मन सीधे तौर पर नुक़्सान नहीं पहुंचा पाता, तो वह ‘दोस्त’ का रूप धरकर भीतर से नुक़्सान पहुंचाता है। हमारे अंदर इस आंतरिक खतरे को पहचानने की सलाहियत होनी चाहिए। आमिर साबरी ने भी कहा कि वर्तमान समय में अज़ादारी का स्वरूप मजरूह हो रहा है और उलमा को आगे बढ़कर इस दिशा में कड़े कदम उठाने होंगे।
गोष्ठी के दौरान मौलाना साबिर अली इमरानी ने अपनी शायरी के माध्यम से बेहद खूबसूरत पैग़ाम दिया, क़दम क़दम पे मक़ासिद को शय के फैलाओ,
कि बस रूहे अज़ा है प्यामे कर्बो बला।
इस गंभीर मंथन में मौलाना मुहम्मद मियाँ आब्दी, मौलाना मुहम्मद मियाँ क़ुम्मी, शायरे अहलेबैत वसीम अमरोही, मौलाना एजाज़ अतहर, मौलाना सय्यद अली हाशिम, मौलाना अबुल फज़ल, मौलाना तफ़सीर, मौलाना हैदर अली, मौलाना राहत, मौलाना फ़िरोज़ अली, मौलाना मुमताज़ जाफ़र और मौलाना गुलरेज़ सहित दर्जनों उलमा शामिल हुए।



